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होशियार लड़का (कोरिया की लोककथा)

 किसी गाँव में एक चरवाहे का जवान बेटा चीमो रहता था।  वह प्रतिदिन अपनी भेड़ें चराने के लिए चारागाह में जाता था। वह भोर होते ही अपनी भेड़ों के साथ चारागाह की ओर निकल पड़ता था और सूर्यास्त से ठीक पहले ही लौट आता था।

एक दिन वह चरागाह में किसी जगह बैठा कुछ सोच रहा थाअचानक उसकी आँखों में चमक आ गई और उसने उत्साह से अपनी फर वाली टोपी हवा में उछाल दी।

दुर्भाग्य से फर की टोपी पास से गुजर रहे एक घोड़े के सिर पर गिर गयी जिसके कारण घोड़ा डर गया और डरकर वह अपने पिछले पैरों पर खड़ा हो गया। घोड़े के ऐसा करने से बेचारा घुड़सवार घोड़े से गिर गया।

वह घुड़सवार शहर के सबसे अमीर व्यापारी का बेटा था। वह कीमती सुन्दर कपड़े पहन कर अपने पिता के किसी काम से जा रहा था। इस अचानक से हुई घटना से वह युवक आक्रोशित हो गया। वह उठा और अपने कपड़े झाड़े। वह चरवाहे लड़के पर चिल्लाया, "बेवकूफ लड़के! क्या तुम्हें कोई समझ नहीं हैतुमने मेरे घोड़े को डरा दिया और मैं गिर गया।"

चीमो बोला, "मैंने खुशी में अपनी टोपी उछाल दी थी। मुझे नहीं पता था कि यह घोड़े के सिर पर गिर जाएगा और ऐसा कुछ हो जाएगा।“

"ऐसी कौन सी बात पर इतना खुश हो रहे थेमुझे सुनने दो। खुशकिस्मती से मुझे गंभीर चोट नहीं आयी, अगर मुझे गंभीर चोट लगती तो मैं तुम्हें जरूर एक थप्पड़ मार देता।"

चीमो ने बताया, "मेरे पिता ने मेरे सामने एक पहेली रखी थी और मैंने उसका उत्तर दे दिया।"

"पहेली क्या थी?"

"ऐसी कौन सी चीज़ है जो आदमी से ऊंची है लेकिन मुर्गी से छोटी है?"

"वह क्या हो सकता है?"

क्या तुम्हें भी उत्तर नहीं मालूम?”

"मुझे पता हैमूर्ख। लेकिन मैं यह तुमसे सुनना चाहता हूँ," युवक ने चतुराई से कहा।

चीमो ने गर्व से बताया, "एक टोपी। सिर पर यह हमेशा एक आदमी से ऊंची होती है। लेकिन नीचे जमीन पर यह मुर्गी से भी छोटी होती है।"

चीमो की चतुराई से युवक प्रसन्न हुआ, "तुम बहुत चतुर हो। अब अगर तुम मुझे कुछ ला दोगे तो मैं तुम्हें बहुत सारा इनाम दूंगा। कल जब मैं वापस यहां आऊंगा तब मेरे लिए एक भेड़ तैयार रखना पर ध्यान रहे वह काली नहीं होनी चाहिए। सफ़ेदस्लेटीमिश्रित काला और सफ़ेद या किसी अन्य रंग का।"।

इतना कहकर युवक चला गया। और चीमो ने इसके बारे में सोचा और सोचा।

अगले दिनवह अपनी भेड़ें चरा रहा था। लौटते समय वह युवक अपने घोड़े पर सवार होकर आया। उसने पूछा, "क्यों प्यारे लड़के! क्या तुम्हें वह भेड़ मिल गयी जो मैंने माँगी थी?"

