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लालबुझक्कड़ की सूझ (महेश कुमार मिश्र)

बहुत पुरानी बात है। एक गाँव में एक आदमी रहता था। उसका नाम लालबुझक्कड़ था। वह अपनी सूझबूझ से कविता रच देता था। आसपास के कई गाँवों में वही कुछ पढ़ा-लिखा था। सभी गाँववाले उसके पास अपनी कठिनाई लेकर आते थे। लालबुझक्कड़ उन कठिनाइयों को दूर करता था। सब लोग लालबुझक्कड़ का आदर करते थे।

एक बार रात के समय लालबुझक्कड़ के गाँव में से होकर एक हाथी निकला। गाँव के सब लोग सो रहे थे। किसी को पता नहीं चला कि हाथी कब निकल गया। गाँव के रास्तों में धूल बहुत होती है। उस धूल पर हाथी के पैरों के बड़े-बड़े निशान बन गए।

सबेरा हुआ, सब लोग जागे। कुछ ने वे गोल निशान रास्ते में देखे। बहुत सोचने पर भी वे यह बात न समझ सके कि ये किस चीज के निशान हैं क्योंकि उन्होंने कभी भी अपने जीवन में हाथी देखा नहीं था इसलिए पैरों के निशान देखकर वे कुछ समझ न सके। इसलिए सबने लालबुझक्कड़जी को वे निशान दिखाए। गोल-गोल, बड़े निशान लालबुझक्कड़जी ने देखे। फिर वे सोचकर कविता में बोले -

"लालबुझक्कड़ बूझ के और न बूझो कोय।

पैर में चक्की बाँध के हिरना कूदो होय।।"

इसका अर्थ है कि लालबुझक्कड़ से प्रश्न पूछकर और किसी से न पूछना । अपने पैरों में चक्की बाँधकर कोई हिरन कूदा होगा, जिसके ये निशान हैं।

ऐसी थी लालबुझक्कड़जी की सूझबूझ !

सच्चा सुख (महेश कुमार मिश्र)

किसी शहर में एक सेठजी रहते थे। उनका नाम आशाराम था। उनके पास बहुत-से मकान थे, बहुत-सा धन था। सोने-चाँदी की उनके यहाँ कमी न थी। पर वे थे बड़े कंजूस। जरूरी कामों लिए भी वे पैसे खर्च नहीं करते थे। वे बहुत पैसा जमा करना चाहते थे। उन्हें अपने नाती-पोतों तक की चिंता थी।

एक दिन उस शहर के मंदिर में एक संत आए। संत बहुत सीधे और सरल स्वभाव के थे। वे सबकी इच्छा पूरी कर देते थे। धीरे-धीरे आशाराम को भी संत के आने की खबर मिली। उनके मन में लालच आ गया। उन्हें लगा कि शायद, संत उनकी इच्छा पूरी कर देंगे।

दूसरे ही दिन आशाराम पैदल चलकर संत के पास गए। उन्हें प्रणाम करके वे एक ओर बैठ गए। संत ने बड़े प्रेम से उनसे बातचीत की। वे समझ गए कि आशाराम को किसी चीज की जरूरत है। वे आशाराम को अधिक सुखी बनाना चाहते थे। संत बोले - "आपकी इच्छा अवश्य पूरी हो जाएगी।" सेठजी खुशी से उछल पड़े।

संत ने फिर कहा- "मगर एक शर्त है, वह तुम्हें पूरी करनी पड़ेगी।" शर्त की बात सुनकर आशाराम घबराए। उन्होंने सोचा, संतजी कहीं कुछ रुपया-पैसा न माँग बैठें। पर उन्हें अपनी इच्छा तो पूरी करनी ही थी। हिम्मत करके बोले, "शर्त बताइए महाराज ! मैं उसे जरूर पूरी करूँगा।"

संत बोले, "आपके पास ही एक गरीब परिकर रहता है। परिवार में केवल दो प्राणी रहते हैं। आप उन्हें कल के भोजन के लिए सामान दे आइए।"

आशाराम के लिए यह कोई बड़ी बात नहीं थी। वे सोचने लगे, "अब मेरी इच्छा जरूर पूरी हो जाएगी।" तुरंत ही वे भोजन का सामान लेकर गरीब के पास गए। वहाँ जाकर उन्होंने देखा कि किवाड़ खुले हैं, माँ-बेटी काम में लगी हुई हैं। किसी ने भी आशाराम की ओर ध्यान नहीं दिया।

आशाराम कुछ देर खड़े रहे। फिर बोले, "मैं तुम्हारे लिए खाने का सामान लाया हूँ। इससे तुम्हारी भोजन की कमी पूरी हो जाएगी।" माँ ने कहा, "बेटा, आज का खाना तो मेरे पास है। इसलिए हम इसे नहीं लेंगे।" "माँ, भोजन की आवश्यकता तो आपको कल भी होगी। आप इसे कल के

लिए ही रख लें।" "हम कल की चिंता नहीं करते। हमारी चिंता भगवान करते हैं। उन पर हमारा पूरा भरोसा है।" माँ ने उत्तर दिया। ऐसा कहकर वह फिर अपने काम में लग गई।

माँ की बात सुनकर आशाराम खड़े रह गए। वे विचार करने लगे। धीरे-धीरे उनकी समझ में बात आ गई। उन्होंने
सोचा कि यह परिवार गरीब अवश्य है, लेकिन है बहुत सुखी। इसे कल की कोई चिंता नहीं। एक मैं हूँ, जो नाती-पोतों की चिंता कर रहा हूँ।

आशाराम घर नहीं गए। वे सीधे संतजी के पास पहुँचे। उन्हें प्रणाम करके बैठ गए। संतजी ने पूछा, "उस गरीब परिवार को खाने का सामान दे आए ?" आशाराम ने कहा, "महाराज ! आपने मेरी आँखें खोल दीं। सचमुच संतोष ही सबसे बड़ा धन है। दुनिया में संतोष ही सबसे बड़ा सुख है।"

संतजी ने हँसकर कहा, "जिस इच्छा से तुम यहाँ आए थे, वह पूरी हो गई। जाओ, सारा धन गरीबों को बाँट दो।" आशाराम ने ऐसा ही किया। अब वे बड़े प्रसन्न और सुखी थे।

साभार - श्री महेश कुमार मिश्र एवं मध्यप्रदेश पाठ्य पुस्तक निगम 

अपना काम आप करो

बात बहुत पुरानी नहीं है। एक दिन कलकत्ता (कलिकाता अब कोलकाता) स्टेशन पर एक रेलगाड़ी आकर रुकी। ठंड के दिन थे। डिब्बों में से यात्री उतरने लगे। कुली, लोगों का सामान उठाने लगे। एक यात्री पहले दर्जे के डिब्बे के सामने खड़ा था। वह कोट- पैंट पहने था। उसके सिर पर टोप लगा था। वह जवान था। वह कोई बड़ा अधिकारी लग रहा था। उसके पास एक छोटा-सा बैग रखा था। वह उसी का था। वह कुली की तलाश में खड़ा था।

उसी समय उसे एक आदमी दिखाई पड़ा। वह धोती, कुर्ता पहने था। ठंड से बचने के लिए उसने शाल ओढ़ ली थी। उसके पैरों में मामूली सी चप्पलें थीं। उसके पास कोई सामान भी नहीं था। बड़े अधिकारी ने आवाज दी, "ओ कुली, ये सामान बाहर ले चलो।" वह आदमी कुछ देर रुका। उसने कोट पैंट पहने हुए यात्री को देखा। फिर वह बोला, "चलिए हुजूर।" इतना कहकर उसने बैग उठा लिया। पीछे- पीछे युवक चला। आगे-आगे कंधे पर बैग रखे वह आदमी था। दोनों स्टेशन से बाहर आ गए।

