थार के रेगिस्तान में कभी ऊँटों के झुंड रहते थे। कुछ के नाक में नकेल भी होती थी। मालिक उन्हें पहनाकर यों ही चरने को छोड़ देते थे। दूर-दूर तक रेत-ही-रेत थी। जहाँ कहीं घास-फूस दिखाई पड़ता, ये ऊँट उधर ही चल पड़ते। जब वहाँ का चारा समाप्त हो जाता तो फिर और आगे बढ़ जाते। इस प्रकार उन्होंने लगभग सारा क्षेत्र चर लिया। उसके बाद मीलों तक हरियाली नहीं थी। अब उनका इकट्ठा रहना कठिन हो गया। उनका झुंड तितर-बितर हो गया। ऊपर में तपती धूप और नीचे आग उगलती बालू। क्या करें! कहाँ जाएँ बेचारे! पानी का तो कही नाम-निशान ही नहीं था। जो कुछ भी उन्होंने अपनी थैली में भरा था वह भी समाप्त होने लगा।
एक ऊँट उत्तर दिशा की ओर चल पड़ा। कुछ दूर
तक तो उसे रेत-ही-रेत मिली। वह भूख के मारे परेशान था। तभी उसे एक खरगोश दिखाई
पड़ा। वह उसी तरफ आगे बढ़ता गया। उसे कुछ चूहे भी दिलाई पड़े। उसने सोचा, वह
शायद ठीक जगह पहुँचनेवाला है। उसने हिम्मत हैं हारी, उसको कुछ पेड़ भी दिखाई पड़े।
। उसके पाँव और तेज गति से चलने लगे। पेड़ों पर कुछ पक्षी गुनगुना रहे थे। उसे लगा,
वह किसी जंगल के पास पहुँच गया है। लेकिन रेगिस्तान के पास जंगल
कहाँ से आ गए? उसके मन में यह शंका भी थी- मृगमरीचिका जैसी।
वह एक पेड़ के पास पहुँच गया। उसने अपनी
लम्बी गर्दन को ऊपर उछाला और जल्दी-जल्दी पत्ते सुड़कने लगा। बल-बल की आवाज़ में
वह अपनी खुशी प्रकट कर रहा था। वह स्वर्ग जैसा सुख ले रहा था।
उसने पेड़ की कई शाखाओं के पत्ते खा लिए।
तभी एक चूहा उधर से आया और उससे बोला "ऊँट भाई, इतनी जल्दी क्यों चबा
रहे हो? क्या एक ही दिन में सारा वृक्ष खाने का इरादा है?
अगर तुम्हारे दूसरे भाई भी इसी तरह यहाँ आ गए तो अपना तो बस कबाड़ा
ही हो जाएगा। दूसरे पशुओं के लिए कुछ भी नहीं बचेगा।"
ऊँट ने कोई उत्तर नहीं दिया। उसे तो कई
दिन के बाद ऐसा भोजन मिला था। वह चरने में मस्त था।
चूहे ने फिर प्रश्न किया। बोला – “अरे
ऊँट भाई, मेरी बात का जवाब नहीं दिया। चलो जवाब मत दो मगर बताओ क्या मुझ से दोस्ती
करोगे? मैं मित्रता का हाथ बढ़ाने में पहल कर रहा हैं।
तुम्हारी मुसीबत में मैं सहायता करूँगा।“
ऊँट ने जबड़ा खोला और हँस कर बोला – “अरे
बुद्ध, दोस्ती और तेरे साथ। तू भला मेरी क्या सहायता कर सकता है?”
ऊँट दूसरी शाखा की ओर बढ़ा। अचानक उसकी
नाक की नकेल शाख के साथ उलझ गई। वह उसे छुड़ाने का प्रयत्न करता, किंतु
नकेल और उलझ जाती। चूहे ने जब ऊँट की चीख सुनी तो वह उसके पास दौड़ा-दौड़ा आया और
बोला- "दोस्त, चिंता न करो, तुम्हारी
मुसीबत अभी दूर कर देता हूँ।" चूहा पेड़ पर आनन-फानन में चढ़ गया और नकेल को
कुतरने लगा। धीरे-धीरे वह कट गई और ऊँट की जान में जान आई। चूहा बोला,
"क्या अब भी दोस्ती नहीं करोगे?"