चीमो ने ख़ुशी से जवाब दिया, "हाँमहोदय। मुझे मिल गया। उसे मैंने घर पर ही रखा है। आप अपने आदमी को भेजकर इसे किसी भी समय ले सकते हैं। लेकिन याद रखें कि आपका आदमी रविवारसोमवारमंगलवारबुधवारगुरुवारशुक्रवार नहीं होना चाहिए, और शनिवार को वह सुबहशाम या रात को नहीं आना चाहिए।“

युवक जोर से हंसा और बोला, "मैं तुम्हारी चतुराई से बहुत प्रसन्न हूं। इनाम के रूप में ये पांच सोने के सिक्के ले लो। और याद रखनाअगर तुम्हें कभी भी नौकरी की जरूरत हो तो सीधे मेरे पास आना।"

युवक ने सिक्के और अपना पता चीमो को बता दिया। और मुस्कुराते हुए अपने घोड़े पर बैठा अपने घर की ओर चल पड़ा।

डींगें हांकने का नतीजा (इटली की लोक कथा)

एनोवा और ग्रीट्स घनिष्ठ मित्र थे। वे एक-दूसरे के ह्रदय के बहुत करीब थे। वे अपना समय एक-दूसरे के साथ व्यतीत करना पसंद करते थे। कुछ समय पश्चात् मोरियो नाम के एक व्यक्ति से उनकी मुलाकात हुई और वह भी उनका ख़ास दोस्त बन गया।

एक बार एक पार्टी में खाना खाते समय मोरियो को कुछ सूझा और वह जोर-जोर से बात करने लगा। उसकी ऊँची आवाज़ सुनकर बाकी लोगों उन तीनों की ओर देखने लगे।

मोरियो डींगें हांकने लगा और उसने दावा किया, "मैं जिस घर में रहता हूं, वह आश्चर्य से भरा हुआ है। यदि आप एक कमरे में जोर से कुछ भी बोलते हैं तो दूसरे कमरे में उसकी गूंज सुनाई देती है।" एनोवा ने बड़े आश्चर्य से पूछा, "सचमुच! एक कमरे की बात दूसरे कमरे में कैसे गूंज सकती है? यह कैसे संभव है?"

मोरियो ने कहा, "यह कोई सामान्य प्रतिध्वनि नहीं है। आवाज़ एक बार नहीं बल्कि दस बार गूँजती है। यदि तुम एक कमरे में मेरा नाम जोर से पुकारोगे तो दूसरे कमरे में मेरा नाम दस बार गूँजेगा।"

"वास्तव में!" सभी ने मोरियो की ओर देखा। पार्टी में एक अमीर आदमी भी मौजूद था। वह मोरियो की डींगें हांकना बर्दाश्त नहीं कर सका। उसे सबसे ज्यादा नापसंद यह लगा कि सबका ध्यान मोरियो की तरह और उस पर कोई ध्यान नहीं दे रहा था। उसने जोर से कहा, "तुम्हारे कमरों से दस बार आवाजें गूंजती हैं? यह कोई बड़ी बात नहीं है। मेरी हवेली में तो बीसों बार आवाजें गूंजती हैं।"

अब सबका ध्यान अमीर आदमी की ओर चला गया जिससे वो खुश हो गया। मोरियो भी आश्चर्यचकित था। एनोवा ने कहा, “ऐसा कैसे संभव हो सकता है। यह असंभव है कि किसी कमरे में एक ध्वनि बीस बार गूँज सकें।"

अमीर आदमी ने तर्क दिया, "यह संभव क्यों नहीं है? आप नहीं जानते कि मेरी हवेली कितनी पुरानी है। आप मेरी हवेली में आ सकते हैं और इसे खुद देख सकते हैं।"

यह सुनकर अनेक लोग उसके दावे का सच जानने के लिए हवेली आने की इच्छा व्यक्त करने लगे। इस बात ने अमीर आदमी को परेशानी में डाल दिया। उसे उम्मीद थी कि वास्तव में कोई भी उनके दावे का परीक्षण नहीं करना चाहेगा। अब वह लोगों को अपने घर आने से नहीं रोक सकता था.

एनोवा और ग्रिट्स ने पूछा, "अच्छा सर, हम आपके घर कब आएंगे?" अमीर आदमी को उन्हें अगली शाम को आमंत्रित करना पड़ा।

अमीर आदमी अब बहुत चिंतित था। अगली शाम लोग आएँगे और उसके कमरों में कोई गूँज नहीं होगी। यह उसके लिए बहुत शर्म की बात होगी। उसने अपनी पत्नी को अपनी समस्या बताई। उन्होंने बातचीत करके एक योजना बनाई।

 

योजना के अनुसार अमीर आदमी ने अपने पुराने वफादार नौकर पिएरो को बुलाया और उसे योजना के बारे में बताया। पिएरो को अगले कमरे से सटी एक कोठरी में छिपना था। जब अमीर आदमी पुकारेगा तो उसे उस बात को बीस बार दोहराना होगा।