 युवक ने एक घोड़ागाड़ीवाले से पूछा, "क्यों भाई, ईश्वरचंद्र विद्यासागर के घर चलोगे ?" घोड़ागाड़ीवाला कुछ उत्तर न दे पाया। तब तक उस आदमी ने कहा, "चलिए हुजूर। मैं उनका घर जानता हूँ। वे तो यहीं पास में रहते हैं। आप मेरे साथ आइए।" युवक उसके साथ चल दिया।


भीड़ में से होते हुए दोनों पास की एक गली में पहुँचे। थोड़ी ही दूर जाकर एक मकान के सामने वह आदमी रुक गया। उसने कहा, "देखिए हुजूर, ईश्वरचंद्र विद्यासागर का यही मकान है। आप यहीं रुकिए। मैं भीतर जाकर उन्हें बुलाए देता हूँ।" वह आदमी भीतर चला गया।

थोड़ी देर बाद ही बैठक का दरवाजा खुला। धोती, कुर्ता पहने हुए एक आदमी ने आवाज दी, "आइए, इधर बैठक में आ जाइए।"

वह युवक अचरज में पड़ गया। यही आदमी तो मेरा सामान लेकर आया था ! इसी ने बैठक का दरवाजा खोला है! यह कौन है? वह बैठक में गया । उस आदमी ने युवक को बैठाया। फिर पूछा, "कहिए, क्या सेवा करूँ ?" युवक ने कहा, "मुझे विद्यासागरजी से मिलना है।" उस पुरुष ने उत्तर दिया, "मैं ही विद्यासागर हूँ। बोलिए क्या आज्ञा है ?" युवक मारे लज्जा के सिर झुकाए रहा। उसके मुँह से एक भी शब्द नहीं निकला। फिर वह उठा और विद्यासागरजी के पैरों में गिर पड़ा। वह गिड़गिड़ाते हुए बोला, "मुझे माफ कर दीजिए। मैंने आपको पहचाना नहीं था।" विद्यासागरजी ने युवक को पकड़कर उठाया। वे उसको समझाते हुए बोले, "कोई बात नहीं, तुम अभी जवान हो। अपना काम अपने आप करना सीखो।"

ऐसे थे विद्यासागर। सचमुच वे विद्या के सागर थे।

साभार - मध्यप्रदेश पाठ्य पुस्तक निगम 

पाँच बातें

शिक्षित और युवा व्यक्ति के पास कोई काम का न होना सचमुच दुखद है. हरपाल सिंह के साथ भी कुछ ऐसा ही था.गांव में थोड़ी बहुत जमीन थी पर उससे परिवार का गुजारा होना बड़ा कठिन था.वह अपनी बूढ़ी माँ,पत्नी-बच्चों के लिए आवश्यक वस्तुएँ नहीं जुटा पाता था.इसलिए आज उसने विचार कर लिया था कि वह किसी राजा के पास जाकर कोई चाकरी ही कर लेगा.

उसे अपने परिवार से बहुत प्यार था. पर उनकी बेहतरी के लिए अपने मन को कठोर करके आज वह किसी को बिना बताए चांदनी रात में चुपचाप घर से निकल पड़ा.गांव में सन्नाटा पसरा हुआ था.कुछ कुत्तों के भौंकने का स्वर सुनाई दे रहा था. रात के अंधकार में तारे टिमटिमा रहे थे.

गांव से थोड़ी ही दूर एक बूढ़ा व्यक्ति अपनी झोपड़ी में रहता था.लोग उसे पागल कहा करते थे.पर वह जब भी कोई बात कहता,ज्ञान की बात ही कहता.हरपाल ने सोचा कि क्यों न उस बूढ़े बाबा से ज्ञान की कुछ बातें सुनता चलूँ.परदेस जा रहा हूं,न जाने कौन सा संकट आन पड़े. सो वह उस बूढ़े की कुटिया में पहुंच गया और अपनी बात कही. बूढ़े ने कहा बेटा परदेस जा रहे हो तो मेरी ये पांच बातें सदैव याद रखना-

1.जो तुम्हारी सेवा करे तुम ही उसकी सेवा करो.

2.किसी को दिल दुखाने वाली बात मत करना हर काम इमानदारी से करो.

3. हर काम इमानदारी से करो.

4.बिना योग्यता के दूसरों से बराबरी का दावा मत करो.

और 

5.जहां भी ज्ञान की दो बातें मिले ध्यान से सुनो.

हरपाल सिंह ने उस वृद्ध की पांचों बातें गाठ बांधली और निकल पड़ा एक बड़े से नगर की ओर....|

प्रातः काल वह एक बड़े से नगर में पहुंचा.महाराज की दरबार पहुँचकर उसने प्रधान सेवक से विनय की. प्रधान सेवक ने उसकी दिन था और सरलता से प्रभावित होकर उसने भृत्य का कार्य मिल गया.हरपालसिंह ने प्रधान सेवक का बहुत आभार माना.

एक बार राजा साजो-सामान सहित किसी यात्रा पर निकला.रास्ता लंबा था, गर्मी के दिन थे.यात्रा दल के पीने योग्य पानी समाप्त हो गया.राजा और प्रजा दोनों व्यास से व्याकुल हो उठे. राजा ने प्रधान सेवक को आदेश दिया कि-अविलंब मेरे और सबके लिए पेयजल का प्रबंध करो अन्यथा तुम बुरे परिणाम के लिए तैयार रहो.

भयभीत प्रधान सेवक अपने साथियों के साथ वन में जल की तलाश करने निकल पड़ा पर,उनका सारा प्रयास व्यर्थ रहा. वह यात्रा दल के पास निराश होकर वापस लौटा.

हरपाल सिंह भी निकट ही खड़ा था.उनसे उसकी यह दशा देखी न गई. क्योंकि उसी के कारण ही तो आज वह राज दरबार की सेवा कर रहा है.

उसी बूढ़े की पहली बात याद आई-जो भी तुम्हारी मदद करें तुम भी उसकी मदद करो.

उसने प्रधान सेवक से प्रश्न किया प्रधान जी क्या आसपास कहीं पर भी जल का पता नहीं चला?

प्रधान ने कहा-हाँ हरपाल.सभी ताल नदी सूखे हुए हैं.जल का नामोनिशान तक नहीं है हां एक बावड़ी है लेकिन....|"

लेकिन क्या?-हरपाल सिंह ने पूछा.

"आसपास के लोगों ने बताया कि वहां एक भूत रहता है.आज तक जो भी उस कुएं में उतरा वो कभी वापस नहीं लौट सका.इसलिए हम में से कोई भी वहां जाने की हिम्मत न कर सका." प्रधान सेवक ने अपनी बात पूरी की.

हरपाल सिंह ने कहा-"मित्र तुमने मेरी सहायता की है तुम्हारा मुझ पर बड़ा एहसान है इसलिए मैं अवश्य जल लेने जाऊंगा." सभी ने हरपाल सिंह को रोकना चाहा, पर हरपाल सिंह अपने दोनों हाथों में मटका लेकर निडर होकर चल पड़ा,उसी भूतिया बावड़ी की ओर.

हरपाल सिंह चलते-चलते बावड़ी के पास पहुंचा. बड़े-बड़े और ऊंचे पेड़ों के बीच घिरा हुआ वह कुआँ सचमुच डरावना लग रहा था.ऐसा प्रतीत होता था की वर्षों से यहां कोई नहीं आया है.

