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राजा भोज और बुढ़िया

शाम हो चली थी । चोरों की तरह अँधेरा छिपता हुआ आ रहा था । पशु-पक्षी अपने घरों को लौट रहे थे । राजा भोज और माघ कवि यह सब देखकर बहुत खुश हो रहे थे । लेकिन वे अब बहुत थक गए थे। उन्हें प्यास बहुत लगी थी ।  वे एक झरने पर पानी पोने गए । पानी पीकर चले तो अंधेरा हो चुका था। रास्ता समझ में नहीं आता था ।

काफी देर तक भटकने के बाद उन्हें दूर एक दिया जलता हुआ दिखा। दोनों उधर ही गये। वहाँ पहुँच कर देखा कि एक झोपड़ी है उसमें एक बुढ़िया बैठी थी। राजा भोज और माघ कवि ने उससे राम-राम की ।

राजा भोज ने पूछा कि ये रास्ता कहाँ जायेगा ?

बुढ़िया ने कहा- यह रास्ता तो कहीं नहीं जाता । मैं तो इसको कई सालों से यहीं देख रही हूँ। हाँ,  इस पर चलने वाले ही जाते हैं,  पर तुम लोग कौन हो?

राजा भोज ने कहा -हम तो राही है. रास्ता भूल गये हैं।

यह सुनकर बुढ़िया हँसी । वह बोली- तुम राही कैसे ! राही तो दो ही है-एक सूरजदूसरा चन्द्रमा। सूरज दिन भर और चन्द्रमा रात भर चलता है ।

यह सुनकर राजा भोज चकरा गये। वह अभी चुप ही थे कि माघ कवि ने कहा- बुढ़ियाहम तुम्हारे मेहमान हैं ।  हमेंरास्ता बता दो।

बुरिया ने कहा- जानती हूँ कि मेहमान वही है जो आए और चला जाए। लेकिन मेहमान तो दुनियाँ में दो ही हैं - एक धन और दूसरी आदमी को उम्र ।

राजा भोज ने कहा- हम राजा हैं। हमें रास्ता बता दो ?

बुढ़िया बोली- राजा भी दो ही हैं । एक इंद्र और दूसरे यमराज,  बोलो तुम उनमें से कौन हो ?

अब माघ पंडित ने हाथ जोड़ लिए। बोले हम तो गरीब हैं। तुम कृपा कर रास्ता बता दो ।

बुढ़िया ने कहा तुम गरीब कैसे ? गरीब तो दो हैं। एक बकरी का बच्चा और दूसरी कन्या । तुमको में कैसे गरीब मान लूँ ? राजा भोज ने कहा- अच्छा तो हम हारे हुए हैं ।

बुढ़िया बोली- तुम कैसे हारे हुए हो । हारे तो दो ही हैं। एक कर्जदार और दूसरा लड़की का बाप ।

अब राजा भोज और माघ पंडित चुप हो गये। तब बुढ़िया हँसी और बोली मैं जानती हूं कि तुम राजा भोज हो और ये कवि माघ पंडित। तुम्हारी परीक्षा मैंने ले ली। अब इस रास्ते से सीधे चले जाओ। धारा नगरी पहुंच जाओगे ।

सूरज और चाँद की दुश्मनी (भारतीय लोककथा)

सूरज दिन में और चाँद रात में ही क्यों निकलते हैं. क्यों दोनों साथ-साथ नहीं आते. लोक-कल्पनाओं में एक सुन्दर कहानी.

एक बुढ़िया के दो बच्चे थे-लड़की का नाम चाँद था और लड़के का नाम सूरज। ये लोग बहुत ही गरीबी में दिन काट रहे थे। उन्हीं दिनों बस्तर में अकाल पड़ा ओर लोग दाने-दाने को तरसने लगे। बेचारी बुढ़िया भी अपने दोनों बच्चों के साथ भूख की शिकार हुई ।

उन्हीं दिनों गाँव में माँझी के घर भोज हुआ । बूढ़ी माँ ने अपने दोनों बच्चों को वहाँ भेजा और दोना हाथ में देते हुए कहा “मेरे लिए भी दोने में लेकर आना।

बुढ़िया खाना सामने देख सूरज तो माँ को भूल गया और जल्दी खाने लगापर चाँद नहीं भूली । उसने चुपचाप दोने में खाना रखकर उसे चादर से ढक लिया।

भूख से व्याकुल बूढ़ी माँ दरवाजे पर बैठी थी। सूरज के हाथ में खाली दोना देखकर वह रो पड़ी और बेटे को शाप दे बैठी- “जातू दुनियाँ में सदा जलता रहेगा और दूसरों को भी जलाएगा।"

तभी पीछे से चाँद चादर में दोना छुपाए भागी-भागी आई। बूढ़ी माँ खुशी से गदगद हो गई और उसने बेटी को दुआ दी - “ दुनियाँ में तू हमेशा ठंडक फैलाएगी।

बाद में दोनों भाई-बहिन बड़े हो गए और उनके अपने-अपने बच्चे भी हुए। एक दिन बातों-बातों में दोनों ने शर्त लगाई, “देखेंकौन जल्दी अपने बच्चों को खाता है ?” सूरज गट-गट करके अपने बच्चों को निगलने लगापर चाँद अपने बच्चों को गाल में छुपा-छुपाकर रखने लगी ।

जब सूरज ने अपने सारे बच्चों को खा लियातब चाँद ने गाल में छुपाए अपने बच्चों को बाहर निकाल दिया और भाई से बोली, “धिक्कार है भाई,  मै तो तेरी परीक्षा ले रही थी। तूने सच में अपने नन्हे-मुन्ने बच्चों को खा लिया ? तुझ-सा पापी दूसरा नहीं होगा। जाआज से तू मेरी परछाई न देखनान मैं तेरी परछाई देखूँगी । ”

तभी से सूरज अकेला उगता है और चाँद अपने ढेर सारे बच्चों की सेना लिए आती हैजो आसमान पर आँख-मिचौली खेलते रहते हैं। तब से दोनों ने एक-दूसरे की शक्ल भी नहीं देखी। 

जलपरी के रंग (अंडमान की आदिवासी लोककथा)

अंडमान को कभी काला पानी कहा जाता था। वहाँ कई जन-जातियाँ रहती हैं। जाखा आदिवासी आज तक रहस्य बने हुए हैं। सेटिनल जन-जाति के लोग आदमी को देखते ही जहर बुझे तीरों की वर्षा शुरू कर देते हैं। वे बड़े खूंखार होते हैं। लेकिन उसी द्वीप में कुछ ऐसे आदिवासी भी हैं, जो शांतिप्रिय हैं। मध्य अंडमान में ऐसा ही एक आदिवासी कबीला पाया जाता है।

उस कबीले के मुखिया के तीन लड़के थे। सबसे छोटा बड़ा शैतान था। उसका नाम था शुवान। वह बहुत तोड़-फोड़ करता रहता था।

एक दिन आदिवासियों की बस्ती में कोई चित्रकार आया। उसकी दाढ़ी बढ़ी हुई थी। उसके एक हाथ में लंबी कूची थी। दूसरे हाथ में कई प्रकार के रंग। वह एक पेड़ की छाया में बैठ गया। उसने जल रंगों से भोज-पत्रों पर चार चित्र बनाए। गीले चित्रों को सूखने के लिए धूप में रखकर दूसरा चित्र बनाने लगा।

वह पाँचवाँ चित्र बनाने के लिए कुछ सोच ही रहा था कि अचानक उसका ध्यान पहले बनाए चित्रों की ओर गया। पास जाकर देखा, तो उसे अपने चित्रों के टुकड़े-टुकड़े मिले। चित्रकार का मन रो उठा। उसके चित्र देवताओं को समर्पित थे। वह सोचने लगा- "कहीं कुछ कमी तो नहीं रह गई। कहीं देवता तो नाराज

नहीं हो गए।"

कलाकार परेशान था। तभी मुखिया का लड़का आकर उसके पास खड़ा हो गया।

कलाकार ने उसकी ओर देखा, तो वह बोला- "मैंने ही तुम्हारे भोज पत्रों को फाड़ा है.।"

"लेकिन क्यों फाड़ा तुमने?"

