कुछ कथाएँ ऐसी होती हैं कि एक बार पढ़ ली तो पूरी जिन्दगी उसकी याद रह जाती है। 'आरूणि की गुरू-भक्ति' एक ऐसी ही कहानी है जो भारत के गौरवशाली गुरुकुल प्रथा को प्रकाशित करती है और हमारी सनातन परम्पराओं की श्रेष्ठता को सिद्ध करती है। अगर आपने नहीं पढ़ी है तो आप भी पढ़िए और जिन्होंने पहले पढ़ी है वे अपने बचपन की ओर लौट चलें।
हजारों वर्ष पहले भारत में आज की तरह स्कूल नहीं थे। लड़के गुरुओं के पास आश्रमों में रहकर शिक्षा प्राप्त करते थे। आश्रम वनों में होते थे और ऋषि-मुनि शिष्यों को विद्या देते थे। ऐसा ही एक आश्रम आयोद धौम्य ऋषि का था। इसके आसपास हरा-भरा वन था। इस वन में पशु निर्भय होकर विचरण करते थे।
यह आश्रम शिक्षा-दीक्षा के लिए दूर-दूर
तक प्रसिद्ध था। विद्यार्थी यहाँ रहकर विद्या प्राप्त करते थे। वे गुरूजी के घर का
काम भी करते थे। लकड़ी लाना, फल-फूल लाना, पानी
लाना, ये सब काम उन्हीं के जिम्मे थे।
आयोद धौम्य के पास धान का एक खेत था। इसी
की उपज से आश्रम का काम चलता था। विद्यार्थी बारी-बारी से खेत का काम करते थे। वे धान
बोने, पौधे रोपने, निराई करने आदि में लगन से जुट जाते थे।
आश्रम में विद्या के साथ-साथ समाज के उपयोगी काम भी सिखाए जाते थे।
महर्षि अपने शिष्यों से पिता के समान स्नेह
करते थे। शिष्य भी गुरूजी की सेवा हृदय से करते थे। इन्हीं शिष्यों में एक था
आरुणि। एक दिन खेत पर काम करने की बारी उसकी थी। उस दिन वर्षा हो रही थी। गुरूजी
ने आरूणि से कहा,
"वत्स, जाओ, जाकर
देखो कि कहीं पानी खेत की मेड़ न तोड़ दे।"
आरुणि खेत पर पहुँचा संध्या होने वाली थी। आरुणि ने देखा कि एक जगह पर खेत की मेंड़ में दरार पड़ गई है। उसमें से पानी रिस रहा है। उसने दरार में कुछ मिट्टी डाली। वह बह गई उसने कंकर-पत्थर डाले, वे भी न रुक सके। दरार चौड़ी होती गई। उसकी चिंता बढ़ गई। ऐसा न हो कि मेंड़ फूट जाए और खेत का सब पानी बह जाए। वह तुरंत खेत के अंदर की तरफ मेंड़ के सहारे लेट गया। खेत में से पानी निकलना बंद हो गया। आरुणि भीग तो चुका ही था। ठंडे पानी में पड़े-पड़े ठंड के मारे उसके दाँत किटकिटाने लगे।
रात हो गई। वर्षा थम गई। आश्रम में चिंता
होने लगी कि आरुणि अभी तक क्यों नहीं आया। गुरूजी व्याकुल हो उठे। खेत आश्रम से
कुछ दूर था। अँधेरा फैल चुका था। गुरूजी ने चार-पाँच शिष्य बुलाए और निकल पड़े
आरुणि को ढूँढ़ने। शिष्यों के हाथ में मशालें थीं। इसमे रास्ता देखने में कठिनाई
नहीं हुई। कीचड़ भरा मार्ग पार करते हुए आयोद धौम्य अपने खेत पर पहुँचे। खेत के
चारों ओर घटाटोप अँधेरा था। खेत में पानी भरा हुआ था। कहीं आरुणि नहीं दिखा। उनको
और भी चिंता हुई। वे जोर से चिल्लाए, "बेटा आरुणि, बेटा आरुणि।"
आरुणि ठंड के मारे काँप रहा था। उसे ऐसा
लग रहा था कि अब वह बेहोश होने वाला है। उसी समय उसके कानों में कुछ आवाज पड़ी। पर
वह कुछ समझ नहीं सका। इतने में गुरूजी ने फिर पुकारा, "बेटा
आरुणि, आरुणि।" आरुणि ने गुरूजी की आवाज पहचान ली।
वह कठिनाई से बोल सका, "
गुरूजी मैं यहाँ हूँ। खेत में मेड़ के किनारे लेटा हूँ। यहाँ मेड़ में दरार पड़ गई है।"गुरूजी लपककर वहाँ पहुँचे। मशालें हाथ
में लिए शिष्य भी साथ थे। गुरूजी ने आरुणि को देखा, तो अचंभे में रह गए।
इतना-सा लड़का और इतना साहस। गुरुजी ने
उसे उठाया,
सीने से लगा लिया। उनकी आँखों में आँसू बहने लगे। वे उसकी पीठ पर
हाथ फेरते जाते थे और उसे आशीर्वाद देते जाते थे।
ऐसा था गुरु-भक्त आरुणि। बड़ा होकर यही
आरुणि गुरूजी के आशीर्वाद से वेदों और शास्त्रों का बहुत बड़ा विद्वान बना।
उद्दालक ऋषि के नाम से वह प्रसिद्ध हुआ।
गुरू की भक्ति में बड़ी शक्ति है।
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