कुएँ से नीचे तक जाने के लिए सीढ़ियां बनी हुई थी,और नीचे बिल्कुल अंधेरा था. एक बार तो हरपाल सिंह का हृदय भी काँप गया. पर वह हिम्मत करके धीमी कदमों से कुएँ से जल लेने उतरा.

बावड़ी के जल स्तर तक पहुंच कर और झुककर उसने दोनों अपने मटके पानी से भर लिए.दोनों हाथों में जल से भरे घड़े लिए वह जैसे ही ऊपर सीढ़ियां चढ़ने को तैयार हुआ. उससे ठीक सामने एक भयानक सा आदमी खड़ा था. बिल्कुल काला कलूटा बाल बड़े बड़े और बिखरे हुए.कमर से ऊपर का भाग नग्न था.और उसने किसी नर कंकाल को अपने सीने से लगाए रखा था.

हरपाल सिंह स्तंभित रह गया.

उस डरावने आदमी ने हरपाल से प्रश्न किया ओ नौजवान!मेरी पत्नी के बारे में तुम्हारा क्या ख्याल है?

हरपाल कुछ कह नहीं जा रहा था कि उसे वृद्धि की दूसरी बात याद आई किसी के दिल दुखाने वाली बात मत करो. उसने जवाब दिया-''ऐसी सुंदर स्त्री तो मैंने जीवन में कभी नहीं देखा."

हरपाल सिंह का उत्तर सुनकर वह व्यक्ति बहुत प्रसन्न हुआ उसने कहा-" नौजवान मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हूं. मैं अपनी पत्नी से इतना प्रेम करता था कि आज तक उसे लेकर यहां वहां फिर रहा हूं.आज तक जो भी इस कुएँ में आया उन सब से मैंने यही प्रश्न किया.पर उन्होंने इसे हड्डी का ढांचा कह दिया इसलिए मैंने उन सब को मार डाला. पर तुमने मेरी पत्नी की प्रशंसा करके मुझे खुश कर दिया है.बोलो नौजवान तुम क्या चाहते हो?"

हरपाल सिंह ने कहा-"मान्यवर आसपास के लोगों को आपके भय के कारण पानी नहीं मिल पाता है. यदि आप मुझसे सचमुच प्रसन्न हैं तो कृपा करके आप इस बावड़ी को छोड़कर चले जाइए."

उस आदमी ने कहा बिल्कुल ऐसा ही होगा और तुरंत वह सदा सदा के लिए उस कुएँ को छोड़कर चला गया.

हरपाल सिंह जब मटके में पानी लेकर वापस  पहुंचा तो सबके खुशी का ठिकाना न रहा. राजा प्रजा सब को भरपूर पानी मिला.

राजा ने हरपाल सिंह से प्रसन्न होकर उसके पद और वेतन में वृद्धि कर दी.

अब हरपाल सिंह को राज्य का खजांची बना दिया गया. यानी कि  राजकोष के देखरेख का जिम्मा अब उसके ही हाथों में था. अपना काम करते हुए उसे बूढ़े की तीसरी बात हमेशा याद आती थी कि-हर काम इमानदारी से करो.

हरपालसिंह की ईमानदारी से काम करने और पाई-पाई के हिसाब रखने की वजह से भ्रष्ट कर्मचारी उससे नाराज  रहने लगे क्योंकि अब उनके अतिरिक्त आय का रास्ता बंद हो गया.

प्रधानमंत्री ने हरपालसिंह को लालच देकर कहा कि यदि तुम हमसे मिलकर रहोगे तो मैं और हमारे साथी मिलकर तुम्हें एक प्रतिष्ठित पद दिलवा देंगे.जिससे तुम्हारे सम्मान और यश में वृद्धि होगी. 

पर हरपाल ने बूढ़े की चौथी बात का स्मरण किया-बिना योग्यता के किसी से बराबरी का दावा मत करो. उसने प्रधानमंत्री का अनुचित प्रस्ताव ठुकरा दिया.

इससे नाराज होकर दूसरे ही दिन सुबह चापलूस मंत्रियों ने राजा के पास जाकर शिकायत की,कि हरपालसिंह अपने कार्य  में हेरा-फेरी करता है.और मना करने पर उसने हमें खरी-खोटी सुनाई और उसने राजपरिवार को भी अपमानजनक शब्द कहे हैं.

राजा यह सुनकर आगबबूला हो गया.उसने कहा-"हरपालसिंह का यह दुस्साहस?कि हमारे ही टुकड़ों पर पलकर हमें ही अपशब्द कहे.हम जब तक हरपालसिंह का कटा सिर नहीं देख लें,हमारे परिवार का कोई भी सदस्य पानी तक नहीं पिएगा."

राजा ने तुरंत एक सैनिक को बुलाकर उससे कहा-"सैनिक हमारे नगर से कुछ दूर के गाँव में एक भवन निर्माण का कार्य चल रहा है.आज एक व्यक्ति तुमसे आकर यह पूछेगा कि काम कितना बाकी है? यह सुनते ही तुम उसकी गर्दन काटकर मेरे पास ले आना."

राजा की आज्ञा पाकर वह सैनिक चला गया.

कुछ देर बाद राजा ने हरपाल से को अपने पास बुला कर कहा-"हरपाल सिंह पास के एक गांव में बहुत बड़ा भवन बन रहा है तुम शीघ्र जाओ और वहां के कारीगर से पूछकर आओ कि काम कितना बाकी है?

"जो आज्ञा महाराज!"

हरपाल सिंह एक घोड़े पर सवार होकर अनजाने में अपने ही मृत्यु की ओर बढ़ चला.

हरपाल सिंह अश्व पर सवार हो कुछ विचार करते हुए यात्रा में मग्न था.

उसने देखा कि रास्ते पर ही एक बड़ा सा आयोजन हो रहा था जिसमें ज्ञान की चर्चा हो रही थी. हरपाल आगे बढ़ जाना चाहता था पर उसे बूढ़े की पांचवी बात याद आई-जहां भी ज्ञान की दो बातें मिले ध्यान से सुनो. वह घोड़े को एक वृक्ष से बांधकर कथा सुनने में रम  गया. चर्चा जब ज्ञान की हो तो समय कैसे बीत जाता है,पता ही नहीं चलता. हरपाल सिंह के साथ भी ऐसा ही हुआ.कैसे दिन डूबने को आई,पता ही न चला.

इधर राज परिवार के सदस्य भूख प्यास से तड़पने लगे. क्योंकि उन्होंने हरपाल सिंह के मरने के बाद ही अन्य जल ग्रहण करने की प्रतिज्ञा की थी. राजा का बेटा भूख-प्यास सहन नहीं कर सका.वह जानना चाहता था कि हरपालसिंह का सिर अब तक क्यों नहीं पहुंचा?

वास्तविकता जानने के लिए राजकुमार एक साधारण पुरुष का वेश बनाकर उसी सैनिक के पास जा पहुंचा जिसे राजा ने हरपाल सिंह का सिर काटने की आज्ञा दी थी.

वहां जाकर उसने सैनिक से पूछा-" काम अब तक पूरा क्यों नहीं हुआ?

वह सैनिक वेश बदले हुए राजकुमार को नहीं पहचान पाया. उसने समझा कि यही वो व्यक्ति है जिसका सिर काटने के लिए मुझे महराज ने यहाँ  भेजा है.

उसने झट राजकुमार का सिर काट दिया.

यदि हरपालसिंह बूढ़े की पांच बातें नहीं मानता तो क्या होता?