लड़के ने कहा - "सब बेकार की चीजें लग रही थी।" फिर हँसकर वहाँ से भाग गया।

चित्रकार की आँखें डबडबा आई। वह उदास होकर वहाँ से चला गया।

उसी शाम मुखिया का लड़का अपने चाचा के साथ समुद्र तट की ओर जा रहा था। चाँदनी रात थी, लेकिन कभी-कभी बादल घिर आते और अँधेरा छा जाता। जंगल की साँय-साँय से भय का वातावरण बना हुआ था।

अचानक शुवान ने देखा कि चाचा कहीं गायब हो गए। आसपास खड़े पेड़ विचित्र किस्म के थे। किसी का तना कटा था। तो किसी के फल आधे थे। उस जंगल में शुवान पहले कभी नहीं आया था। वह भय से काँपने लगा।

तभी कुछ जंगली जानवर उसके पास से गुजरे। शुवान ने देखा, किसी का मुँह आधा था, तो किसी का धड़ गायब।

"चाचा, चाचा....." शुवान चिल्लाया। पर उसकी मदद के लिए कोई नहीं आया। शुवान बड़ी तेजी से आगे बढ़ा। तभी एक पत्थर से ठोकर लगी और वह गिर पड़ा। वह फिर चीखा, लेकिन वहाँ कोई नहीं था।

एकाएक चाँद की मद्धिम रोशनी में उसने भोज-पत्र के कुछ टुकड़े देखे। शुवान ने बढ़कर टुकड़ों को उठा लिया। ये वही टुकड़े थे, जिन पर चित्रकार ने देवताओं के चित्र बनवाए थे। वह फटे चित्रों को जोड़ने लगा। फिर चट्टान पर वैसे ही चित्र बनाने का प्रयास करने लगा। पर उसके पास जल रंग कहाँ से आते। इसलिए कंकड़ से ही चित्रों को बनाने की कोशिश कर रहा था। शुवान अपने किए पर दुखी था। वह मन-ही-मन कह रहा था- "मैंने चित्रकार का दिल क्यों दुखाया? इतने अच्छे चित्रों को क्यों फाड़ा?

शुवान रोते-रोते कुल देवता से प्रार्थना करने लगा। उसके पिता भी अपने कुल देवता को याद किया करते थे।

शुवान ने देखी; एक जलपरी पानी में बार-बार उछल रही है। वह उसकी ओर बढ़ा।

"घबराओ नहीं शुवान। इधर आओ, मैं तुम्हें रंग देती हूँ। चित्रकार से भी बढ़िया। लेकिन वादा करो, फिर कभी किसी कलाकार का दिल नहीं दुखाओगे।...." जलपरी ने कहा।

"नहीं, अब ऐसा कभी नहीं करूँगा। मुझे जल रंग दीजिए। मैं वैसे ही चित्र बनाने की कोशिश करूँगा।" शुवान के स्वर में आग्रह और पश्चाताप का भाव था।

परी ने भाँति-भाँति के जल रंग उसे दे दिए, फिर वह अदृश्य हो गई। शुवान ने देवताओं के चित्रों में रंग भरे। वह काफी देर तक इस काम में लगा रह।। उसने किसी को अपनी ओर आते देख।। वह चाचा थे।

चाचा, चाचा! तम कहाँ चले गए थे?"

- शुवान अधीर होकर बोला।

"बेटा, में एक जंगली जानवर का पीछा करते हुए आगे निकल गया था। जब मुड़ा, तो तुम नहीं मिले। मैं इतनी देर से तुम्हें खोज रहा।

- चाचा ने कहा।

शुवान ने सारा किस्सा सुनाया। जलपरी की बात भी बता दी।

चाचा उसके साथ बस्ती की ओर लौट चले। अब उसे न कटे-फटे वृक्ष दिखाई पड़ रहे थे और न ही कटे-फटे पशु। सारा वातावरण ठीक हो गया था। अगले दिन शुवान उन चित्रों को चित्रकार के पास ले गया। उसने जलपरी वाले रंग भी उसे सौंप दिए। क्षमा माँगी कि भविष्य में वह ऐसा कभी नहीं करेगा।

नए जलरंगों को देखते चित्रकार प्रसन्न हो उठा। वे रंग अद्भुत थे। उसने शुवान को क्षमा कर दिया।



पाँचवा पैर (उत्तराखण्ड की लोककथाएँ)

हिमालय की गोद में बसा था एक गाँव। शिकारी बहुत थे वहाँ। लेकिन हिम्मतवाले बस एक-दो ही थे। एक दिन न जाने किसने चट्टान पर भेड़िए का चित्र बना दिया। थोड़ी देर बाद कोई दसरा आदमी आया। उसने पाँच पैर, तीन आँखें और चार कान बना दिए। तीसरा आदमी उधर से गुजरा, तो उसने उसके सिर पर दो सींग निकाल दिए।

कुछ महिलाएँ लकड़ियाँ बीनती हुई आई। चित्र को देखते ही डर से काँप उठीं। उन्होंने गाँव में लौटकर लोगों को बताया- "जंगल में एक भयंकर जानवर आया है उसके पाँच पैर हैं, तीन आँखें हैं और चार कान।" अफवाह एक गाँव से दूसरे गाँव और फिर सभी जगह फैल गई। लोग डर के मारे घर से बाहर नहीं निकलते थे।

एक दिन एक लोमड़ी उस तरफ गई। चित्र को देखा, तो खूब हँसी। सामने ही एक बूढ़ा भेड़िया बैठा था। बोला- क्यों बहन, आज इतनी खुश क्यों हो? क्या कोई तगड़ा शिकार मिल गया है?"

लोमड़ी बोली- "हाँ, भैया! अब सबसे बड़ा शिकार यहाँ का आदमी होगा। यह देखो, एक अजीब भेड़िए की शक्ल। भला, दुनिया में ऐसा भी कोई पशु होता है! लेकिन आदमी बुद्ध होते हैं, इसीलिए ऐसी कल्पना कर डाली।"

"आदमी होता ही डरपोक है। एक काम करोगे। तम्हारे, दादा की खाल अभी सुरक्षित है तुम्हारे पास। उसे तुम मुझे दे दो। मैं विचित्र भेड़िया बनकर शिकार किया करूँगी।" - चालाक लोमड़ी ने प्रस्ताव रखा।

भेड़िए ने कहा- "मैं तो सचमुच में भेड़िया हूँ, फिर मैं ही शिकार क्यों न करूँ?"

लोमड़ी ने कहा- "तुम पाँच पैर, तीन आँखें तथा चार कान वाले भेड़िए नहीं बन सकते। यह बात तो मैं ही कर सकती हैं। इसलिए जो मैं कहूँ, करते जाओ।"

भेड़िया अनमना-सा रहा। उसकी समझ में पूरी बात नहीं आई। उसने चुपचाप अपने दादा की खाल लोमड़ी को दे दी। बोला "बहन, आधा हिस्सा तो मुझे दिया करोगी न?"

