Pages

Showing posts with label आदिवासी लोककथाएँ. Show all posts
Showing posts with label आदिवासी लोककथाएँ. Show all posts

युवा शिकारी और बाघिन (पावी आदिवासी लोककथा)

पावी जनजाति में एक लोककथा प्रचलित है. बात पुरानी है  - एक युवा शिकारी अपने ही गाँव की किसी वन्य सुन्दरी पर मुग्ध हो गया। दोनों के बीच प्यार बढ़ता गया और विवाह की तिथि तय कर दी गई। पावी प्रेमी-प्रेमिका विवाह की तिथि की प्रतीक्षा में और भी अधीर होते गए और झूम खेतों (खेती करने का एक पारंपरिक तरीका) में छुप-छुप कर मिलते।

एक दिन बड़ी गर्मी थी। लड़की को जोर की प्यास लगी। उसने अपने प्रेमी से कहा कि वह पास के गड्ढे के पास  जाकर अपनी प्यास बुझाना चाहती है। युवा शिकारी ने उसे वहाँ जाने से मना किया क्योंकि उसे पता था कि वहाँ के पानी में कुछ जादू है जो व्यक्ति का रूप बदल सकता है।

युवती ने प्रेमी की सलाह मान ली किंतु अपनी प्यास पर काबू न पा सकी। वह आखिरकार उस गड्ढे पर पहुँच गई। उसने अंजुली भर कर पानी पिया और अपने प्रेमी के पास लौट आई।

प्रेमी अपनी प्रेमिका से अगले दिन मिलने के बारे में कुछ कहने ही वाला था कि अचानक प्रेमिका का रूप बदलने लगा। पहले उसके पाँव लंबे हुए फिर हाथ और फिर उनके चार पैर बन गए। नाखून बड़े-बड़े हो गए और देखते ही देखते वह एक जंगली बाघिन बन गई। यह सब देखकर वह युवा शिकारी घबरा गया। अपनी प्रेमिका को इस रूप में देखकर उसका हृदय व्यथित हो गया। उसे प्रेमिका पर क्रोध भी आया। उसने उसे उस जगह का पानी पीने से मना किया था। किंतु बहुत देर हो चुकी थी। क्या करता बेचारा। भाग्य को कोसता हुआ वह अपना सर पिटते हुए घर की तरफ चल पड़ा। उसकी बाघिन प्रेमिका भी पीछे-पीछे चलने लगी। लेकिन उसे गाँव में कैसे रखा जाता अतः पास के जंगल में छोड़ आया।

इस घटना में गाँव से सब लोग आश्चर्यचकित थे। बाघिन बनी लड़की के माता-पिता तो बहुत ही दुखी थे। बेटी की चाहत में वे कुछ भी करने को तैयार थे यहाँ तक कि उन्होंने अपने पशु बाघिन लड़की को खाने के लिए भेजने शुरू किए। वह पूरा पशु एक या दो दिन में खा जाती। आखिर पशुओं की संख्या घटने लगी। उसने आदमियों का शिकार करना भी शुरू कर दिया।

गाँव के लोग घबराए हुए थे। उन्होंने बाध लड़की को मारने की योजना बनाई। एक-दो बार कुछ शिकारी उसके पीछे दौड़े लेकिन सफलता न मिल सकी। एक शिकारी तो खुद उसका शिकार हो गया।

जंगल के हिंसक पशु घबराए हुए थे। गाँव के पशु तो पहले ही समाप्त हो गए थे। अब जंगल के पशु भी खत्म होने लगे। तूफान मा मचा हुआ था। लोग त्राहि-त्राहि कर उठे।