ऊँट बड़ा शर्मिन्दा था। उसने कहा, "भाई,
मुझसे गलती हुई। मैंने तुम्हें यों ही छोटा समझ लिया। लेकिन तुम तो
मुझसे भी बड़े बन गए। मुझे क्षमा करो। आज से तुम मेरे दोस्त ही नहीं, बल्कि स्वामी भी हो। क्योंकि आज तुम न होते, तो मेरे
प्राण पखेरू उड़ गए होते।“ दोनों ने एक दसरे से विदा ली।
ऊँट जंगल में बड़े मजे में रहने लगा। वह
अपना रेगिस्तान लगभग भूल गया था। एक दिन वह बबूल के पत्तों पर पिला हुआ था।
प्रत्येक वृक्ष के पत्तों का अलग-अलग स्वाद मिलता है। वह रोज वृक्ष बदलता और जो जी
में आता खाता। अचानक किसी राजा की सेना उधर से गुजरी और उसी जंगल में पड़ाव डाल
दिया। सेना में घोड़े और ऊँट भी थे। एक सिपाही शाम को घूमने निकला। उसने जंगली ऊँट
को देखा तो सोचने लगा- शायद कोई ऊँट पीछे छूट गया है। वह उसकी तरफ बढ़ा। उसकी नाक
नकेल रहित देखी तो आश्चर्य हुआ। उसने पूछा- तुम्हारा मालिक कौन है?
ऊँट बोला, "मेरा मालिक चूहा
है।"
सिपाही ने जोर से ठहाका लगाया और कहा "चूहे कब से ऊँट पालने लगे?" ऊँट कुछ नहीं बोला और चल पड़ा। लेकिन राजा के दूसरे सिपाही भी वहाँ पहुँच गए। उन्होंने ऊँट को पकड़ लिया। एक ने नाक में नकेल डाल दी और दूसरा उसे कोड़े लगाता हुआ राजा की फौज में ले आया।
चूहे को पता चला तो उसने अपनी बिरादरी को
इकट्ठा किया और एक जोशीला भाषण दिया। वह बोला, "दोस्तो, आज एक राजा के सिपाही ने मेरे ऊँट को पकड़ लिया है। आप तो जानते ही हैं कि
वह मेरा दोस्त ही नहीं बल्कि भाई से भी बढ़कर है। उसकी रक्षा करनी है। हम किसी से
कम नहीं हैं। देखने में छोटे लगते हैं तो क्या हुआ, हमारे
पास बुद्धि तो है। बस संगठन की जरूरत है। आओ, सब मिलकर एक हो
जाओ और आगे बढ़ो।“
चूहों की फौज लड़ाई के लिए तैयार हो गई।
ऊँट का स्वामी सबसे आगे था। सब चूहे राजा के पास पहुँचे। ऊँट के स्वामी ने राजा को
ललकारा और कहा,
"राजा, तूने मेरे दोस्त को बंदी बना रखा
है। मैं तुम्हें चुनौती देता हूँ। अगर ऊँट को तुरंत मुक्त नहीं किया तो हम सब
आक्रमण करेंगे और बदला लेंगे।"
राजा खिलखिलाकर हँसा, अरे
तुम चूहों, लड़ने चले हो। यह मुंह और मसूर की दाल। जाओ अपना
रास्ता लो। ऊँट तुम्हें नहीं मिलेगा।
चूहों ने कहा, "हम
लड़ेंगे और जीतेंगे भी।"
रात को सब चूहे अस्तबल में पहुँचे और उन्होंने
घोड़ों तथा ऊँटों की काठियाँ कतर डालीं। कुछ नकेलों की तरफ बढ़े और उन्हें भी काट
डाला।
अगले दिन राजा को शत्रु पर हमला करना था, लेकिन
जब उसने देखा कि उसके घोड़े तथा ऊँट लड़ाई में जाने योग्य नहीं रहे तो सिर पीटकर
रह गया। शत्रु की सेना आ गई। राजा हार गया। उसे बंदी बना लिया गया। उसके सभी पशु
भाग गए। इसी बीच चूहे का दोस्त भी छूट गया। वह अपने रेगिस्तान की तरफ चल पड़ा। उसे
अब यह जंगल खाने को आ रहा था। चूहों ने उसका स्वागत किया और खुशी-खुशी विदा किया।
ऊँट ने कहा, "चूहे
राजा, आओ मेरी पीठ पर बैठो। मेरे साथ मेरे देश चलो। तुम
कितने महान हो मेरे भाई।"
चूहा बोला, "जाओ दोस्त,
सब को अपना जन्म स्थान अच्छा लगता है। हमें तो यह जंगल ही प्यारा
है। पर एक बात याद रखना भविष्य में छोटे-बड़े या ऊँच-नीच की भावना दिल में मत
रखना।"
No comments:
Post a Comment