"हाँ, हाँ! क्यों नहीं।" लोमड़ी उसे तसल्ली देकर चली गई।

अगले दिन लोमड़ी ने बूढ़े भेड़िए की मदद से खाल पहनी। उसने अपने जबड़े में बाँस की दो खपच्चियाँ लगा लीं। दो कानों से बाँध लीं। माथे के बीच में एक काला दाग बनाया, ताकि वह तीसरी आँख दिखाई पड़े।

"पर पाँचवाँ पैर कहाँ से लाओगी बहन?" भेड़िए ने प्रश्न किया।

"तू तो बुद्ध का बुद्ध ही रहा। देख, अभी बताती हूँ।" - इतना कहकर लोमड़ी ने अपनी पूँछ नीचे लटका ली और बोली "यह देख, पाँचवाँ पैर।"

एक दिन कोई शिकारी उधर से गुजरा। वह एक वीर पिता का डरपोक बेटा था। लोगों को दिखाने के लिए ही बंदूक लटकाए रहता था। उसने लोमड़ी को विचित्र भेड़िए के रूप में देखा, तो डर गया। बंदूक हाथ से छूट गई। पेट के बल सरकने लगा। लोमड़ी उसकी हालत देखकर हँसने लगी। शिकारी किसी तरह गिरता पड़ता अपने घर पहुँचा। बिस्तर में मुँह छिपाकर लेट गया।

लोमड़ी के हाथ बंदूक लग गई थी। अब वह उसे बड़े रौब से लेकर घूमती और जंगल के सब पशुओं पर धौंस जमाती।

दिन बीतते गए। लोग डर के मारे घर से बाहर कम निकलते थे। शिकारी तो अधमरा-सा ही हो गया था। एक दिन उसने सोचा क्यों न पास के गाँव में जाकर वहाँ के बूढ़े शिकारी से सलाह ली जाए। वह बूढ़े शिकारी के घर गया। सारी कहानी सुनाई। बूढ़ा शिकारी ठहाका मारकर हँसा। बोला- "अरे मूर्ख, भला ऐसा जानवर भी होता है कहीं?"

"नहीं, काका। आपकी सौगंध खाकर कहता हूँ। मैंने वह जानवर अपनी आँखों से देखा है। उसने मेरी बंदूक भी छीन ली थी।"

"हाँ, जिस शिकारी की बंदूक खो जाती है, वह अधमरा तो अपने आप ही हो जाता है। लेकिन तुम्हें भ्रम हो गया।" बूढ़ा बोला।

शिकारी निराश हो, अपने घर चला आया। उधर लोमड़ी के पास गोलियाँ खत्म हो गई थीं। एक दिन वह शिकारी के घर पहुंची। बोली- "गोलियाँ दे दो। मैं तुम्हें कुछ नहीं कहूँगी। वरना......।" शिकारी के होश उड़ गए। वह रजाई में दुबक गया।

लोमड़ी गोलियाँ लेकर बाहर निकली, तो खिलखिलाकर हँसी। शिकारी की बुद्धि पर तरस आ रहा था उसे। जाते-जाते वह उसकी मुर्गियाँ भी उड़ा लाई थी। लोमड़ी गोलियाँ तो ले आई, लेकिन उसे बंदूक में कैसे भरे... यही समस्या थी। भेड़िए ने भी कोशिश की, लेकिन सफलता नहीं मिली।

इस बार लोमड़ी ने बूढ़े भेड़िए को शिकारी के घर भेजा। वह उसे घसीटता हुआ लोमड़ी के पास ले आया। भेड़िया बोला "जंगल के राजा का हुक्म है, तुरंत बंदूक में गोलियाँ भरना सिखाओ। नहीं तो हम तुम्हारा शिकार करेंगे।" शिकारी फिर गिड़गिड़ाने लगा।

तभी धाँय-धाँय की आवाज आई। लोमड़ी और भेड़िया चित्त हो गए। शिकारी भी बेहोश हो गया। तभी बूढ़ा शिकारी आया। उसे झकझोरते हुए बोला- "उठ, डरपोक, यह देखा पाँच पैर, चार कान, तीन आँखें और लंबे सींगोंवाले भेड़िए की खाल।" युवक पागल-सा देख रहा था। बूढ़े शिकारी ने फिर कहा- "शिकारी जब डर जाता है, तो समझो वह मर गया।"

अब बात शिकारी की समझ में आ गई थी।

दो दैत्य (मेघालय में रहने वाली गारो जनजाति की लोककथा)

गोयरा दो महीने का बालक था। मगर वह सेर भर दूध पीता था। फिर खाना भी खाने लगा। वह भी ढेर सारा। सभी आश्चर्य से उसे देखते, कहते- "वाह, बालक तो पूरा दैत्य लगता है।"

तीन महीने का होते ही वह पेड़ पर चढ़ने लगा। माँ पुकारती - "उतर आओ बेटा। छोटे हो। गिर पड़ोगे।" पर वह कहाँ मानने वाला था। पेड़ पर चढ़कर इधर-उधर उछलता। बंदर की तरह खों-खों करके शोर मचाता। उसके लिए डलिया भर रोटी, बालटी भर दूध आता, तब कहीं नीचे उतरता।

माँ ने एक ओझा बुलवाया। उसने कहा, "यह बच्चा अद्भुत लक्षण लेकर आया है। पिछले जन्म में यह कोई दैत्य था। इसकी वजह से गाँव को खतरा पैदा हो सकता है। खास किस्म की एक पूजा होगी। तभी यह बालक दूसरे बालकों की तरह बन सकेगा।"

पूजा की तैयारियाँ होने लगीं। गोयरा के मामा सामान लेने दूर बाजार में गए। रास्ते में भयानक जंगल पड़ता था। वहाँ उन्हें एक दैत्य मिला। वह उसके मामा को कौर-सा निगल गया। गोयरा की माँ बाट जोहती-जोहती थक गई। गाँव के लोग परेशान थे।

गोयरा बचपन से ही जंगली हाथियों की सवारी करने लगा था। शेर का शिकार भी करने लगा। अखाड़े में बड़े-बड़े पहलवान उसके सामने भीगी बिल्ली बन जाते। एक दिन उसे अपने मामा के बारे में पता चल गया। क्रोध से भर, वह धनुष-बाण ले, दैत्य से लड़ने चल दिया। सब भयभीत थे कि अब क्या होने वाला है। दैत्य ने गोयरा को दूर से ही देख लिया। वह बिजली की तरह चमका और बादल की तरह गरजा। उसके मुँह से आग निकल रही थी। जबड़े पहाड़ी गुफा की तरह फट गए थे। एक भारी पेड़ उखाड़, दैत्य गोयरा की तरफ भागा। गोयरा ने एक तीर छोड़ा। तीर दैत्य के मुँह को चीरता हुआ निकल गया। फिर गोयरा ने अपना आकार बढ़ाया। बरगद के वृक्ष की तरह मोटा होता गया। दैत्य का पेड़ उसके हाथ में आकर टिक गया।

कई दिन तक युद्ध होता रहा। इस लड़ाई के कारण गोयरा पहाड़ियाँ फटने लगीं। शिलाओं में दरारें पड़ गईं। सुनते हैं, सात साल तक भयंकर युद्ध चलता रहा। दोनों लहूलुहान हो गए। दैत्य जिधर भी भागता, गोयरा उसका पीछा करता।