आखिरकार गाँव के लोगों ने निर्णय किया कि युवा शिकारी को ही यह काम सौंपा जाए। गाँव का मुखिया पंचों को लेकर उसके घर गया। उसने अनुरोध किया कि वह बाघिन को यथाशीघ्र मार भगाए। युवा शिकारी परेशान था। क्या उसे अपनी प्रेमिका का ही शिकार करना पड़ेगा? उसने गाँववालों से कहा- "मझे गाँव से निकाल दो लेकिन यह, जघन्य कर्म मुझसे न कराओ। मैं अपनी प्रेमिका को नहीं मार सकूँगा। भले ही वह बाघिन बनकर पशुओं तथा आदमियों का शिकार कर रही हो।"

गाँव के लोगों ने कहा, "लेकिन वह अब तुम्हारी प्रेमिका कहाँ रही? वह तो क्रूर हिंसक पशु है जो निर्बोध पशुओं और लाचार इंसानों को सबको खाए जा रही है। कल हम भी जिंदा नहीं बचेंगे और एक दिन तुम भी उसके शिकार बन जाओगे।"

शिकारी उन तर्कों को सुनकर भी तैयार नहीं हुआ। तभी एक वृद्धा आदिवासिन दौड़ी-दौड़ी आई। उसने कहा- "शिकारी बेटे, अब हमसे नहीं सहा जाता। तुम्हारी प्रेमिका बाघिन पहले मेरे पशुओं को खा गई, फिर मेरे पति को और आज मेरा इकलौता बेटा भी उसकी बलि चढ़ गया। क्या अब भी तुम उस पर तरस ही खाते रहोगे?

शिकारी विवश था। उसने अपने शस्त्र उठाए और जंगल की ओर बेमन से अपनी प्रेमिका का शिकार करने चल पड़ा। लेकिन वह प्रेमिका अब रही नहीं थी वह एक शिकारी बाघिन बन गई है। आखिर एक शिकारी ने दूसरे  शिकारी की जान ले ही ली। बाघिन-प्रेमिका सदा के लिए सो गई। कुछ लोगों का कहना है कि शिकारी भी अपार दुख को सहन न कर सका और खुद की भी जान दे दी।

एक सुखमय प्रेम के ऐसे ह्रदय विदारक परिवर्तन की यह लोककथा आज भी पावी जनजाति बड़े दर्द के साथ सुनाई जाती है।

जलपरी के रंग (अंडमान की आदिवासी लोककथा)

अंडमान को कभी काला पानी कहा जाता था। वहाँ कई जन-जातियाँ रहती हैं। जाखा आदिवासी आज तक रहस्य बने हुए हैं। सेटिनल जन-जाति के लोग आदमी को देखते ही जहर बुझे तीरों की वर्षा शुरू कर देते हैं। वे बड़े खूंखार होते हैं। लेकिन उसी द्वीप में कुछ ऐसे आदिवासी भी हैं, जो शांतिप्रिय हैं। मध्य अंडमान में ऐसा ही एक आदिवासी कबीला पाया जाता है।

उस कबीले के मुखिया के तीन लड़के थे। सबसे छोटा बड़ा शैतान था। उसका नाम था शुवान। वह बहुत तोड़-फोड़ करता रहता था।

एक दिन आदिवासियों की बस्ती में कोई चित्रकार आया। उसकी दाढ़ी बढ़ी हुई थी। उसके एक हाथ में लंबी कूची थी। दूसरे हाथ में कई प्रकार के रंग। वह एक पेड़ की छाया में बैठ गया। उसने जल रंगों से भोज-पत्रों पर चार चित्र बनाए। गीले चित्रों को सूखने के लिए धूप में रखकर दूसरा चित्र बनाने लगा।

वह पाँचवाँ चित्र बनाने के लिए कुछ सोच ही रहा था कि अचानक उसका ध्यान पहले बनाए चित्रों की ओर गया। पास जाकर देखा, तो उसे अपने चित्रों के टुकड़े-टुकड़े मिले। चित्रकार का मन रो उठा। उसके चित्र देवताओं को समर्पित थे। वह सोचने लगा- "कहीं कुछ कमी तो नहीं रह गई। कहीं देवता तो नाराज

नहीं हो गए।"

कलाकार परेशान था। तभी मुखिया का लड़का आकर उसके पास खड़ा हो गया।

कलाकार ने उसकी ओर देखा, तो वह बोला- "मैंने ही तुम्हारे भोज पत्रों को फाड़ा है.।"

"लेकिन क्यों फाड़ा तुमने?"