आरुणि की गुरु-भक्ति

कुछ कथाएँ ऐसी होती हैं कि एक बार पढ़ ली तो पूरी जिन्दगी उसकी याद रह जाती है। 'आरूणि की गुरू-भक्ति' एक  ऐसी ही कहानी है जो भारत के गौरवशाली गुरुकुल प्रथा को प्रकाशित करती है और हमारी सनातन परम्पराओं की श्रेष्ठता को सिद्ध करती है। अगर आपने नहीं पढ़ी है तो आप भी पढ़िए और जिन्होंने पहले पढ़ी है वे अपने बचपन की ओर लौट चलें।

हजारों वर्ष पहले भारत में आज की तरह स्कूल नहीं थे। लड़के गुरुओं के पास आश्रमों में रहकर शिक्षा प्राप्त करते थे। आश्रम वनों में होते थे और ऋषि-मुनि शिष्यों को विद्या देते थे। ऐसा ही एक आश्रम आयोद धौम्य ऋषि का था। इसके आसपास हरा-भरा वन था। इस वन में पशु निर्भय होकर विचरण करते थे।

यह आश्रम शिक्षा-दीक्षा के लिए दूर-दूर तक प्रसिद्ध था। विद्यार्थी यहाँ रहकर विद्या प्राप्त करते थे। वे गुरूजी के घर का काम भी करते थे। लकड़ी लाना, फल-फूल लाना, पानी लाना, ये सब काम उन्हीं के जिम्मे थे।

आयोद धौम्य के पास धान का एक खेत था। इसी की उपज से आश्रम का काम चलता था। विद्यार्थी बारी-बारी से खेत का काम करते थे। वे धान बोने, पौधे रोपने, निराई करने आदि में लगन से जुट जाते थे। आश्रम में विद्या के साथ-साथ समाज के उपयोगी काम भी सिखाए जाते थे।

महर्षि अपने शिष्यों से पिता के समान स्नेह करते थे। शिष्य भी गुरूजी की सेवा हृदय से करते थे। इन्हीं शिष्यों में एक था आरुणि। एक दिन खेत पर काम करने की बारी उसकी थी। उस दिन वर्षा हो रही थी। गुरूजी ने आरूणि से कहा, "वत्स, जाओ, जाकर देखो कि कहीं पानी खेत की मेड़ न तोड़ दे।"

आरुणि खेत पर पहुँचा संध्या होने वाली थी। आरुणि ने देखा कि एक जगह पर खेत की मेंड़ में दरार पड़ गई है। उसमें से पानी रिस रहा है। उसने दरार में कुछ मिट्टी डाली। वह बह गई उसने कंकर-पत्थर डाले, वे भी न रुक सके। दरार चौड़ी होती गई। उसकी चिंता बढ़ गई। ऐसा न हो कि मेंड़ फूट जाए और खेत का सब पानी बह जाए। वह तुरंत खेत के अंदर की तरफ मेंड़ के सहारे लेट गया। खेत में से पानी निकलना बंद हो गया। आरुणि भीग तो चुका ही था। ठंडे पानी में पड़े-पड़े ठंड के मारे उसके दाँत किटकिटाने लगे।

रात हो गई। वर्षा थम गई। आश्रम में चिंता होने लगी कि आरुणि अभी तक क्यों नहीं आया। गुरूजी व्याकुल हो उठे। खेत आश्रम से कुछ दूर था। अँधेरा फैल चुका था। गुरूजी ने चार-पाँच शिष्य बुलाए और निकल पड़े आरुणि को ढूँढ़ने। शिष्यों के हाथ में मशालें थीं। इसमे रास्ता देखने में कठिनाई नहीं हुई। कीचड़ भरा मार्ग पार करते हुए आयोद धौम्य अपने खेत पर पहुँचे। खेत के चारों ओर घटाटोप अँधेरा था। खेत में पानी भरा हुआ था। कहीं आरुणि नहीं दिखा। उनको और भी चिंता हुई। वे जोर से चिल्लाए, "बेटा आरुणि, बेटा आरुणि।"

आरुणि ठंड के मारे काँप रहा था। उसे ऐसा लग रहा था कि अब वह बेहोश होने वाला है। उसी समय उसके कानों में कुछ आवाज पड़ी। पर वह कुछ समझ नहीं सका। इतने में गुरूजी ने फिर पुकारा, "बेटा आरुणि, आरुणि।" आरुणि ने गुरूजी की आवाज पहचान ली।

वह कठिनाई से बोल सका, "

गुरूजी मैं यहाँ हूँ। खेत में मेड़ के किनारे लेटा हूँ। यहाँ मेड़ में दरार पड़ गई है।"

गुरूजी लपककर वहाँ पहुँचे। मशालें हाथ में लिए शिष्य भी साथ थे। गुरूजी ने आरुणि को देखा, तो अचंभे में रह गए।

इतना-सा लड़का और इतना साहस। गुरुजी ने उसे उठाया, सीने से लगा लिया। उनकी आँखों में आँसू बहने लगे। वे उसकी पीठ पर हाथ फेरते जाते थे और उसे आशीर्वाद देते जाते थे।

ऐसा था गुरु-भक्त आरुणि। बड़ा होकर यही आरुणि गुरूजी के आशीर्वाद से वेदों और शास्त्रों का बहुत बड़ा विद्वान बना। उद्दालक ऋषि के नाम से वह प्रसिद्ध हुआ।

गुरू की भक्ति में बड़ी शक्ति है।

चुरकी- मुरकी

एक गाँव में चुरकी और मुरकी नाम की दो बहनें रहती थीं। उनका एक भाई थाजो दूसरे गाँव में रहता था। चुरकी बहुत नम्र और सेवाभाव रखनेवाली थीजबकि मुरकी बड़ी घमंडी थी ।

एक दिन चुरकी का मन अपने भाई से मिलने का हुआ । उसने अपने बच्चे मुरकी की देखभाल में रख दिए और भाई के गाँव की ओर निकल पड़ी ।

चलते-चलते उसे एक बेर का पेड़ मिला । बेर के पेड़ ने चुरकी को पुकारा पूछा; “कहाँ जा रही हो ?” चुरकी बोली, “भैया के पास।” पेड़ बोला, “मेरा एक काम कर दो। जहाँ तक मेरी छाया पड़ती हैउतनी जगह को झाड़-बुहारकर लीप- पोंत दो। जब तुम लौटोगी तो मैं मीठे-मीठे बेर वहाँ टपका दूँगा। तुम अपने बच्चों के लिए ले जाना।” चुरकी ने यह काम कर दिया और आगे बढ़ी।

चलते-चलते उसे एक गोठान मिला जिसमें सुरही गायें थी। एक गाय ने चुरकी से पूछा, “कहाँ जा रही हो ?” चुरकी बोली, "भैया के पास। ” गाय ने कहा, "हमारे इस गोठान को साफ कर दो। लीप पोत दो। वापिस आते समय एक दोहनी लेती आना। उसे हम दूध से भर देंगी। वह तुम अपने बच्चों के लिए ले जाना।” चुरकी ने चुटकी बजाते यह कर दिया और आगे बढ़ी ।

आगे चल कर उसे एक मिट्टी का टीला मिला। उसमें से आवाज आई, "क्यों बहन ! कहाँ जा रही हो ?” चुरकी को बड़ा अचरज हुआ कि यह किसकी आवाज है। वह बोली, "मैं भैया के पास जा रही हूँपर तुम कौन हो ? यहाँ तो कोई भी दिखाई नहीं देता।" टीला बोलामैं मिट्टी का टीला बोल रहा हूँ। तुम मेरे आसपास की जमीन साफ-सुथरी कर दो। वापसी में मैं तुम्हारी मजदूरी चुकता कर दूंगा।” चुरकी ने फौरन सब कर दिया और आगे बढ़ी।