आठवें वर्ष की पहली सुबह दैत्य हार गया। गोयरा ने उसे उठाकर पटक दिया। उसके गिरते ही जोर का धमाका हुआ। गोयरा ने उसका पेट चीर डाला। आश्चर्य से देखा, उसके पेट से उसका मामा निकला। गोयरा की खुशी का ठिकाना न रहा। उसे पीठ पर बैठाकर वह ले आया। सारे गाँव में उल्लास का वातावरण छा गया।

इसके बाद गोयरा गाँव में नहीं रहा। एक दिन गाँववालों ने देखा - गोयरा के दोनों हाथ पंख बन गए हैं।

वह आकाश की ओर उड़ने लगा। गाँववालों से बोला- "मैं तुम्हारे लिए दो चीजें छोड़े जा रहा हूँ- बिजली और गर्जन। बिजली में तुम्हें मेरी झलक दिखाई देगी। बादल के गर्जन में मेरा स्वर सुन सकोगे।" यह कह, गोयरा उड़ गया।

(मेघालय में रहने वाली गारो जनजाति की लोककथा)

बकरी और बाघिन (छत्तीसगढ़ की लोककथा)

बहुत पुरानी बात है। एक गाँव में एक बूढ़ा और बुढ़िया रहते थे। वे दोनो बड़े दुखी थे क्योंकि उनके बच्चे नहीं थे। दोनों कभी-कभी बहुत उदास हो जाते थे और सोचते थे - हम ही हैं जो अकेले जिन्दगी गुजार रहे हैं। एक बार बूढ़े से बुढ़िया से कहा - "मुझे अकेले रहना अच्छा नहीं लगता है। क्यों न हम एक बकरी को घर ले आये? उसी दिन दोनो हाट में गये और एक बकरी खरीदकर घर ले आये। चार कौरी में वह बकरी खरीद कर आये थे इसीलिये वे बकरी को ‘चारकौरी’ नाम से पुकारते थे।

बुढ़िया माई बहुत खुस थी बकरी के साथ। उसे अपने हाथों से खिलाती, पिलाती। जहाँ भी जाती चारकौरी को साथ ले जाती।

पर थोड़े ही दिन में बकरी बहुत ही मनमानी करने लगी। किसी के भी घर में घुस जाती थी, और जो भी मिलता, खाने लगती। आस-पास रहनेवाले बहुत तंग हो गये और घर आकर बकरी के बारे में बोलने लगे। बूढ़े बाबा को बहुत गुस्सा आने लगा। बूढ़ी माई को कहने लगे इस बकरी को जंगल में छोड़कर आए। बुढ़िया ने कहा "ये क्या कह रहे हो। ऐसा करते हैं राउत के साथ उसे जंगल में चरने के लिए भेज देते हैं।"

बकरी चराने वाले राउत के साथ बकरी जंगल जाने लगी। लेकिन थोड़े ही दिन में राउत भी बहुत तंग हो गया – चारकौरी उसका कहा जो नहीं मानती थी। उसने बकरी को चराने ले जाने से इन्कार कर दिया।

बकरी फिर से घर में रहने लगी और अब उसे बच्चे हो गये और बच्चे भी सबको तंग करने लग गये। अब बुढ़िया भी परेशान हो गई। उसने कहा "मैं और इनकी देखभाल नहीं कर सकती।"

बूढ़े बाबा ने बकरी और उसके बच्चों को जंगल में छोड़ दिया।

बकरी और उसके बच्चे खिरमिट और हिरमिट जंगल में घूमने लगे, फूल, पत्ते सब खाने लगे।

एक दिन अचानक एक बाघिन से मुलाकात हो गई। बाघिन खिरमिट और हिरमिट को देख रही थी और सोच रही थी कब इन दोनो को खाऊँगी।

बाघिन को देखकर बकरी को समझ में आ गया कि बाघिन क्या सोच रही है। बकरी को बहुत डर लगा पर हिम्मत करके वह बाघिन के पास गई और अपना सर झुकाकर उसने कहा - "दीदी प्रणाम।"

अब बाघिन तो बहुत अचम्भे में पड़ गई। ये बकरी तो मुझे दीदी कहकर पुकार रही है। उसके बच्चों को कैसे खाऊँ? बाघिन ने कहा - "तू कहाँ रहती है?" बकरी ने कहा - "क्या कहूँ दीदी। रहने के लिये कोई जगह ही नहीं है हमारे पास"।

बाघिन ने कहा - "तो तेरे पास रहने के लिये कोई जगह ही नहीं है? ऐसा कर - मेरे साथ चल - मेरे पास दो माँद है। एक में तू अपने बच्चों के साथ रह जा।"

बकरी बड़ी खुशी से बाघिन के पीछे-पीछे चल दी। उसे पता था बाघिन दीदी सम्बोधन से बड़ी खुश हुई थी और अब वह उसके बच्चों को नहीं खायेगी।

बाघिन के माँद के पास दूसरे माँद में अपने बच्चों के साथ बकरी ख़ुशी से रहने लगी। बाघिन भी उसे तंग नहीं करती थी।

लेकिन कुछ दिनों के बाद बाघिन को जब बच्चे हुए, बाघिन फिर से बकरी के बच्चों को खाने के लिए बेचैन हो गई। बच्चे पैदा होने के बाद वह शिकार करने के लिए नहीं जा पा रही थी। भूख भी उसे और ज्यादा लगने लगी थी।

बकरी बाघिन के आँखों की ओर देखती और मन ही मन चिन्तित हो उठती - वह बाघिन के पास जाकर "दीदी-दीदी" कहती और बातें करती रहती ताकि उसकी आँखों के भाव बदल जाये। बाघिन उससे कहती - "मेरे बच्चों का कोई नाम रख दो"। बकरी ने ही कहा - "एक का नाम एक काँरा, दूसरे का नाम दू-काँरा"।

बाघिन के बच्चे एक-काँरा और दू-काँरा और बकरी के बच्चे खिरमिट और हिरमिट।

शाम होते ही बाघिन ने बकरी से कहा - "तुम तीनों अगर हमारे संग सोते तो बड़ा अच्छा होता। या किसी एक को अगर भेज दो." अब बकरी बहुत परेशान हो गई। क्या कहूँ बाघिन से? खिरमिट ने अपनी माँ को चिन्तित देखकर कहा - "माँ, तू चिन्ता मत कर। मैं जाऊँगा वहाँ सोने।"

बाघिन के माँद में जाकर खिरमिट ने कहा - "मौसी-मौसी, मैं आ गया"। बाघिन बड़ी खुश हुई। उसने खिरमिट से कहा - "तू उस किनारे सो जा."। खिरमिट लेट गया लेकिन डर के कारण उसे नींद नहीं आ रही थी। थोड़ी देर के बाद वह उठकर बाघिन के पास जाकर उसे देखने ला - हाँ, बाघिन गाढ़ी नींद में सो रही थी। खिरमिट ने धीरे से एक-काँरा को उठाया और अपनी जगह उसे लिटाकर खुद उसकी जगह में लेट गया। जैसे ही आधी रात हुई, बाघिन की नींद खुल गई - वह माँद के किनारे धीरे-धीरे पहुँची और आँखों तब भी नींद रहने के कारण ठीक से नहीं देख पा रही थी, पर वह तुरन्त उसे खाकर सो गई।

जैसे ही सुबह हुई, खिरमिट ने कहा - "मौसी, मै अब जा रहा हूँ।"