नियत समय पर लोग अमीर आदमी की हवेली पर पहुँचे एनोवा और ग्रीट्स भी आ चुके थे। अमीर आदमी ने पुकारा, "एनोवा! एनोवा!" दूसरे कमरे में बीस बार एनोवा के नाम की गूँज उठी जिसे लोग बड़े आश्चर्य से सुनते रहे। गूँज सुनने के लिए लोग एक-दूसरे का नाम पुकारते रहे और जाहिर सी बात थी पिएरो अपने मालिक के आदेशानुसार उन्हें दोहराता रहा।

संयोग से उनमें से एक व्यक्ति का नाम पियरो था। उसके मित्र ने उसका नाम जोर से पुकारा, "पियरो! पियरो! आप कहाँ हैं?" इस बार प्रतिध्वनि की जगह उत्तर आया, "सर! मैं यहाँ हूँ। आ रहा हूँ सर!"

और पियरो कोठरी से बाहर आ गया। उसने सोचा कि उसके मालिक ने उसे मेहमानों की सेवा के लिए बुलाया है। ज्यादा लोगों के होने से शोर ज्यादा था लेकिन कुछ लोगों को एहसास हुआ कि उन्होंने आखिरी आवाज की गूँज नहीं सुनी। एनोवा को भी संदेह हुआ तो उसने भी आवाज लगाई लेकिन इस बार कोई प्रतिध्वनि नहीं थी। लोगों को अब पता चल गया कि उन्हें धोखा दिया गया है। उनमें से कई गुस्से में अमीर आदमी की ओर बढ़े। एनोवा ने गरजते हुए कहा, "क्या तुम्हें हमें धोखा देने के लिए खुद पर शर्म नहीं आती?" कुछ तो उसे मारने के लिए आगे बढ़ने लगे तब अमीर आदमी ने गिड़गिड़ाते हुए कहा, "कृपया मुझे माफ कर दीजिए। मुझे बहुत खेद है। मैं फिर कभी आपके साथ कोई गलत काम नहीं करूंगा।"

लोग उस अमीर आदमी का मज़ाक उड़ाते हुए चले गये। उसने निश्चय किया कि वह फिर कभी घमंड नहीं करेगा और न ही डींगें हांकेगा। मोरियो की बेवकूफी भरी बातें सुनकर उसने जो मूर्खता की थी उससे उसकी बेइज्जती तो हुई ही, वह मार खाने से बाल-बाल बच गया। इसलिए अगर कोई मूर्ख कुछ बोल रहा है तो हमें अपना विवेक खोकर उसके जैसा मूर्ख नहीं बनाना चाहिए।

बड़ी बात या सोने की ईंट (रूस की लोक कथा)

रूस के सुदूर प्रान्त के एक गाँव में एक किसान के बेटे की शादी थी। घर में उत्सव का माहौल था। घर की महिलाएँ नाच-गा रही थीं। घर के बाहर काफी लोग जमा थे और वे सब हंसी-मज़ाक कर रहे थे। इस अवसर पर कोई भी शांत रहने को तैयार नहीं था, सब के पास कहने को कुछ-न-कुछ अवश्य था. तभी गाँव के दुकानदार ने शेखी बघारी, "तुम्हें पता है

कल हुआ?"

"क्या हुआ?" दूसरे ने पूछा।

"कल मैं गांव के जागीरदार से मिला। उसने मेरा स्वागत किया और मेरा हालचाल पूछा।“

साथ खड़े लोग बोले. "यह असंभव है, इस गाँव का जागीरदार बहुत ही अहंकारी है, उसका शिष्टता से कोई नाता नहीं है। उसे तो बात तक करने का तरीका नहीं पता।"

यह बातचीत किसान का बेटा रॉजर सुन रहा था। उसने भी शेखी बघारी, “अरे चाचा! ऐसा कुछ नहीं है। मैं तो जागीरदार के साथ भोजन भी कर सकता हूँ।“

उसकी बात सुनकर लोग हंसे। तब एक बुजुर्ग ने सलाह दी, "बेटा, एक व्यक्ति को अपनी स्थिति के अनुसार ही बात करना चाहिए। हमें लंबी-लम्बी मनगढ़ंत बाते नहीं करनी चाहिए। जागीरदार हमारा राजा है, वह हम जैसे किसानों को अपने सामने भी नहीं आने देगा।"