लड़के ने कहा - "सब बेकार की चीजें लग रही थी।" फिर हँसकर वहाँ से भाग गया।

चित्रकार की आँखें डबडबा आई। वह उदास होकर वहाँ से चला गया।

उसी शाम मुखिया का लड़का अपने चाचा के साथ समुद्र तट की ओर जा रहा था। चाँदनी रात थी, लेकिन कभी-कभी बादल घिर आते और अँधेरा छा जाता। जंगल की साँय-साँय से भय का वातावरण बना हुआ था।

अचानक शुवान ने देखा कि चाचा कहीं गायब हो गए। आसपास खड़े पेड़ विचित्र किस्म के थे। किसी का तना कटा था। तो किसी के फल आधे थे। उस जंगल में शुवान पहले कभी नहीं आया था। वह भय से काँपने लगा।

तभी कुछ जंगली जानवर उसके पास से गुजरे। शुवान ने देखा, किसी का मुँह आधा था, तो किसी का धड़ गायब।

"चाचा, चाचा....." शुवान चिल्लाया। पर उसकी मदद के लिए कोई नहीं आया। शुवान बड़ी तेजी से आगे बढ़ा। तभी एक पत्थर से ठोकर लगी और वह गिर पड़ा। वह फिर चीखा, लेकिन वहाँ कोई नहीं था।

एकाएक चाँद की मद्धिम रोशनी में उसने भोज-पत्र के कुछ टुकड़े देखे। शुवान ने बढ़कर टुकड़ों को उठा लिया। ये वही टुकड़े थे, जिन पर चित्रकार ने देवताओं के चित्र बनवाए थे। वह फटे चित्रों को जोड़ने लगा। फिर चट्टान पर वैसे ही चित्र बनाने का प्रयास करने लगा। पर उसके पास जल रंग कहाँ से आते। इसलिए कंकड़ से ही चित्रों को बनाने की कोशिश कर रहा था। शुवान अपने किए पर दुखी था। वह मन-ही-मन कह रहा था- "मैंने चित्रकार का दिल क्यों दुखाया? इतने अच्छे चित्रों को क्यों फाड़ा?

शुवान रोते-रोते कुल देवता से प्रार्थना करने लगा। उसके पिता भी अपने कुल देवता को याद किया करते थे।

शुवान ने देखी; एक जलपरी पानी में बार-बार उछल रही है। वह उसकी ओर बढ़ा।

"घबराओ नहीं शुवान। इधर आओ, मैं तुम्हें रंग देती हूँ। चित्रकार से भी बढ़िया। लेकिन वादा करो, फिर कभी किसी कलाकार का दिल नहीं दुखाओगे।...." जलपरी ने कहा।

"नहीं, अब ऐसा कभी नहीं करूँगा। मुझे जल रंग दीजिए। मैं वैसे ही चित्र बनाने की कोशिश करूँगा।" शुवान के स्वर में आग्रह और पश्चाताप का भाव था।

परी ने भाँति-भाँति के जल रंग उसे दे दिए, फिर वह अदृश्य हो गई। शुवान ने देवताओं के चित्रों में रंग भरे। वह काफी देर तक इस काम में लगा रह।। उसने किसी को अपनी ओर आते देख।। वह चाचा थे।

चाचा, चाचा! तम कहाँ चले गए थे?"