बाघिन चौंक गई - खिरमिट ज़िन्दा है - तो मैनें किसको खाया? वह तुरन्त अपने बच्चों की ओर देखने लगी - कहाँ गया मेरा एक-काँरा? बाघिन गुस्से से छटपटा रही थी। उसने कहा - "आज रात को आ जाना सोने के लिए"।

उस रात को जब खिरमिट पहुँचा सोने के लिए, उसने देखा बाघिन अपनी पूँछ से दू-काँरा को अच्छे से लपेटकर लेटी थी। अब खिरमिट सोच में पड़ गया।

बाघिन ने कहा, "जा, उस किनारे जाकर सो जा।"

खिरमिट उस किनारे जाकर लेट गया लेकिन उसे नींद नहीं आ रही थी। वह धीरे से माँद से बाहर आ गया और चारों ओर देखने लगा। उसे एक बड़ा सा खीरा दिख गया, उसने उस खीरे को उठाकर माँद के किनारे पर रख दिया और खुद अपनी माँ के पास चला आया।

सुबह होते ही खिरमिट ने बाघिन के पास जाकर कहा - "मौसी, अब मैं जा रहा हूँ।"

बाघिन उसकी ओर देखती रह गयी, और फिर उसे डकार आया - यह तो खीरे का डकार आया, तो इस बार मैं खीरा खा गई। बाघिन बहुत गुस्से से खिरमिट की ओर देखने लगी। खिरमिट धीरे-धीरे माँद से बाहर निकल आया और फिर तेज़ी से अपनी माँ के पास पहुँचा -

"दाई, दाई अब बाघिन हमें नहीं छोड़ेगी - चलो, जल्दी चलो, यहाँ से निकल पड़ते हैं।" बकरी खिरमिट और हिरमिट को लेकर भागने लगी। भागते-भागते बहुत दूर पहुँच गई। बकरी खिरमिट और हिरमिट को देखती और बहुत दुखी होती। ये नन्हें बच्चे कितने थक गये हैं। उसने बच्चों से कहा - "थोड़ी देर हम तीनों पेड़ के नीचे आराम कर लेते हैं।" - पर खिरमिट ने कहा - "माँ, बाघिन तो बहुत तेज दौड़ती है, वह तो अभी पहुँच जायेगी।"

हिरमिट ने कहा - "क्यों न हम इस पेड़ पर चढ़ जायें?"

बकरी ने कहा - "हाँ, ये ठीक है - चल हम तीनों इस पेड़ पर चढ़ जाते हैं"।

बकरी और खिरमिट, हिरमिट पेड़ पर चढ़ गये और आराम करने लगे।

उधर बाघिन बकरियों के माँद में पहुँची। उसने इधर देखा, उधर देखा, कहाँ गयी बकरियाँ? बाहर आई और उसके बाद बकरियों के पैरों के निशान देखकर समझ गई कि वे तीनों किस दिशा में गये। उसी को देखते हुए बाघिन चलती रही, फिर दौड़ती रही। उसे ज्यादा समय नहीं लगा उस पेड़ के पास पहुँचने में। पैरों के निशान पेड़ तक ही थे और बकरियों की गंध भी तेज हो गयी थी। 

बाघिन ने ऊपर की ओर देखा। अच्छा, तो यहाँ बैठे हो सब।

बाघिन ने कहा - "अभी तुम तीनों को मैं खा जाऊँगी - अभी ऊपर आती हूँ"।

खिरमिट और हिरमिट तो डर गये। डरके माँ से लिपट गये। बकरी ने कहा - "अरे डरते क्यों हो? जब तक हम पेड़ के ऊपर बैठे हैं वह बाघिन हमें खा नहीं सकती"- अब खिरमिट के मन में हिम्मत हुआ उसने कहा -

" दे तो दाई सोने का डंडा" । बाघिन  ने सोचा पेड़ के ऊपर बकरी के पास सोने का डंडा कहाँ से आयेगा? बाघिन ने कहा - "सोने का डंडा तुझे कहाँ से मिला?"

बकरी ने कहा " खिरमिट-हिरमिट, ये ले डंडा" । ये कहकर बकरी ने ऊपर से एक डंडा फेंका - बाघिन के पीठ पर वह लकड़ी गिरी। बाघिन ने सोचा डंडा तो डंडा ही है - चोट तो लगती है - वह वहाँ से हट गई। लेकिन पेड़ के आस पास ही रही।

अब बकरी कैसे अपने बच्चों को लेकर नीचे उतरे? बकरी मन ही मन बहुत परेशान हो रही थी।

उधर बाघिन परेशान थी ये सोचकर की कब तक उसे बकरियों के इंतजार में पेड़ के नीचे रहना पड़ेगा?

तभी बाघिन ने देखा वहाँ से तीन-चार बाघ जा रहे हैं। सबसे जो बड़ा बाघ था उसका नाम था बंडवा। बाघिन बंडवा के पास गई और उस पेड़ की ओर संकेत किया जिस पर बैठी थी बकरियाँ। बंडवा तो बहुत खुश हो गया, वह अपने साथियों को साथ लेकर पेड़ के नीचे आकर खड़ा हो गया।

बकरी अपने बच्चों से कह रही थी - "डर किस बात का? ये सब नीचे खड़े होकर ही हमें देखते रहेंगे"। लेकिन तभी उसने देखा कि बडंवा पेड़ के नीचे खड़ा हो गया, उसके ऊपर बाघिन, बाघिन के ऊपर और एक बाघ, उसके ऊपर...अब तो चौथा बाघ पेड़ के ऊपर तक आ जायेगा - बकरी अब डर गई थी, कैसे बचाये बच्चों को - तभी खिरमिट ने कहा – “दे तो दाई सोना के डंडा, तेमा मारौ तरी के बंडा”

ये सुनकर बडंवा, जो सबसे नीचे था, भागने लगा, और जैसे ही वह भागने लगा, बाकी सब बाघ धड़ाम- धड़ाम ज़मीन पर गिरने लगे। गिरते ही सभी बाघ भागने लगे। सबको भागते देख बाघिन भी भागने लगी। बकरी ने कहा - "चल खिरमिट, चल हिरमिट, हम भी यहाँ से भाग जाए। नहीं तो बाघिन फिर से आ जायेगी।"

बकरी अपने बच्चों को साथ लिए दौड़ने लगी। दौड़ते-दौड़ते जंगल से बाहर आ गये। तीनों सीधे बूढ़ी माई के घर आ गये। और बूढ़ी माई को चारों ओर से घेर लिया। बूढ़ी माई और बूढ़ा बाबा उन तीनों को देखकर बड़े खुश हुये। अब सब एक साथ खुशी-खुशी रहने लगे।

ऊँट और चूहा (राजस्थान की लोककथा)

थार के रेगिस्तान में कभी ऊँटों के झुंड रहते थे। कुछ के नाक में नकेल भी होती थी। मालिक उन्हें पहनाकर यों ही चरने को छोड़ देते थे। दूर-दूर तक रेत-ही-रेत थी। जहाँ कहीं घास-फूस दिखाई पड़ता, ये ऊँट उधर ही चल पड़ते। जब वहाँ का चारा समाप्त हो जाता तो फिर और आगे बढ़ जाते। इस प्रकार उन्होंने लगभग सारा क्षेत्र चर लिया। उसके बाद मीलों तक हरियाली नहीं थी। अब उनका इकट्ठा रहना कठिन हो गया। उनका झुंड तितर-बितर हो गया। ऊपर में तपती धूप और नीचे आग उगलती बालू। क्या करें! कहाँ जाएँ बेचारे! पानी का तो कही नाम-निशान ही नहीं था। जो कुछ भी उन्होंने अपनी थैली में भरा था वह भी समाप्त होने लगा।