अब वह अपने भैया के गाँव पहुँच गई। भैया उसे गाँव की मेंड पर खेत में ही मिल गया। वह उससे बड़े प्रेम से मिला। उसने सुख-दुख की बातें की। अपने साथ लाया हुआ कलेवा उसे खिलाया। पर जब भाभी से मिलने घर पहुँचीतो उसका व्यवहार उसके साथ रूखा रहा पर खैर! चुरकी ने दूसरे दिन भाभी- भैया से विदा ली। उसने भाभी से एक दोहनी माँग ली थी। भैया ने उससे चने का साग तोड़ने के लिए कहा। उसने तोड़ लिया। उसी को लेकर वह घर की ओर चल पड़ी।

वापस आते हुए सबसे पहले उसे मिट्टी का टीला मिलाजिस पर रूपयों का ढेर लगा था। यह उसकी मजदूरी थी। उसने रुपए बटोर कर अपनी टोकरी में रख लिए और चने के साग से ढक दिए। थोड़ी देर बाद गोठान आ गया। वहाँ गाय ने उसकी दोहनी दूध से भर दी। गायों को प्रणाम कर वह आगे चल पड़ी।

फिर उसे बेर का वृक्ष मिला। पेड़ के नीचे पकेमीठे बेरों का ढेर लगा था। कुछ बेर उसने अपने आँचल में बाँधे और पेड़ को शीश नवाकर आगे बढ़ी।

घर पहुँचने पर मुरकी ने उसके पास जब इतनी चीजें देखीं तो उसने समझा कि ये सब भैया ने उसे बिदाई के रूप में दी होंगी। उसे लालच हो आया। उसने सोचा कि उसे भी भैया के यहाँ जाना चाहिए। दूसरे दिन वह भी अपने भाई के घर के लिए निकल पड़ी।

चलते-चलते उसे भी पहले बेर का वृक्ष मिला। पेड़ ने उससे वही बात कहीजो चुरकी से कही थीपरंतु मुरकी घमंडिन थी। उसने साफ मना कर दिया और आगे बढ़ गई।

आगे बढ़ने पर उसे गोठान मिला। वहाँ की गायों ने भी उससे सफाई कर देने के लिए कहा। वह उनपर चिढ़ गई। मना करके वह आगे बढ़ गई। आगे उसे मिट्टी का टीला मिला। टीले ने भी उससे वही बात कहीजो चुरकी से कही थी। मुरकी चिढ़ गई। उसने कहा, "क्या मैं गरीब हूँ. जो मजदूरी लूँगी ? मुझे मेरे भाई से बहुत रुपए मिल जाएँगे।" इस प्रकार सबका अपमान करके वह आगे बढ़ी।

गाँव की मेंड पर खेत में ही भाई से उसकी भेंट हो गई। भाई प्रेम से मिला। फिर घर पहुँचकर भाभी से मिली। भाभी का व्यवहार भी ठीक ही रहा। दूसरे दिन उसने भैया-भाभी से बिदा माँगी। भाभी ने बिदाई कर दी पर भेंट में कुछ नहीं दिया। खेत में भाई से मिली। भाई ने चने का साग तोड़ने को कहा । थोड़ा-सा साग लेकर वह चल पड़ी। वह मन ही मन बहुत दुखी हुई कि भैया-भाभी ने चुरकी को तो कितनी सारी विदाई दी थीमुझे कुछ नहीं दिया।

लौटते समय रास्ते में पुनः मिट्टी का टीला पड़ा। जैसे ही वह टीले के पास पहुंची तो वहाँ तीन-चार काले सर्प निकले और मुरकी की ओर बढ़े। घबराकर वह भागी। भागते-भागते वह गोठान तक पहुँची। वहाँ आराम करने के लिए थोड़ी देर रुकी तो वहाँ की सुरही गाएँ उसे मारने के लिए दौड़ीं। बेचारी मुरकी वहाँ से भी जान बचाकर भागी। किसी तरह गिरते-पड़ते वह बेर के पेड़ के पास पहुँची तो वहाँ बेर के काँटों का जाल बिछा हुआ था। काँटों से मुरकी के हाथ पैर छिद गए। उसमें उलझकर उसके वस्त्र फट गए।

वह इस तरह घायल होकर थकी माँदी किसी तरह चुरकी के घर तक पहुँची। चुरकी को उसकी हालत देखकर बहुत कष्ट हुआ। उसने सहानुभूति के साथ उसकी दयनीय दशा का कारण पूछा। मुरकी ने भैया-भाभी के पक्षपात और उनकी कंजूसी का दुखड़ा रोया। तब चुरकी ने उसे बताया कि भैया ने तो उसे कुछ नहीं दिया था। उसने यह भी पूछा, “रास्ते में तुमसे किसी ने कुछ करने को कहा था क्या ?” इसपर मुरकी ने उसे सारी बातें बताई। चुरकी सब कुछ समझ गई। वह बोली, “बहन ! तुमको बहुत घमंड था। इसलिए यह हालत हुई। संसार में घमंड किसी का भी नहीं टिकता। घमंड ही आदमी को नीचे गिराता है। "

अब्बू खाँ की बकरी (डॉ. जाकिर हुसैन)

हिमालय पहाड़ पर अल्मोड़ा नाम की एक बस्ती है। उसमें एक बड़े मियाँ रहते थे। उनका नाम था अब्बू खाँ। उन्हें बकरियाँ पालने का बड़ा शौक था। बस एक दो बकरियाँ रखतेदिन भर उन्हें चराते फिरते और शाम को घर में लाकर बाँध देते। उनकी बकरियाँ कभी-न-कभी रस्सी तुड़ाकर भाग जाती थीं।

जब भी कोई बकरी भाग जातीअब्बू खाँ बेचारे सिर पकड़कर बैठ जाते। हर बार यही सोचते कि अब बकरी नहीं पालूँगा। मगर अकेलापन बुरी चीज है। थोड़े दिन तक तो वे बिना बकरियों के रह लेतेफिर कहीं से एक बकरी खरीद लाते।

इस बार वे जो बकरी खरीद कर लाए थेवह बहुत सुंदर थी। अब्बू खाँ इस बकरी को बहुत चाहते थे। इसका नाम उन्होंने “चाँदनी” रखा था। दिन भर उससे बातें करते रहते। अपनी इस नई बकरी “चाँदनी” के लिए उन्होंने एक नया इंतजाम किया। घर के बाहर एक छोटे खेत में बाड़ लगवाई। चाँदनी को इसी खेत में बाँधते थे। रस्सी इतनी लम्बी रखते वह खूब इधर उधर घूम सके।

लेकिन चाँदनी पहाड़ की खुली हवा को भूल नहीं पाई थी। एक दिन चाँदनी ने पहाड़ की ओर देखा। उसने मन ही मन सोचावहाँ की हवा और यहाँ की हवा का क्या मुकाबला । फिर वहाँ उछलनाकूदनाठोकरें खाना और यहाँ हर वक्त बँधे रहना। मन में इस विचार के आने के बादचाँदनी अब पहले जैसी न रही। वह दिन पर दिन दुबली होने लगी। न उसे हरी घास अच्छी लगती और न पानी मजा देता। अजीब-सी दर्द भरी आवाज में "में-में” चिल्लाती रहती।

अब्बू खाँ समझ गए कि हो-न-हो कोई बात जरूर है। लेकिन उनकी समझ में न आता था कि बात क्या हैएक दिन जब अब्बू खाँ ने दूध दुह लियातो चाँदनी उदास भाव से उनकी ओर देखने लेगी। मानो कह रही हो, "बड़े मियाँअब मैं तुम्हारे पास रहूँगी तो बीमार हो जाऊँगी। मुझे तो तुम पहाड़ पर जाने दो।"