- शुवान अधीर होकर बोला।

"बेटा, में एक जंगली जानवर का पीछा करते हुए आगे निकल गया था। जब मुड़ा, तो तुम नहीं मिले। मैं इतनी देर से तुम्हें खोज रहा।

- चाचा ने कहा।

शुवान ने सारा किस्सा सुनाया। जलपरी की बात भी बता दी।

चाचा उसके साथ बस्ती की ओर लौट चले। अब उसे न कटे-फटे वृक्ष दिखाई पड़ रहे थे और न ही कटे-फटे पशु। सारा वातावरण ठीक हो गया था। अगले दिन शुवान उन चित्रों को चित्रकार के पास ले गया। उसने जलपरी वाले रंग भी उसे सौंप दिए। क्षमा माँगी कि भविष्य में वह ऐसा कभी नहीं करेगा।

नए जलरंगों को देखते चित्रकार प्रसन्न हो उठा। वे रंग अद्भुत थे। उसने शुवान को क्षमा कर दिया।



दो दैत्य (मेघालय में रहने वाली गारो जनजाति की लोककथा)

गोयरा दो महीने का बालक था। मगर वह सेर भर दूध पीता था। फिर खाना भी खाने लगा। वह भी ढेर सारा। सभी आश्चर्य से उसे देखते, कहते- "वाह, बालक तो पूरा दैत्य लगता है।"

तीन महीने का होते ही वह पेड़ पर चढ़ने लगा। माँ पुकारती - "उतर आओ बेटा। छोटे हो। गिर पड़ोगे।" पर वह कहाँ मानने वाला था। पेड़ पर चढ़कर इधर-उधर उछलता। बंदर की तरह खों-खों करके शोर मचाता। उसके लिए डलिया भर रोटी, बालटी भर दूध आता, तब कहीं नीचे उतरता।

माँ ने एक ओझा बुलवाया। उसने कहा, "यह बच्चा अद्भुत लक्षण लेकर आया है। पिछले जन्म में यह कोई दैत्य था। इसकी वजह से गाँव को खतरा पैदा हो सकता है। खास किस्म की एक पूजा होगी। तभी यह बालक दूसरे बालकों की तरह बन सकेगा।"

पूजा की तैयारियाँ होने लगीं। गोयरा के मामा सामान लेने दूर बाजार में गए। रास्ते में भयानक जंगल पड़ता था। वहाँ उन्हें एक दैत्य मिला। वह उसके मामा को कौर-सा निगल गया। गोयरा की माँ बाट जोहती-जोहती थक गई। गाँव के लोग परेशान थे।

गोयरा बचपन से ही जंगली हाथियों की सवारी करने लगा था। शेर का शिकार भी करने लगा। अखाड़े में बड़े-बड़े पहलवान उसके सामने भीगी बिल्ली बन जाते। एक दिन उसे अपने मामा के बारे में पता चल गया। क्रोध से भर, वह धनुष-बाण ले, दैत्य से लड़ने चल दिया। सब भयभीत थे कि अब क्या होने वाला है। दैत्य ने गोयरा को दूर से ही देख लिया। वह बिजली की तरह चमका और बादल की तरह गरजा। उसके मुँह से आग निकल रही थी। जबड़े पहाड़ी गुफा की तरह फट गए थे। एक भारी पेड़ उखाड़, दैत्य गोयरा की तरफ भागा। गोयरा ने एक तीर छोड़ा। तीर दैत्य के मुँह को चीरता हुआ निकल गया। फिर गोयरा ने अपना आकार बढ़ाया। बरगद के वृक्ष की तरह मोटा होता गया। दैत्य का पेड़ उसके हाथ में आकर टिक गया।

कई दिन तक युद्ध होता रहा। इस लड़ाई के कारण गोयरा पहाड़ियाँ फटने लगीं। शिलाओं में दरारें पड़ गईं। सुनते हैं, सात साल तक भयंकर युद्ध चलता रहा। दोनों लहूलुहान हो गए। दैत्य जिधर भी भागता, गोयरा उसका पीछा करता।