रॉजर मुस्कुराया। वह एक चतुर लड़का था। उसने विनम्रता से कहा, "महोदय, मैं बड़े-बड़े दावे नहीं कर रहा हूं। मैं सच बोलता हूं।"

गाँव के दुकानदार को रॉजर की यह बात नहीं जंची, उसने चुनौती दी, "बेटा रॉजर! यदि तुम वास्तव में जागीरदार के साथ एक समय का भी भोजन कर सके तो मैं तुम्हें एक बड़ा इनाम दूँगा।"

"तो, आप क्या इनाम देंगे? क्या आप मुझे अपने दोनों घोड़े देंगे?” रॉजर ने पूछा।

"न केवल दोनों घोड़े बल्कि मैं तुम्हें अपनी सबसे बढ़िया गाय भी दे दूंगा। दुकानदार ने घमंड से कहा और पूछा, "लेकिन मुझे एक बात बताओ कि तुम एक दिन के भीतर उसके साथ भोजन नहीं कर सके तो तुम मुझे क्या दोगे?"

"अगर मैं असफल हुआ तो मैं तीन साल तक आपका गुलाम बनकर रहूँगा" रॉजर ने उत्तर दिया।

सभी ने रॉजर की ओर अविश्वास से देखा। उसने एक ऐसी चुनौती स्वीकार की थी जिसे पूरा करना असंभव था।

अगली सुबह, रॉजर जागीरदार की हवेली में गया। द्वारपाल ने उसे रोका। रॉजर ने उससे कहा, "अंदर जाओ और जागीरदार से पूछो कि क्या वह सोने की ईंटों के बारे में जानता है। अन्यथा, मैं किसी और के पास जा रहा हूँ।" द्वारपाल हैरान था। वह दौड़कर अंदर गया और उसने इसके बारे में बताया।

यह सुनकर जागीरदार भी हैरान रह गया। लेकिन उसने शांत दिखने की कोशिश की और आदेश दिया, "लड़के को अन्दर बुला लाओ। और हमारे दोपहर के भोजन की व्यवस्था करो।" रॉजर को सम्मानपूर्वक अंदर ले जाया गया और खाने की मेज पर बैठाया गया। दोपहर का भोजन और फल रखे गये थे।

थोड़ी ही देर में जागीरदार भी आ गया। वहां जाकर उसने अपना स्थान ग्रहण किया। उसने लड़के से पूछा, "बेटा, तुम कौन हो? तुम्हारे पिताजी क्या करते हैं?"

रॉजर ने उत्तर दिया, "मेरा नाम रॉजर है, सर। मेरे पिता एक किसान हैं। मैं सिर्फ यह जानना चाहता था कि सोने की एक ईंट कितने धन के बराबर होगी? कोई उस पैसे में क्या खरीद सकता है?" जागीरदार अब भी बहुत हैरान था। उसने रॉजर को बताया, "बेटा, सोने का एक ईंट का मतलब है एक बड़ा पैसा। इतना पैसा कि इससे तुम बहुत सी जमीनें और बहुत सारे मवेशी खरीद सकते हो। वैसे ईंट का सही मूल्य जानना ईंट के वजन पर निर्भर करता है। मुझे ईंट देखने दो। तुम्हारे पास कितनी ईंटें हैं? या सिर्फ एक ईंट है? ईंट मेरे पास लाओ. मैं तुम्हें अच्छी कीमत दूँगा।" जागीरदार की रुचि सोने की ईंट के बारे में बढती जा रही थी।

रॉजर चुपचाप अपना दोपहर का भोजन बड़े स्वाद के साथ खा रहा था। जागीरदार ने सोचा कि शायद लड़के को उससे अच्छी कीमत मिलने की आशा नहीं है तभी वह कुछ उत्तर नहीं दे रहा है तो उसने रॉजर को आश्वस्त करते हुए कहा, "बेटा! तुम्हें जो कीमत चाहिए, वही मिलेगी।" मैं तुम्हें जमीनें भी दूंगा। मुझ पर विश्वास करो और ईंट मेरे पास ले आओ।"

रॉजर ने शांत स्वर में कहा, "महोदय, मैंने कभी नहीं कहा कि मेरे पास सोने की ईंटें हैं। मैं बस एक सोने की ईंट का मूल्य जानने की कोशिश कर रहा था। अगर कल या किसी और दिन मुझे अगर कोई ऐसी ईंट मिली तो ...''