एक ऊँट उत्तर दिशा की ओर चल पड़ा। कुछ दूर तक तो उसे रेत-ही-रेत मिली। वह भूख के मारे परेशान था। तभी उसे एक खरगोश दिखाई पड़ा। वह उसी तरफ आगे बढ़ता गया। उसे कुछ चूहे भी दिलाई पड़े। उसने सोचा, वह शायद ठीक जगह पहुँचनेवाला है। उसने हिम्मत हैं हारी, उसको कुछ पेड़ भी दिखाई पड़े। । उसके पाँव और तेज गति से चलने लगे। पेड़ों पर कुछ पक्षी गुनगुना रहे थे। उसे लगा, वह किसी जंगल के पास पहुँच गया है। लेकिन रेगिस्तान के पास जंगल कहाँ से आ गए? उसके मन में यह शंका भी थी- मृगमरीचिका जैसी।

वह एक पेड़ के पास पहुँच गया। उसने अपनी लम्बी गर्दन को ऊपर उछाला और जल्दी-जल्दी पत्ते सुड़कने लगा। बल-बल की आवाज़ में वह अपनी खुशी प्रकट कर रहा था। वह स्वर्ग जैसा सुख ले रहा था।

उसने पेड़ की कई शाखाओं के पत्ते खा लिए। तभी एक चूहा उधर से आया और उससे बोला "ऊँट भाई, इतनी जल्दी क्यों चबा रहे हो? क्या एक ही दिन में सारा वृक्ष खाने का इरादा है? अगर तुम्हारे दूसरे भाई भी इसी तरह यहाँ आ गए तो अपना तो बस कबाड़ा ही हो जाएगा। दूसरे पशुओं के लिए कुछ भी नहीं बचेगा।"

ऊँट ने कोई उत्तर नहीं दिया। उसे तो कई दिन के बाद ऐसा भोजन मिला था। वह चरने में मस्त था।

चूहे ने फिर प्रश्न किया। बोला – “अरे ऊँट भाई, मेरी बात का जवाब नहीं दिया। चलो जवाब मत दो मगर बताओ क्या मुझ से दोस्ती करोगे? मैं मित्रता का हाथ बढ़ाने में पहल कर रहा हैं। तुम्हारी मुसीबत में मैं सहायता करूँगा।“

ऊँट ने जबड़ा खोला और हँस कर बोला – “अरे बुद्ध, दोस्ती और तेरे साथ। तू भला मेरी क्या सहायता कर सकता है?

ऊँट दूसरी शाखा की ओर बढ़ा। अचानक उसकी नाक की नकेल शाख के साथ उलझ गई। वह उसे छुड़ाने का प्रयत्न करता, किंतु नकेल और उलझ जाती। चूहे ने जब ऊँट की चीख सुनी तो वह उसके पास दौड़ा-दौड़ा आया और बोला- "दोस्त, चिंता न करो, तुम्हारी मुसीबत अभी दूर कर देता हूँ।" चूहा पेड़ पर आनन-फानन में चढ़ गया और नकेल को कुतरने लगा। धीरे-धीरे वह कट गई और ऊँट की जान में जान आई। चूहा बोला, "क्या अब भी दोस्ती नहीं करोगे?"

ऊँट बड़ा शर्मिन्दा था। उसने कहा, "भाई, मुझसे गलती हुई। मैंने तुम्हें यों ही छोटा समझ लिया। लेकिन तुम तो मुझसे भी बड़े बन गए। मुझे क्षमा करो। आज से तुम मेरे दोस्त ही नहीं, बल्कि स्वामी भी हो। क्योंकि आज तुम न होते, तो मेरे प्राण पखेरू उड़ गए होते।“ दोनों ने एक दसरे से विदा ली।

ऊँट जंगल में बड़े मजे में रहने लगा। वह अपना रेगिस्तान लगभग भूल गया था। एक दिन वह बबूल के पत्तों पर पिला हुआ था। प्रत्येक वृक्ष के पत्तों का अलग-अलग स्वाद मिलता है। वह रोज वृक्ष बदलता और जो जी में आता खाता। अचानक किसी राजा की सेना उधर से गुजरी और उसी जंगल में पड़ाव डाल दिया। सेना में घोड़े और ऊँट भी थे। एक सिपाही शाम को घूमने निकला। उसने जंगली ऊँट को देखा तो सोचने लगा- शायद कोई ऊँट पीछे छूट गया है। वह उसकी तरफ बढ़ा। उसकी नाक नकेल रहित देखी तो आश्चर्य हुआ। उसने पूछा- तुम्हारा मालिक कौन है?

ऊँट बोला, "मेरा मालिक चूहा है।"

सिपाही ने जोर से ठहाका लगाया और कहा "चूहे कब से ऊँट पालने लगे?" ऊँट कुछ नहीं बोला और चल पड़ा। लेकिन राजा के दूसरे सिपाही भी वहाँ पहुँच गए। उन्होंने ऊँट को पकड़ लिया। एक ने नाक में नकेल डाल दी और दूसरा उसे कोड़े लगाता हुआ राजा की फौज में ले आया।

चूहे को पता चला तो उसने अपनी बिरादरी को इक‌ट्ठा किया और एक जोशीला भाषण दिया। वह बोला, "दोस्तो, आज एक राजा के सिपाही ने मेरे ऊँट को पकड़ लिया है। आप तो जानते ही हैं कि वह मेरा दोस्त ही नहीं बल्कि भाई से भी बढ़कर है। उसकी रक्षा करनी है। हम किसी से कम नहीं हैं। देखने में छोटे लगते हैं तो क्या हुआ, हमारे पास बुद्धि तो है। बस संगठन की जरूरत है। आओ, सब मिलकर एक हो जाओ और आगे बढ़ो।“

चूहों की फौज लड़ाई के लिए तैयार हो गई। ऊँट का स्वामी सबसे आगे था। सब चूहे राजा के पास पहुँचे। ऊँट के स्वामी ने राजा को ललकारा और कहा, "राजा, तूने मेरे दोस्त को बंदी बना रखा है। मैं तुम्हें चुनौती देता हूँ। अगर ऊँट को तुरंत मुक्त नहीं किया तो हम सब आक्रमण करेंगे और बदला लेंगे।"

राजा खिलखिलाकर हँसा, अरे तुम चूहों, लड़ने चले हो। यह मुंह और मसूर की दाल। जाओ अपना रास्ता लो। ऊँट तुम्हें नहीं मिलेगा।

चूहों ने कहा, "हम लड़ेंगे और जीतेंगे भी।"

रात को सब चूहे अस्तबल में पहुँचे और उन्होंने घोड़ों तथा ऊँटों की काठियाँ कतर डालीं। कुछ नकेलों की तरफ बढ़े और उन्हें भी काट डाला।

अगले दिन राजा को शत्रु पर हमला करना था, लेकिन जब उसने देखा कि उसके घोड़े तथा ऊँट लड़ाई में जाने योग्य नहीं रहे तो सिर पीटकर रह गया। शत्रु की सेना आ गई। राजा हार गया। उसे बंदी बना लिया गया। उसके सभी पशु भाग गए। इसी बीच चूहे का दोस्त भी छूट गया। वह अपने रेगिस्तान की तरफ चल पड़ा। उसे अब यह जंगल खाने को आ रहा था। चूहों ने उसका स्वागत किया और खुशी-खुशी विदा किया।