अब्बू खाँ मानो उसकी बात समझ गए। चिल्लाकर बोले, “या अल्लाहयह भी जाने को कहती है।” वे सोचने लगे, "अगर यह पहाड़ पर चली गईतो भेड़िया इसे भी खा जाएगा। पहले भी वह कई बकरियाँ खा चुका है।" उन्होंने तय किया कि चाहे जो हो जाएवे चाँदनी को पहाड़ पर नहीं जाने देंगे। उसे भेड़िए से ज़रूर बचाएँगे।

अब्बू खां ने चाँदनी को एक कोठरी में बंद कर दियाऊपर से साँकल चढ़ा दी। मगर वे कोठरी की खिड़की बंद करना भूल गए। इधर उन्होंने कुंडी चढ़ाई और उधर चाँदनी उचककर खिड़की से बाहर।

चाँदनी पहाड़ पर पहुँचीतो उसकी खुशी का क्या पूछना। पहाड़ पर पेड़ उसने पहले भी देखे थेलेकिन आज उनका रंग और ही था। चाँदनी कभी इधर उछलतीकभी उधर । यहाँ-कूदीवहाँ फाँदीकभी चट्टान पर हैतो कभी खड्डे में। इधर जरा फिसली फिर सँभली। दोपहर तक वह इतनी उछली-कूदी कि शायद सारी उम्र में इतनी न उछली-कूदी होगी।

शाम का वक्त हुआ। ठंडी हवा चलने लगी। चाँदनी पहाड़ से अब्बू खाँ के घर की ओर देख रही थी। धीरे-धीरे अब्बू खाँ का घर और काँटेवाला घेरा रात के अँधेरे में छिप रहा था।

रात का अँधेरा गहरा था। पहाड़ में एक तरफ आवाज आई "खूँ-खूँ"। यह आवाज सुनकर चाँदनी को भेड़िए का ख्याल आया। दिन भर में एक बार भी उसका ध्यान उधर न गया था। पहाड़ के नीचे सीटी और बिगुल की आवाज आई। वह बेचारे अब्बू खाँ थे। वे कोशिश कर रहे थे कि सीटी और बिगुल की आवाज सुनकर चाँदनी शायद लौट आए। उधर से दुश्मन भेड़िए की आवाज आ रही थी।

चाँदनी के मन में आया कि लौट चले। लेकिन उसे खूँटा याद आया। रस्सी याद आई। काँटों का घेरा याद आया। उसने सोचा कि इससे तो मौत अच्छी। आखिर सीटी और बिगुल की आवाज बंद हो गई। पीछे से पत्तों की खड़खड़ाहट सुनाई दी। चाँदनी ने मुड़कर देखा तो दो कान दिखाई दिएसीधे और खड़े हुए और दो आँखें जो अँधेरे में चमक रही थीं। भेड़िया पहुँच गया था।

भेड़िया जमीन पर बैठा था। उसकी नजर बेचारी बकरी पर जमी हुई थी। उसे जल्दी नहीं थी। वह जानता था कि बकरी कहीं नहीं जा सकती। वह अपनी लाल-लाल जीभ अपने नीले-नीले ओठों पर फेर रहा था। पहले तो
चाँदनी ने सोचा कि क्यों लडूँ। भेड़िया बहुत ताकतवर है। उसके पास नुकीले बड़े-बड़े दाँत हैं। जीत तो उसकी ही होगी। लेकिन फिर उसने सोचा कि यह तो कायरता होगी। उसने सिर झुकाया। सींग आगे को किए और पैंतरा बदला। भेड़िए से लड़ गई। लड़ती रही। कोई यह न समझे कि चाँदनी भेड़िए की ताकत को नहीं जानती थी। वह खूब समझती थी कि बकरियाँ भेड़ियों को नहीं मार सकती। लेकिन मुकाबला जरूरी है। बिना लड़े हार मानना कायरता है।

चाँदनी ने भेड़िए पर एक के बाद एक हमला किया। भेड़िया भी चकरा गया। लेकिन भेड़ियांभेड़िया था। सारी रात गुजर गई। धीरे-धीरे चाँदनी की ताकत ने जवाब दें दियाफिर भी उसने दुगना जोर लगाकर हमला किया। लेकिन भेड़िए के सामने उसका कोई बस नहीं चला। वह बेदम होकर जमीन पर गिर पड़ी। पास ही पेड़ पर बैठी चिड़ियाँ इस लड़ाई को देख रहीं थीं। उनमें बहस हो रही थी कि कौन जीता। बहुत-सी चिड़ियों ने कहा, 'भेड़िया जीता।पर एक बूढ़ी-सी चिड़िया बोली, ‘चाँदनी जीती।'

रक्षाबंधन

सावन के महीने का आखिरी दिन था। उस दिन रक्षाबंधन था। सब लड़‌कियाँ अच्छे कपड़े पहने थीं। वे अपने भाइयों को राखी बाँध रही थीं। यमुना अपनी माँ के साथ रहती थी। उसके कोई भाई न था।

यमुना ने अपनी माँ से कहा- "माँ, मेरी सहेलियाँ अपने भाइयों को राखी बाँध रही हैं। मैं किसे राखी बाँधू?"

माँ ने कहा- "बेटी, तुम जिसे भाई समझकर राखी बाँधोगी, वही तुम्हारा भाई होगा।"

यमुना ने कहा- "अच्छा माँ, मैं अवश्य भाई ढूँढूँगी और उसे राखी बाँधूंगी।"

यह कहकर यमुना बाहर जाने लगी। माँ ने उसे रोककर कहा- "देखो यमुना, भाई बनाना सरल है, पर इस रिश्ते को निभाना कठिन है। भाई को पाने के बाद तुम्हें सदा उसका आदर करना होगा।"

यमुना ने कहा-" मैं सदा अपने भाई का आदर करूँगी। पर माँ, भाई क्या करेगा ?"

माँ ने कहा- "भाई संकट में तुम्हारी रक्षा करेगा।"

माँ की बात सुनकर यमुना खुश हो गई। वह उछलती-कूदती बाहर आई और रास्ते पर खड़ी हो गई। थोड़ी देर में वहाँ से एक घुड़सवार निकला। यमुना ने उसे रोका। घुड़सवार ने पूछा- "क्या बात है बहिन? मुझे तुमने क्यों रोका ?" यमुना ने कहा- "आज रक्षाबंधन है। मैं तुम्हें राखी बाँधूंगी।'


सवार घोड़े से उतर पड़ा। उसने पूछा- तुम मुझे राखी क्यों बाँधना चाहती हो ?!' यमुना ने कहा- "मेरे भाई नहीं है। मैं तुम्हें भाई बनाना चाहती हूँ।"

घुड़सवार बोला- "अरे, यह तो बड़ी खुशी की बात है। आज सबकी कलाइयों पर राखी बंधी है। पर मेरी कलाई सूनी है। मेरे कोई बहिन नहीं है। तुम आज से मेरी बहिन हुई। तुम मुझे राखी बाँधोगी और मैं हमेशा तुम्हारी रक्षा करूँगा।"

यमुना खुश हुई। उसने कहा "भैया, घर चलो।" दोनों घर आए।


यमुना के भाई ने माँ को प्रणाम किया। यमुना ने पहले चौक पूरा। उस पर पीढ़ा रखा। थाली में आरती सजाई और उसमें मिठाई, नारियल और राखी रखी। अपने भाई को पीढ़े पर बिठाया। उसे तिलक लगाया। उसकी आरती उतारी और उसकी कलाई पर राखी बाँध दी। फिर उसेः नारियल और मिठाई दी।

भाई ने अपनी बहिन के चरणों पर माथा टेका। बहिन को भाई मिला। भाई को बहिन मिली। यह देखकर माँ की आँखों में आनंद के आँसू उमड़ आए।

कौन जीता ?