आठवें वर्ष की पहली सुबह दैत्य हार गया। गोयरा ने उसे उठाकर पटक दिया। उसके गिरते ही जोर का धमाका हुआ। गोयरा ने उसका पेट चीर डाला। आश्चर्य से देखा, उसके पेट से उसका मामा निकला। गोयरा की खुशी का ठिकाना न रहा। उसे पीठ पर बैठाकर वह ले आया। सारे गाँव में उल्लास का वातावरण छा गया।

इसके बाद गोयरा गाँव में नहीं रहा। एक दिन गाँववालों ने देखा - गोयरा के दोनों हाथ पंख बन गए हैं।

वह आकाश की ओर उड़ने लगा। गाँववालों से बोला- "मैं तुम्हारे लिए दो चीजें छोड़े जा रहा हूँ- बिजली और गर्जन। बिजली में तुम्हें मेरी झलक दिखाई देगी। बादल के गर्जन में मेरा स्वर सुन सकोगे।" यह कह, गोयरा उड़ गया।

(मेघालय में रहने वाली गारो जनजाति की लोककथा)

रुपहली डायन (हिमाचल प्रदेश की लोककथा)

सारस तेज आवाज करता उठा। सारी घाटी गूंजने लगी। सारस क्या था, पूरा शेर जैसा आकार हो गया था। उसका शरीर भी अजीब और आवाज़ ऐसीसे शेर की दहाड़ हो। गाँव के बच्चे उसे देखकर डर रहे थे। वह जंगल से गुजरा, तो दूर पेड़ पर कोयल बैठी थी। उसने सारस को पहचान लिया। बोली- "क्यों रे सारस, आज होश खो बैठा है क्या? कल तक मुझसे राम-राम किए बिना नहीं जाता था। आज बात भी नहीं कर रहा है। बड़ा घमंडी बन गया है तू?"

सारस दो पल के लिए रुका। फिर बोला "देखती नहीं। अब मैं पहले जैसा नहीं रहा। बाबा ने वरदान दिया था इसीलिए शेर जैसा बन गया हूँ। अब तुम्हारे साथ नहीं रह सकता।"

उस जंगल के दूसरे पक्षियों ने भी उसे बुलाया। अपने साथ कुछ पल रहने को कहा। सारस सभी की बात अनसुनी करके उड़ चला। परी लोक अभी तीन मील दूर था। अंगारों की बारिश होने लगी। एक अंगारा सारस की बाई आँख में लगा और एक पंख पर। उसकी बाई आँख फट गई। एक पंख भी चला गया। परी देश की महारानी दूर से ही सब देख रही थी। महारानी की अंगरक्षिका

परी बोली- "देखो न, महारानी। यह सारस भी परी लोक घूमना चाहता है। यह मुँह और मसूर की दाल।"

हरे पंखों वाली परी बोली- "हम इसका कचूमर निकाल देंगी। यहाँ नहीं घुसने देंगी।"

महारानी ने कहा- "घबराओं नहीं। इसे यहाँ तक आने ही नहीं दूँगी। दूर से इसे शिला बना देती हूँ।" महारानी ने एक तिनका सारस की ओर फेंका। वह तुरंत शिला बन गया।

सारस का एक अजगर दोस्त था। बाबा के वरदान से आज उसके भी पंख लग गए थे। वह भी आसमान में उड़ने लगा। उसे उड़ता देख, पशु-पक्षी भय से काँपने लगे। भला, ऐसा कभी हो सकता है। अजगर जो ढंग से चल फिर भी न सके हवा में उड़ता फिरे।

अजगर उड़कर पर्वत की एक चोटी से दूसरी चोटी पर छलाँगें मारने लगा। पल में यहाँ, पल में वहाँ पहुँच जाता। उसके सिर पर मणि भी थी। उसकी रोशनी से सारा जंगल जगमगाने लगा था।

अजगर घमंड में फूला था। अकड़ में इधर-उधर घूम रहा था। उसे देख, एक कोबरा बोला - "अजगर भाई, आज कहाँ का धावा है? बड़ी अकड़ दिखा रहे हो? इतना रोब-दाब तो कभी नहीं देखा?"