''हट जाओ, बदमाश! क्या तुम मुझे मूर्ख बनाने की कोशिश कर रहे हो?" जागीरदार गुस्से में गरजा और उसने अपने सैनिकों को बुलाया।

"कृपया परेशानी न उठाएं। मैं खुद जा रहा हूं", रॉजर ने प्रस्थान करते समय कहा, "मुझे आपसे जमीन या मवेशियों की आवश्यकता क्यों होगी, आपके साथ दोपहर के भोजन कर लेने मात्र से ही अब मुझे दो घोड़े और एक दुधारू गाय मिल जाएगी।"

जागीरदार ने मुस्कुराते हुए बातूनी रॉजर को जाते देखा और गुस्से के साथ अपने महल के अन्दर चला गया।

पेड़ों के लिए पत्तियां (न्यूजीलैंड की लोककथाएँ)

क्या आप विश्वास कर सकते हैं कि सदियों पहले पेड़ों पर पत्तियाँ नहीं हुआ करती थी। बाद में उनमें पत्तियाँ अलग से लगायी गयी। बात सच तो नहीं है लेकिन न्यूजीलैंड में एक बहुत ही प्रसिद्ध लोककथा तो ऐसा ही कुछ कहती है इस बारे में. आइये पढ़ते हैं -

सदियों पहले की बात है, उस समय पेड़ों पर पत्ते नहीं हुआ करते थे। मनुष्य, पशु-पक्षियों और अन्य जीव-जन्तु बिना पत्तों वाले पेड़ों को देखते थे। गर्मी के दिनों में लोग गर्मी से राहत पाने के लिए कुछ न कुछ इंतजाम करते थे क्योंकि पत्तों के बिना पेड़ ठंडी छाया नहीं दे पाते थे। सर्दियों के दौरान जीव-जंतु बिलों के अंदर रहते थे क्योंकि नंगे पेड़ बाहर बर्फीली ठंडी हवाओं को नहीं रोक पाते थे। ऐसे ही कई वर्षों तक चलता रहा, किसी ने कुछ न सोचा, न किया ।

लेकिन एक साल बहुत तेज गर्मी पड़ी जिससे मनुष्य और सभी प्राणी परेशान हो उठे। सारा पानी पानी सूख रहा था जिससे  तालाब और झीलें मिट्टी के दलदल में बदलने लगे थे।

तब गाँव के जानवरों ने एक बैठक की और फैसला किया कि वे राजा से अनुरोध करेंगे कि पेड़ों को किसी चीज़ से ढक दिया जाए ताकि उन्हें गर्मी से राहत मिल सके। इसलिए, कुछ हाथी, हिरण, शेर और बैल राजा के पास गए और विनती की, "राजा! इस बार गर्मी ने हमारा जीवन कठिन बना दिया है। इससे भी बदतर पानी की कमी है। कृपया हमें छाया प्रदान करने के लिए कुछ करें।

राजा ने एक मंत्री से प्राणियों को छाया देने और कुछ पानी उपलब्ध कराने के लिए पेड़ों को किसी वस्त्र आदि से ढकने को कहा। मंत्री जंगल में गया और कुछ पेड़ों को ढँकदाया इससे  कुछ तो राहत मिली लेकिन सभी के लिए तो ये पर्याप्त नहीं था इसलिए उन्होंने बारी-बारी से पेड़ों की छाया का उपयोग किया।

मंत्री ने देखा कि छाया ने जानवरों को खुश कर दिया है और वे पानी के बारे में भूल गए हैं। अत: वह चुपचाप लौट आये।

जब मनुष्यों को जानवरों के लिए पेड़ों की छाया के बारे में पता चला तो वे भी राजा के पास गये। उन्होंने राजा से मनुष्यों को भी छाया देने का अनुरोध किया। उनके लिए पेड़ भी लगाएं और पानी भी उपलब्ध कराएं। राजा ने उसी मंत्री से आवश्यक कदम उठाने को कहा।