गंगा नदी के किनारे एक बरगद का पेड़ था। उस पेड़ पर बहुत से पक्षी रहते थे। इन्हीं में एक कौआ भी था। कौआ लँगड़ा था और घमंडी भी।

बरगद के नीचे आराम करते हंस और पेड़ पर बैठा कौआ 
एक दिन सुबह-सुबह तीन हंस बरगद के नीचे आकर बैठे। वे बहुत दूर से उड़कर आ रहे थे। यहाँ सुस्ताने के लिए ठहर गए थे। हंसों को देखकर लंगड़ा कौआ बोला, "अरे, आप यहाँ क्यों बैठे हैं? क्या यह बरगद आपका है?" कौए की बात का हंसों ने कोई उत्तर नहीं दिया। इस पर कौए को गुस्सा आ गया। वह उड़कर हंसों के अधिक पास आ गया। वह कहने लगा, "काँव, काँव, काँव। अरे, तुम लोगों के मुँह में जबान नहीं है क्या? बोलते क्यों नहीं? यहाँ क्यों आए हो?"

एक हंस बोला, "भाई, हम हंस हैं। हिमालय से आ रहे हैं। थोड़ी देर आराम करके यहाँ से चले जाएँगे।" कौआ बोला, "तुम लोग उड़ना भी जानते हो या नहीं। तुम्हारे पंख दिखावटी तो नहीं हैं?" हंस चुप रहे। कौआ फिर भी काँव काँव करता रहा। हंसों में से एक अभी बच्चा ही था। उसे कौए की बात चुभ रही थी। उसने

बोलना चाहा, लेकिन दूसरे हंस ने उसे रोक दिया।

कौआ फिर बोला, "अरे, उड़ना जानते हो, तो आ जाओ। मैं पचासों तरह की उड़ानें जानता हूँ। हो दम, तो मेरे साथ उड़ लो।" हंस के बच्चे से अब नहीं रहा गया। उसने कहा, "भैया, मुझे तो केवल एक उड़ान आती है। अगर उड़ना चाहो तो उड़ लो।"

कौए ने कहा, "बस ! एक ही उड़ान जानते हो। खैर उसे ही देखूँगा।" कौआ और हंस का बच्चा उड़ने लगे। दोनों गंगा नदी के ऊपर उड़ रहे थे। कौआ आगे था और हंस का बच्चा पीछे। कौए ने मुड़कर कहा, "इतने पीछे क्यों रह जाते हो ?" एक उड़ान जानते हो, सो भी अच्छी तरह नहीं। थक गए हो, तो बताओ।"

हंस बोला, "कोई बात नहीं है भैया, उड़े चलो।"

उड़ान भरता हंस का बच्चा और घमंडी कौआ 
दोनों उड़ते रहे, कौआ फिर बोला, "थक गए क्या?" हंस उड़ते हुए बोला, "नहीं, उड़ते चलो।" आखिर कौआ उड़ते-उड़ते थक गया। उसका दम फूलने लगा। अब तो वह पानी में गिरने को हुआ।

हंस पीछे था। वह बोला, "पचासों उड़ानों में से यह कौन सी उड़ान है ?" कौए ने उत्तर दिया, "भैया, मैं तो मर रहा हूँ। तुम उड़ान की बात कर रहे हो।" हंस को कौए पर दया आ गई। वह कौए के पास पहुंचकर बोला, "जल्दी से मेरी पीठ पर बैठ जाओ।" कौआ हंस की पीठ पर बैठ गया। हंस ने कहा, "जमकर बैठे रहना। अंब मेरी उड़ान देखो।"

हंस तेजी से उड़ा। वह दूर आकाश में पहुँच गया। पीठ पर बैठा कौआ डर के मारे काँपने लगा। उसने तो बरगद के आसपास ही चक्कर लगाए थे। इतने ऊँचे उड़कर आने की बात कभी सोची भी न थी। डर के मारे उसका बोल बंद हो गया। गिड़गिड़ाते हुए वह हंस से बोला, "भैया मुझे तो जल्दी से बरगद पर पहुँचा दो। फिर तुम उड़ान भरना।" हंस बोला, "अरे, डर गए क्या ? चलते हो हमारा देश देखने ?"

"ना भैया, ना। हम तो यहीं भले हैं। तुम तो मुझे वापस ले चलो।" हंस को कौए पर फिर दया आ गई। वह कौए से बोला, "अभी तो घमंड की बड़ी- बड़ी बातें कर रहे थे। लेकिन अब क्या हो गया ?" कौआ कुछ न बोला।

अंत में हंस बरगद की ओर लौट पड़ा। वह धीरे-धीरे नीचे उतरा। कौआ उड़कर बरगद की डाल पर बैठ गया। वह फिर काँव-काँव करके हसों को चिढ़ाने लगा।

अब तुम्हीं बताओ कि कौए या हंस में से किसकी जीत हुई ?

 

 

बालक चंद्रगुप्त

पाटलिपुत्र के पिपली कानन के मौर्य सेनापति का एक टूटा-फूटा घर था। महापद्मनंद के अत्याचार से मगध काँप रहा था। मौर्य सेनापति के बंदी हो जाने के कारण उनके कुटुंब का जीवन किसी प्रकार कष्ट में बीत रहा था।

एक बालक उसी घर के सामने खेल रहा था। कई लड़के उसकी प्रजा बने थे और वह था राजा। उन्हीं लड़कों में से वह किसी को घोड़ा किसी को हाथी बनाकर चढ़ता और दंड तथा पुरस्कार आदि देने का राजा के समान अभिनय कर रहा था।

उसी ओर से एक ब्राह्मण जा रहे थे। उनका नाम था 'चाणक्य'। वे बड़े बुद्धिमान थे। उन्होंने उस बालक की राजक्रीड़ा बड़े ध्यान से देखी। उनके मन में कौतुहल भी हुआ और कुछ विनोद भी सूझा। उन्होंने ठीक-ठीक ब्राह्मण की तरह उस बालक के पास जाकर याचना की, "राजन, मुझे दूध पीने के लिए गऊ चाहिए।"

बालक ने राजा के समान उदारता का अभिनय करते हुए, सामने चरती हुई गायों को दिखाकर कहा - "इनमें से जितनी इच्छा हो, तुम ले लो। "

ब्राहमण ने हँसकर कहा, “राजन्, ये गायें जिसकी हैं, वह मारने लगे तो ?”

बालक ने गर्व के साथ छाती फुलाकर कहा - " किसका साहस है, जो मेरे शासन को न माने? जब मैं राजा हूँ, तब मेरी आज्ञा अवश्य मानी जाएगी।"
ब्राह्मण ने आश्चर्य से पूछा, "राजन्, आपका शुभ नाम क्या है ?"