कोबरा पुकारता रहा। वह बिना उत्तर दिए, हवा में उड़ गया। वह भी परी लोक देखने को बेचैन हो गया था। वह परी लोक के पास पहुँच भी न पाया, तभी नौरंगी परी ने दूर से उसे देख लिया। वह अपनी सहेली से बोली- "मैं इसे अभी मजा चखाती हैं। मेरे नागपाश से बचकर कहाँ जाएगा?" इतने में महारानी आ गई। वह बोली- "नौरंगी, तुम अपना नागपाश सम्भाल कर रखो। मैं इसको अभी शिला बना देती हैं।" और अजगर भी तुरंत शिला बन गया।

सारस और अजगर जिस जंगल में रहते थे, वहीं एक आदिवासी का डेरा था। लोगों का विश्वास था कि उसकी पत्नी डायन है। वह रात को अपनी चारपाई पर झाडू रख अपना रूप बदलकर चली जाती थी। रूप बदलने में उसका जवाब नहीं था। कभी मक्खी बनती कभी भेड़िया, तो कभी कुछ और। इसीलिए वह ‘रुपहली डायन’ के नाम से मशहूर थी। जंगल में जाकर नाचती-गाती। वहीं उसे सारस और अजगर भी मिल जाते थे।

उस रात भी वह जंगल में पहुंची। उसे न सारस मिला और न ही अजगर। एक चूहे ने उसे सारा किस्सा बता दिया। सुनकर वह गुस्से से भर गई। उसने कहा - "आज मैं परी लोक को तहस-नहस कर दूँगी। देखती हूँ, वहाँ की परियाँ कितनी बलवान हैं।" वह क्रोध से आग बबूला हो गई। परी लोक की तरफ चल दी। वह दो मील ही चली थी कि बाज बन गई। चार मील चली, तो आंधी बन गई और फिर मूसलाधार बारिश।

परियों ने देखा, एक डायन परी लोक में आ रही है। वे आश्चर्य में पड़ गई। कभी सोचा भी नहीं था कि डायन यहाँ आ सकती है। डायन को रास्ते में दो मेमने मिले। उन्होंने कहा- "मौसी, आज परी लोक की पूजा करोगी क्या? तुम्हारा काम तो लोगों को खाना है। फिर आज पूजा की क्या जरूरत पड़ गई?" डायन ने आव देखा न ताव। दोनों की गर्दन मरोड़ दी।

अब परी लोक एक मील रह गया था। सुरसा की तरह उसका मुँह फैलता जा रहा था। उसके मुँह में ज्वालामुखी-सा धधक रहा था। परियाँ भी उसे देख, घबरा उठी थीं। वे महारानी के पास गईं। महारानी ने कहा- "घबराओं नहीं, मैं इसका घमंड अभी चूर करती हूँ।" महारानी ने अपने सुनहरे पंख लगाए। उड़ चली डायन की ओर। डायन उसे अपनी ओर आती देख क्रोध से बड़बड़ाने लगी। महारानी अपने साथ शांति अस्त्र लाई थी। उसने अस्त्र छोड़ दिया। डायन जहाँ थी, वहीं रुक गई।

"अरी, ओ डायन। लौट जा वापस। बेकार हमसे युद्ध का खतरा मोल न ले। देख, तेरे साथियों का क्या हुआ। हम नहीं चाहते कि तेरा भी वही हाल हो।"- महारानी ने चेतावनी दी। डायन का शरीर तो जड़ हो गया था, किंतु मुँह बंद न हुआ। वह बोली- "तू मेरे दोनों साथियों को फिर वैसा ही बना दे, तो जाऊँ। नहीं तो तेरे परी लोक को तहस-नहस कर दूंगी।" महारानी ने बहुत समझाया। पर डायन तो डायन थी। मुँह से विष उगलती रही। अनाप-शनाप बोलती रही।