मंत्री ने फिर उसी तरह दो-तीन पेड़ लगवाये और लौटकर दूसरे कामों में लग गये।

लेकिन मनुष्य अन्य जानवरों की तरह शांत नहीं थे। वे छायादार पेड़ों के नीचे जाने के लिए आपस में लड़ने लगे। जब लड़ाई बहुत गंभीर हो गई तो राजा को इसकी सूचना दी गई। राजा ने संबंधित मंत्री से पूछा, "प्रिय मंत्री! हमारी प्रजा इतनी दुखी क्यों है! यह बहुत बुरा है। आपको इसके बारे में कुछ करना होगा।"

मंत्री ने कहा, "महाराज, मेरा सुझाव है कि पेड़ों को तिरपाल से ढकने के बजाय, अगर हम पेड़ों की शाखाओं पर पत्तियां चिपका दें तो यह बेहतर विचार होगा। इससे छाया मिलेगी और हवा भी गुजरेगी जिससे आसपास का वातावरण ठंडा हो जाएगा। यदि हम ऐसा अधिक से अधिक पेड़ों के साथ कर सकें तो इससे लोगों को अधिक राहत मिलेगी।

राजा ने सहमति व्यक्त की, "ठीक है। पत्तों को चिपका दो।"

मंत्री बोला, 'सर, अगर हम एक ही जैसे और एक ही आकार की पत्तियां चिपका दें तो पेड़ खूबसूरत दिखेंगे। हमें कुछ कारीगरों की जरूरत होगी।'

राजा ने कुछ कारीगरों को नियुक्त करने का आदेश दिया। जब वे पत्ते बनाने लगे तो इस बीच मंत्री ने पानी की समस्या से बचने के लिए कुछ कुएँ भी खुदवा दिए। अब मंत्री ने उन कारीगरों की मदद से शाखाओं पर पत्ते चिपकाने शुरू किये। एक ही आकार और आकृति की पत्तियों को चिपकाने और तैयार करने में काफी समय लग रहा था। गर्मी से परेशान लोग देरी को लेकर शिकायत कर रहे थे।

एक गाँव के मुखिया ने कहा, "मंत्री महोदय, आपके वे कारीगर बहुत धीमे हैं। वे पूरे दिन में एक पेड़ पर भी पत्ते नहीं डाल सकते। हम तो गर्मी से मर जायेंगे।"

मंत्री ने तर्क दिया, "देखो! हर काम में समय लगता है। अगर तुम इतने अधीर हो तो हमारी मदद क्यों नहीं करते?"

मुखिया ने उत्तर दिया, "हम करेंगे। पूरी आबादी इस कार्य को करने के लिए तैयार है। लेकिन वे एक ही जैसी पत्तियाँ नहीं बना सकते। विभिन्न लोगों के समूहों द्वारा बनाई गई पत्तियों की सैकड़ों तरह की आकृतियाँ होंगी।"

मंत्री ने सहमति जताते हुए कहा, "इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। महत्वपूर्ण बात यह है कि काम जल्द से जल्द किया जाना है।" अब सभी लोग पत्तों की आकृतियों को काटने और उन्हें चिपकाने में व्यस्त हो गये। सबको आनंद आने लगा और पूरा राज्य इसी कार्य में लग गया।

जब इंसानों को ऐसा करते जानवरों ने देखा और वे भी वैसा ही करने लगे। जल्द ही, अधिकांश पेड़ पत्तों से लदे हुए दिखने लगे। चिपकाते समय कई पत्तियाँ गिरकर नीचे ज़मीन पर फैल गईं। अब सभी खुश दिख रहे हैं क्योंकि पेड़ पत्तों से ढँके हुए थे। पेड़ों की छाया के नीचे पत्तियों के ढेर पर बैठना हर किसी के लिए एक आनंद बन गया था। इंसान खुश थे और जानवर भी खुश थे। पक्षी खुशी से गाने लगे। पेड़ों की पत्तियों की ख़ुशी में आसमान भी झूम उठा और तेज बारिश हुई।

कहते हैं, तब से ही पेड़ों पर विभिन्न प्रकार की पत्तियाँ उगने लगीं, जिससे सभी प्राणियों को आरामदायक छाया और ठंडी हवा मिली और धरती पर रहने वाले सभी जीव प्रसन्न हो गए।