तब तक उसकी माँ वहाँ आ गई और ब्राह्मण से हाथ जोड़कर बोली, "महाराज, यह बड़ा ढीठ लड़का है। इसके किसी अपराध पर ध्यान न दीजिएगा। "

चाणक्य ने कहा- "कोई चिन्ता नहीं, यह बड़ा होनहार बालक है। उन्नति के लिए तुम इसे किसी प्रकार राजकुल में भेजा करो। " उसकी माँ रोने लगी और बोली- “हम लोगों पर राजकोष है और हमारे पति राजा की आज्ञा से बंदी किए गए है। "

ब्राह्मण ने कहा, “बालक का कुछ नहीं बिगड़ेगा। तुम इसे अवश्य राजकुल में ले जाओ। ” इतना कहकर बालक को आर्शीवाद देकर वह चला गया। उसकी माँ बहुत डरते-डरते एक दिन अपने चंचल और साहसी लड़के को लेकर राज- सभा में पहुँची।

नंद एक निष्ठुर, मूर्ख और निर्दयी राजा था । उसकी राजसभा बड़े-बड़े चापलूस मूर्खो से भरी रहती थी। पहले राजा लोग एक-दूसरे के बल, बुद्धि और वैभव की परीक्षा लिया करते थे और इसके लिए वे तरह-तरह उपाय रचते थे ।

उसी समय, जव बालक माँ के साथ राज सभा में पहुँचा, किसी राजा के यहाँ से नंद की राज-सभा की बुद्धि का अनुमान करने के लिए, लोहे के पिजड़े में मोम का सिंह बनाकर भेजा गया था और उसके साथ यह कहलाया गया था कि पिंजड़े को खोले बिना सिंह को निकाल लीजिए । सारी राज सभा इस पर विचार करने लगी। पर उन चापलूस, मूर्खो को कोई उपाय नहीं सूझा |

अपनी माता के साथ बालक वह लीला देख रहा था। वह भला कब मानने वाला था ? उसने कहा, “मैं निकाल दूँगा।" सब लोग हँस पड़े। बालक की ढिठाई भी कम न थी। राजा नंद को भी आश्चर्य हुआ। नंद ने कहा, "यह कौन है ?"

मालूम हुआ कि राजबंदी मौर्य सेनापति का यह लड़का है। फिर क्या था । नंद की मूर्खता की अग्नि में एक और आहुति पड़ी । क्रुद्ध होकर बोला, “यदि तू इसे न निकाल सकेगा, तो तू भी इस पिंजड़े में बंद कर दिया जाएगा।" उसकी माता ने देखा कि यह कहाँ से विपत्ति आई । परंतु बालक बिना डरे आगे बढ़ा और पिंजड़े के पास जाकर उसने उसको भली-भाँति देखा। फिर लोहे की छड़ों को गर्म करके उस सिंह को गलाकर पिंजड़े को खाली कर दिया।

सब लोग चकित रह गए। राजा ने पूछा, “तुम्हारा नाम क्या है ?" उसने कहा, "चंद्रगुप्त ।” राजा ने प्रसन्न होकर उसे तक्षशिला के विश्वविद्यालय में पढ़ने के लिए भेजा। आगे चलकर यही बालक, ब्राहमण 'चाणक्य' की सहायता से, चक्रवर्ती सम्राट "चंद्रगुप्त मौर्य" हुआ।

सपूत ( पुरुषोत्तम दास गुप्त )

       

एक कुएँ पर कुछ स्त्रियाँ पानी भर रही थीं। इन्हीं में चार स्त्रियाँ सरस्वतीमैनागिरिजा और फूलवती थीं। चारों के एक-एक पुत्र था। पानी भरते-भरते बातें चल पड़ीं। वे अपने-अपने पुत्रों के गुणों की प्रशंसा करने लगीं।

सरस्वती कुछ पढ़ी-लिखी थी। पहले वही बोली, "मेरा बेटा ज्ञानचंद बड़ा विद्वान है। उसे हजारों श्लोक मुखाग्र हैं। मैं तो ऐसा बेटा पाकर खुश हूँ।"

 मैना पढ़ी लिखी तो न थीपर गाने-बजाने का उसे बड़ा शौक था। उसने अपने पुत्र मोहन को संगीत सिखाया था। सरस्वती की बात सुनकर मैना चुप न रह सकी। कंगनों पर हाथ फेरते हुए उसने कहा, "भगवान ने मुझे जैसा बेटा दिया है, वैसा सबको दे। मोहन के गले की तारीफ मैं तुमसे क्या करूँ?" जब वह तान छेड़ता है। तो लोग वाह-वाह कर उठते हैं।"

         गिरिजा मैना की बात बड़े ध्यान से सुन रही थी। उन दोनों के बेटों की प्रशंसा वह सहन न कर सकी। करधनी ठीक करते हुए बड़े गर्व के साथ उसने कहा, "तुम लोगों ने जो कहासो तो ठीक हैपर मेरे गणेश की बात कुछ और है। वह बहुत बलवान है। उसकी बराबरी का पहलवान दूर-दूर तक नहीं है।"

         अब बोलने की बारी फूलवती की थी। पर वह चुप रही। उसने अपने बेटे के गुण नहीं गाए। सरस्वती ने कहा, "बहन तुम्हारे भी तो एक बेटा है। तुम क्यों मौन हो ?"

फूलवती को मौन तोड़ना पड़ा। वह बड़ी नम्रता से बोली, "मैं क्या कहूँ दीदी! मेरा राम न विद्वान हैन गायक है और न पहलवान है। उसमें ऐसा कोई गुण नहीं हैजैसा तुम लोगों के बेटों में है। वह तो सीधा-सादा है।"

इन चारों स्त्रियों की बातें एक वृद्धा सुन रही थी। वह भी पनघट पर पानी भरने आई थी। अब तक वे पानी भर चुकी थीं। उन्होंने अपने-अपने घड़े उठाए और घर की राह ली। वृद्धा के पीछे-पीछे चलने लगीं। वे कुछ ही कदम चली थी कि सरस्वती का बेटा ज्ञानचंद जोर-जोर से श्लोकों का उच्चारण करता हुआ निकल गया। सरस्वती ने अपनी साथिनों की तरफ बड़े अभिमान से देखा।

वे कुछ आगे बढ़ीं। कोई बड़े सुरीले कंठ से गाता हुआ आ रहा था। उसके पास आ जाने पर उन्होंने देखा कि वह मैना का बेटा मोहन था। मैना अपने बेटे की सुरीली तान सुनकर बहुत खुश हुई। मोहन गाता हुआ आगे निकल गया।

वे आगे बढ़ती गईं। सबने देखा कि एक नौजवान अकड़ता हुआ सामने आ रहा था। उसकी चाल में हाथी जैसी मस्ती थी। उसका सीना तना हुआ था। गिरिजा ने अभिमान के साथ बताया कि वह उसका बेटा गणेश है। गणेश अपनी मस्ती में इन सबके पास से होता हुआ निकल गया।

          

वे कुछ और आगे चलीं तो उन्हें एक नवयुवक दिखा। वह जल्दी-जल्दी कदम बढ़ाता हुआ लपककर उनके पास आया। उसने फूलवती के सिर पर से पानी का बर्तन ले लिया। उसने यह बर्तन अपने कंधे पर रखा और इनके आगे-आगे चलने लगा। वह फूलवती का बेटा राम था।

 वृद्धा उनके साथ चल ही रही थी। वह यह सब कुछ देखती सुनती आ रही थी। मैना ने उससे कहा, "माँजीतुमने हमारे बेटे देखे। तुम्हीं बताओ सबसे अच्छा बेटा किसका है ?"

 वृद्धा ने धीरज के साथ उत्तर दिया, "कहाँ.. मैंने तो तुम लोगों के बेटे देखे ही नहीं। हाँमुझे तो एक ही बेटा दिख रहा हैवह जो कंधे पर घड़ा लेकर आगे-आगे जा रहा है। मेरे विचार में वही बेटा हैवही सपूत है।"

वृद्धा की बात सुनकर तीनों का घमंड चूर हो गया। बात भी सच है। सपूत वही है जो अपने माता-पिता की सेवा करता है।