हारकर महारानी बोली- "तुझे इतना ही प्यार है अपने मित्रों से, तो जा, पेड़ बनकर उनके बीच खड़ी हो जा। तपती धूप में वे दोनों शिलाएँ तेरी छाया पाकर गर्म नहीं होंगी।" कहकर महारानी ने फिर एक तिनका फेंका। दोनों शिलाओं के बीच एक पेड़ खड़ा हो गया। सुनते हैं, आज भी वह डायन पेड़ बनी, परी लोक में खड़ी है।

पंख और तीर (अरूणाचल प्रदेश की लोककथा)

अरुणाचल प्रदेश में घने जंगल हैं। वर्षा भी खूब होती है। इन जंगलों में बड़े खूंखार हाथी पाए जाते हैं। बहुत पुराने जमाने की बात है। एक साल खूब वर्षा हुई। जंगल में साँप, बिच्छ व दूसरे जहरीले जीव पैदा हो गए। कँटीली झाड़ियों से जंगल पट गया। रास्ते बंद हो गए। ऐसी हालत में विशालकाय हाथियों को घूमने-फिरने में कठिनाई होने लगी। एक दिन सारे हाथी मिलकर ब्रह्माजी के पास गए। उन्होंने अपनी मुसीबत बताई और ब्रह्माजी से प्रार्थना की- "भगवन्, हम आपके बनाए जीव हैं। आप हमारी रक्षा करें। पक्षियों की तरह हमें पंख लगा दें, ताकि हम उड़कर इधर से उधर आ-जा सकें।"

ब्रह्माजी के दरबारियों ने यह सुना तो खिलखिलाकर हँस पड़े- "इतना भारी-भरकम शरीर और पक्षियों वाले पंख।" उन्होंने ब्रह्माजी से कहा- "प्रभु, हाथियों की बात मत मानिए। बड़ा अनर्थ हो जाएगा। अगर कोई हाथी उड़कर किसी छप्पर पर बैठ गया, तो न जाने कितनी जानें चली जाएँगी।"

हाथियों का बुरा हाल था। एक बूढ़ा हाथी उठा और तेजी से अपनी सूंड घुमाकर बोला- "महाराज, ये सब हमारी जान लेने पर तुले हैं। धरती के जहरीले जीवों ने हमारी नाक में दम कर रखा है। आप अगर हमें पंख नहीं देंगे, तो हमारी सारी की सारी नस्ल ही खत्म हो जाएगी।" और सारे हाथी भूख हड़ताल पर बैठ गए।

ब्रह्माजी का दिल पसीज गया। उन्होंने तुरंत आदेश दिया- "इस प्रदेश के सभी हाथियों के पंख लगा दिए जाएँ।" देखते-देखते हाथियों के पंख उग आए। अब क्या था! हाथी आकाश में उड़ने लगे। जब जी में आता, किसी पेड़ के ऊपर जा बैठते। जब मन करता, किसी पहाड़ की चोटी पर जाकर लेट जाते।

एक बार किसी लकड़हारे ने एक हाथी को गाली दे दी। वह गुस्से में लाल-पीला हो गया। उड़कर लकड़‌हारे की झोंपड़ी पर जा बैठा। नीचे उसके बच्चे सो रहे थे। धम्म की आवाज़ हुई। बच्चों ने जोर से एक चीख मारी। बात की बात में झोंपड़ी. टूट गई। हाथी नीचे आ गिरा। दो लड़कियों को छोड़कर सब बच्चे नीचे दब गए।