ऊँट ने कहा, "चूहे राजा, आओ मेरी पीठ पर बैठो। मेरे साथ मेरे देश चलो। तुम कितने महान हो मेरे भाई।"

चूहा बोला, "जाओ दोस्त, सब को अपना जन्म स्थान अच्छा लगता है। हमें तो यह जंगल ही प्यारा है। पर एक बात याद रखना भविष्य में छोटे-बड़े या ऊँच-नीच की भावना दिल में मत रखना।"

रुपहली डायन (हिमाचल प्रदेश की लोककथा)

सारस तेज आवाज करता उठा। सारी घाटी गूंजने लगी। सारस क्या था, पूरा शेर जैसा आकार हो गया था। उसका शरीर भी अजीब और आवाज़ ऐसीसे शेर की दहाड़ हो। गाँव के बच्चे उसे देखकर डर रहे थे। वह जंगल से गुजरा, तो दूर पेड़ पर कोयल बैठी थी। उसने सारस को पहचान लिया। बोली- "क्यों रे सारस, आज होश खो बैठा है क्या? कल तक मुझसे राम-राम किए बिना नहीं जाता था। आज बात भी नहीं कर रहा है। बड़ा घमंडी बन गया है तू?"

सारस दो पल के लिए रुका। फिर बोला "देखती नहीं। अब मैं पहले जैसा नहीं रहा। बाबा ने वरदान दिया था इसीलिए शेर जैसा बन गया हूँ। अब तुम्हारे साथ नहीं रह सकता।"

उस जंगल के दूसरे पक्षियों ने भी उसे बुलाया। अपने साथ कुछ पल रहने को कहा। सारस सभी की बात अनसुनी करके उड़ चला। परी लोक अभी तीन मील दूर था। अंगारों की बारिश होने लगी। एक अंगारा सारस की बाई आँख में लगा और एक पंख पर। उसकी बाई आँख फट गई। एक पंख भी चला गया। परी देश की महारानी दूर से ही सब देख रही थी। महारानी की अंगरक्षिका

परी बोली- "देखो न, महारानी। यह सारस भी परी लोक घूमना चाहता है। यह मुँह और मसूर की दाल।"

हरे पंखों वाली परी बोली- "हम इसका कचूमर निकाल देंगी। यहाँ नहीं घुसने देंगी।"

महारानी ने कहा- "घबराओं नहीं। इसे यहाँ तक आने ही नहीं दूँगी। दूर से इसे शिला बना देती हूँ।" महारानी ने एक तिनका सारस की ओर फेंका। वह तुरंत शिला बन गया।

सारस का एक अजगर दोस्त था। बाबा के वरदान से आज उसके भी पंख लग गए थे। वह भी आसमान में उड़ने लगा। उसे उड़ता देख, पशु-पक्षी भय से काँपने लगे। भला, ऐसा कभी हो सकता है। अजगर जो ढंग से चल फिर भी न सके हवा में उड़ता फिरे।

अजगर उड़कर पर्वत की एक चोटी से दूसरी चोटी पर छलाँगें मारने लगा। पल में यहाँ, पल में वहाँ पहुँच जाता। उसके सिर पर मणि भी थी। उसकी रोशनी से सारा जंगल जगमगाने लगा था।

अजगर घमंड में फूला था। अकड़ में इधर-उधर घूम रहा था। उसे देख, एक कोबरा बोला - "अजगर भाई, आज कहाँ का धावा है? बड़ी अकड़ दिखा रहे हो? इतना रोब-दाब तो कभी नहीं देखा?"

कोबरा पुकारता रहा। वह बिना उत्तर दिए, हवा में उड़ गया। वह भी परी लोक देखने को बेचैन हो गया था। वह परी लोक के पास पहुँच भी न पाया, तभी नौरंगी परी ने दूर से उसे देख लिया। वह अपनी सहेली से बोली- "मैं इसे अभी मजा चखाती हैं। मेरे नागपाश से बचकर कहाँ जाएगा?" इतने में महारानी आ गई। वह बोली- "नौरंगी, तुम अपना नागपाश सम्भाल कर रखो। मैं इसको अभी शिला बना देती हैं।" और अजगर भी तुरंत शिला बन गया।

सारस और अजगर जिस जंगल में रहते थे, वहीं एक आदिवासी का डेरा था। लोगों का विश्वास था कि उसकी पत्नी डायन है। वह रात को अपनी चारपाई पर झाडू रख अपना रूप बदलकर चली जाती थी। रूप बदलने में उसका जवाब नहीं था। कभी मक्खी बनती कभी भेड़िया, तो कभी कुछ और। इसीलिए वह ‘रुपहली डायन’ के नाम से मशहूर थी। जंगल में जाकर नाचती-गाती। वहीं उसे सारस और अजगर भी मिल जाते थे।

उस रात भी वह जंगल में पहुंची। उसे न सारस मिला और न ही अजगर। एक चूहे ने उसे सारा किस्सा बता दिया। सुनकर वह गुस्से से भर गई। उसने कहा - "आज मैं परी लोक को तहस-नहस कर दूँगी। देखती हूँ, वहाँ की परियाँ कितनी बलवान हैं।" वह क्रोध से आग बबूला हो गई। परी लोक की तरफ चल दी। वह दो मील ही चली थी कि बाज बन गई। चार मील चली, तो आंधी बन गई और फिर मूसलाधार बारिश।

परियों ने देखा, एक डायन परी लोक में आ रही है। वे आश्चर्य में पड़ गई। कभी सोचा भी नहीं था कि डायन यहाँ आ सकती है। डायन को रास्ते में दो मेमने मिले। उन्होंने कहा- "मौसी, आज परी लोक की पूजा करोगी क्या? तुम्हारा काम तो लोगों को खाना है। फिर आज पूजा की क्या जरूरत पड़ गई?" डायन ने आव देखा न ताव। दोनों की गर्दन मरोड़ दी।

अब परी लोक एक मील रह गया था। सुरसा की तरह उसका मुँह फैलता जा रहा था। उसके मुँह में ज्वालामुखी-सा धधक रहा था। परियाँ भी उसे देख, घबरा उठी थीं। वे महारानी के पास गईं। महारानी ने कहा- "घबराओं नहीं, मैं इसका घमंड अभी चूर करती हूँ।" महारानी ने अपने सुनहरे पंख लगाए। उड़ चली डायन की ओर। डायन उसे अपनी ओर आती देख क्रोध से बड़बड़ाने लगी। महारानी अपने साथ शांति अस्त्र लाई थी। उसने अस्त्र छोड़ दिया। डायन जहाँ थी, वहीं रुक गई।

"अरी, ओ डायन। लौट जा वापस। बेकार हमसे युद्ध का खतरा मोल न ले। देख, तेरे साथियों का क्या हुआ। हम नहीं चाहते कि तेरा भी वही हाल हो।"- महारानी ने चेतावनी दी। डायन का शरीर तो जड़ हो गया था, किंतु मुँह बंद न हुआ। वह बोली- "तू मेरे दोनों साथियों को फिर वैसा ही बना दे, तो जाऊँ। नहीं तो तेरे परी लोक को तहस-नहस कर दूंगी।" महारानी ने बहुत समझाया। पर डायन तो डायन थी। मुँह से विष उगलती रही। अनाप-शनाप बोलती रही।