लड़कियाँ रोती-चिल्लाती जंगल की ओर भागीं। एक दिन नागा जनजाति के कुछ शिकारी उधर जा पहुँचे। लड़कियों ने उनको हाथियों की करतूत बताई। उन्होंने अपने भाले सँभाले। वे जैसे ही हाथियों पर भाले से वार करते, हाथी उड़कर पेड़ों पर जा बैठते। आकाश में उड़ जाते। बहुत देर तक लड़ाई होती रही। हाथी हार माननेवाले नहीं थे। उन्होंने नागाओं के गाँव के गाँव उजाड़ दिए। नागा पुरुषों के साथ-साथ उनकी बहुत-सी स्त्रियाँ भी इस लड़ाई में मारी गई। डरे हुए बच्चे घरों से बाहर निकल आए। हाथियों के डर से झाड़ियों में छिपने लगे। काँटों से उनके शरीर लहुलुहान हो गए।

दूर खड़ी दोनों लड़कियाँ यह सब देख रही थीं। उनकी आँखों में क्रोध के अंगारे फूट रहे थे। एक दूसरे से कहने लगीं- "इस तरह हम नष्ट हो जाएँगे। हाथियों का ही राज्य हो जाएगा। हमें इनसे बदला लेना चाहिए।" देर तक वे दोनों सोचती रहीं। फिर उन्हें एक उपाय सूझ ही गया उन्होंने झाड़ियों में छिपे बच्चों को बुलाया। उन्हें दिलासा दिया। फिर गुलेलें तैयार कीं। हर बच्चे के हाथ में एक-एक गुलेल थी। बच्चों ने कुछ नुकीले पत्थर भी इकट्ठे कर लिए थे।

उन लड़‌कियों से बच्चों ने कहा- "हम लोग झाड़ियों के पीछे छिपकर हाथियों पर वार करें।" लड़‌कियाँ अपनी गुलेल ताने आगे चलीं। बच्चे पीछे-पीछे थे। सामने से हाथियों का झुंड आता दिखाई दिया। बच्चों ने अपनी-अपनी गुलेल. तानकर हाथियों पर सीधा बार किया। नुकीले पत्थरों की चोट की। उड़ते हुए हाथी भी गलेल की मार से बच न सके। हाथी घायल होने लगे। बहुत से हाथियों के पंख भी टूट-टूटकर गिर गए। ब्रह्माजी को युद्ध की खबर पहुँची। वह स्वयं धरती पर आए। बच्चों के साहस को सराहा और हाथियों को डाँटने लगे।

दोनों लड़कियों ने ब्रहमाजी से कहा- "पितामह, हम सब आपकी संतान हैं। फिर यह अन्याय क्यों?"

"कैसा अन्याय?" बह्माजी ने अचकचाकर पूछा।

"आपने हाथी जैसे विशालकाय जानवर के पंख लगाकर अन्याय ही तो किया है। वे उड़-उड़कर हमारे घरों पर बैठ जाते हैं। उनके भार से घर गिर जाते हैं। पंख तो छोटे पक्षियों को ही शोभा देते हैं। आपने देखा होगा, पंख पाकर हाथियों ने क्या तुफान मचाया है। पहले हाथी जंगल में रहते थे। अब गाँव में आकर तबाही मचाने लगे। या तो आप हमारे भी पंख लगा दें या फिर हाथियों के पंख वापस ले लें।

ब्रहमाजी ने पीठ थपथपाकर लड़कियों के साहस की प्रशंसा की। उन्होंने तुरंत हाथियों के पंख गायब कर दिए। फिर कहा- "हाथियों ने जो किया है उसका फल भी उन्हें भुगतना पड़ेगा। अब से हाथी जंगलों में रहेंगे। आबादी में रहना चाहेंगे, तो उन्हें मनुष्य का सेवक बनकर रहना पड़ेगा।" - इतना कहकर ब्रह्माजी अंतर्ध्यान हो गए।

पंख चले जाने से हाथी बहुत निराश हुए। दोनों बहनें अपनी जीत की खुशी में मुस्कुराने लगीं।