हारकर महारानी बोली- "तुझे इतना ही प्यार है अपने मित्रों से, तो जा, पेड़ बनकर उनके बीच खड़ी हो जा। तपती धूप में वे दोनों शिलाएँ तेरी छाया पाकर गर्म नहीं होंगी।" कहकर महारानी ने फिर एक तिनका फेंका। दोनों शिलाओं के बीच एक पेड़ खड़ा हो गया। सुनते हैं, आज भी वह डायन पेड़ बनी, परी लोक में खड़ी है।

पंख और तीर (अरूणाचल प्रदेश की लोककथा)

अरुणाचल प्रदेश में घने जंगल हैं। वर्षा भी खूब होती है। इन जंगलों में बड़े खूंखार हाथी पाए जाते हैं। बहुत पुराने जमाने की बात है। एक साल खूब वर्षा हुई। जंगल में साँप, बिच्छ व दूसरे जहरीले जीव पैदा हो गए। कँटीली झाड़ियों से जंगल पट गया। रास्ते बंद हो गए। ऐसी हालत में विशालकाय हाथियों को घूमने-फिरने में कठिनाई होने लगी। एक दिन सारे हाथी मिलकर ब्रह्माजी के पास गए। उन्होंने अपनी मुसीबत बताई और ब्रह्माजी से प्रार्थना की- "भगवन्, हम आपके बनाए जीव हैं। आप हमारी रक्षा करें। पक्षियों की तरह हमें पंख लगा दें, ताकि हम उड़कर इधर से उधर आ-जा सकें।"

ब्रह्माजी के दरबारियों ने यह सुना तो खिलखिलाकर हँस पड़े- "इतना भारी-भरकम शरीर और पक्षियों वाले पंख।" उन्होंने ब्रह्माजी से कहा- "प्रभु, हाथियों की बात मत मानिए। बड़ा अनर्थ हो जाएगा। अगर कोई हाथी उड़कर किसी छप्पर पर बैठ गया, तो न जाने कितनी जानें चली जाएँगी।"

हाथियों का बुरा हाल था। एक बूढ़ा हाथी उठा और तेजी से अपनी सूंड घुमाकर बोला- "महाराज, ये सब हमारी जान लेने पर तुले हैं। धरती के जहरीले जीवों ने हमारी नाक में दम कर रखा है। आप अगर हमें पंख नहीं देंगे, तो हमारी सारी की सारी नस्ल ही खत्म हो जाएगी।" और सारे हाथी भूख हड़ताल पर बैठ गए।

ब्रह्माजी का दिल पसीज गया। उन्होंने तुरंत आदेश दिया- "इस प्रदेश के सभी हाथियों के पंख लगा दिए जाएँ।" देखते-देखते हाथियों के पंख उग आए। अब क्या था! हाथी आकाश में उड़ने लगे। जब जी में आता, किसी पेड़ के ऊपर जा बैठते। जब मन करता, किसी पहाड़ की चोटी पर जाकर लेट जाते।

एक बार किसी लकड़हारे ने एक हाथी को गाली दे दी। वह गुस्से में लाल-पीला हो गया। उड़कर लकड़‌हारे की झोंपड़ी पर जा बैठा। नीचे उसके बच्चे सो रहे थे। धम्म की आवाज़ हुई। बच्चों ने जोर से एक चीख मारी। बात की बात में झोंपड़ी. टूट गई। हाथी नीचे आ गिरा। दो लड़कियों को छोड़कर सब बच्चे नीचे दब गए।

लड़कियाँ रोती-चिल्लाती जंगल की ओर भागीं। एक दिन नागा जनजाति के कुछ शिकारी उधर जा पहुँचे। लड़कियों ने उनको हाथियों की करतूत बताई। उन्होंने अपने भाले सँभाले। वे जैसे ही हाथियों पर भाले से वार करते, हाथी उड़कर पेड़ों पर जा बैठते। आकाश में उड़ जाते। बहुत देर तक लड़ाई होती रही। हाथी हार माननेवाले नहीं थे। उन्होंने नागाओं के गाँव के गाँव उजाड़ दिए। नागा पुरुषों के साथ-साथ उनकी बहुत-सी स्त्रियाँ भी इस लड़ाई में मारी गई। डरे हुए बच्चे घरों से बाहर निकल आए। हाथियों के डर से झाड़ियों में छिपने लगे। काँटों से उनके शरीर लहुलुहान हो गए।

दूर खड़ी दोनों लड़कियाँ यह सब देख रही थीं। उनकी आँखों में क्रोध के अंगारे फूट रहे थे। एक दूसरे से कहने लगीं- "इस तरह हम नष्ट हो जाएँगे। हाथियों का ही राज्य हो जाएगा। हमें इनसे बदला लेना चाहिए।" देर तक वे दोनों सोचती रहीं। फिर उन्हें एक उपाय सूझ ही गया उन्होंने झाड़ियों में छिपे बच्चों को बुलाया। उन्हें दिलासा दिया। फिर गुलेलें तैयार कीं। हर बच्चे के हाथ में एक-एक गुलेल थी। बच्चों ने कुछ नुकीले पत्थर भी इकट्ठे कर लिए थे।

उन लड़‌कियों से बच्चों ने कहा- "हम लोग झाड़ियों के पीछे छिपकर हाथियों पर वार करें।" लड़‌कियाँ अपनी गुलेल ताने आगे चलीं। बच्चे पीछे-पीछे थे। सामने से हाथियों का झुंड आता दिखाई दिया। बच्चों ने अपनी-अपनी गुलेल. तानकर हाथियों पर सीधा बार किया। नुकीले पत्थरों की चोट की। उड़ते हुए हाथी भी गलेल की मार से बच न सके। हाथी घायल होने लगे। बहुत से हाथियों के पंख भी टूट-टूटकर गिर गए। ब्रह्माजी को युद्ध की खबर पहुँची। वह स्वयं धरती पर आए। बच्चों के साहस को सराहा और हाथियों को डाँटने लगे।

दोनों लड़कियों ने ब्रहमाजी से कहा- "पितामह, हम सब आपकी संतान हैं। फिर यह अन्याय क्यों?"

"कैसा अन्याय?" बह्माजी ने अचकचाकर पूछा।

"आपने हाथी जैसे विशालकाय जानवर के पंख लगाकर अन्याय ही तो किया है। वे उड़-उड़कर हमारे घरों पर बैठ जाते हैं। उनके भार से घर गिर जाते हैं। पंख तो छोटे पक्षियों को ही शोभा देते हैं। आपने देखा होगा, पंख पाकर हाथियों ने क्या तुफान मचाया है। पहले हाथी जंगल में रहते थे। अब गाँव में आकर तबाही मचाने लगे। या तो आप हमारे भी पंख लगा दें या फिर हाथियों के पंख वापस ले लें।

ब्रहमाजी ने पीठ थपथपाकर लड़कियों के साहस की प्रशंसा की। उन्होंने तुरंत हाथियों के पंख गायब कर दिए। फिर कहा- "हाथियों ने जो किया है उसका फल भी उन्हें भुगतना पड़ेगा। अब से हाथी जंगलों में रहेंगे। आबादी में रहना चाहेंगे, तो उन्हें मनुष्य का सेवक बनकर रहना पड़ेगा।" - इतना कहकर ब्रह्माजी अंतर्ध्यान हो गए।

पंख चले जाने से हाथी बहुत निराश हुए। दोनों बहनें अपनी जीत की खुशी में मुस्कुराने लगीं।