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लोमड़ी बालक (मध्यप्रदेश की लोककथा)

 बहुत पुरानी बात है। एक लोमड़ी मध्यप्रदेश के एक आदिवासी गाँव में घुस गई। गाँव के लोग खेतों और जंगलों में काम करने के लिए गए हुए थे। एक आदिवासी महिला अपने अपने बच्चे को चटाई पर सोता छोड़कर घास का गट्ठर लेने चली गई। वापस आने पर देखा, तो बच्चा वहाँ नहीं था।

माँ रोती बिलखती अपने बच्चे को पागलों की तरह इधर-उधर ढूँढने निकल पड़ी लेकिन कहीं कुछ पता न चला। गाँव के लोगों को खबर मिली तो वे भी परेशान हो गए, आखिर घर में सोता बच्चा कहाँ गया? कई लोग जंगल में उसकी तलाश में भी गए पर उस बच्चे का कुछ पता न चल सका।

उस बच्चे को एक लोमड़ी ले गई थी। किसी की नजर उस पर नहीं पड़ी थी लेकिन वापस जंगल जाते समय एक जंगली कुत्ते की नजर उस पर पड़ गयी और वह उसके पीछे दौड़ा भी। जब तक कुत्ता उसके पास पहुँचता वह बच्चे को लेकर एक संकरी गुफा में घुस गई।

लोमड़ी अकेली थी। उसे बच्चा बड़ा प्यारा लगा और उसने उसे पालने का सोच लिए। लोमड़ी बड़े प्यार से इसे अपना दूध पिलाती। रोता तो करतब दिखा-दिखाकर उसे हँसाती। वह बच्चा भी अब लोमड़ी को ही अपनी असली माँ समझने लगा।

महीने गुजरते गए और  फिर साल बीतने को आया। बच्चे की असली माँ ने संतोष कर लिया था। मगर लोमड़ी उसे अपने कलेजे का टुकड़ा समझने लगी थी। खुद भूखी-प्यासी रहती, लेकिन अपने लाडले बच्चे को सदा खुश रखती।

धीरे-धीरे बालक अपनी लोमड़ी माँ की तरह हाथ-पैरों पर चलना सीखने लगा। वह हाथों को भी पाँवों की तरह जमीन पर रखता और छलांगे लगाता। लोमड़ी उसे अपने साथ जंगल में ले जाती, शिकार करना और शिकार होने से बचना सिखाती। नंगधड़ंग बालक उसके साथ बंदर की तरह पड़ा रहता। उसे न सर्दी में जुकाम होता और न ही गर्मी महसूस होती। वह पूरा जंगली बनता जा रहा था।

एक दिन कुछ शिकारी जंगल से गुजर रहे थे। अचानक उन्होंने लोमड़ी और हाथ-पैरों से चौपाये जानवर की तरह चलते बालक को देखा, तो हक्के-बक्के रह गए। एक शिकारी उनकी तरफ दौड़ा मगर लोमड़ी तुरंत बच्चे को ले पास की घनी झाड़ियों में लोप हो गई।

शिकारियों ने कई घंटे तक उनकी तलाश की। हारकर वे गाँव में आए।

लोमड़ी और उसके विचित्र बच्चे के बारे में कई लोगों से पूछा गया। कुछ पता न लगा।

अब गाँव के लोगों में भी चर्चा होने लगी। आखिर लोमड़ी के साथ कौन रहता है? लगता तो आदमी का बच्चा है, उसके पास कैसे पहुँचा। पास के कई गाँवों में यह खबर फैल गई। गाँव के प्रधान ने कहा कि जो उस चौपाए बालक को पकड़कर लाएगा, उसे अच्छा-खासा इनाम दिया जाएगा।

गाँव के पास ही एक विद्यालय था जहाँ पहाड़ी आदिवासी जातियों के बच्चे पढ़ते थे। एक दिन उनके अध्यापक जंगल की तरफ जा रहे थे। तभी उन्हें यह बच्चा अपनी लोमड़ी माँ के साथ घूमता दिखाई दिया।

मास्टर जी ने शोर मचाया "मिल गया, दौड़ो। वह भागा, वह भागा।"

कुछ बड़े बालक अपने गुरूजी की सहायता के लिए आए। लोमड़ी और उसके विचित्र बच्चे को चारों ओर से घेर लिया। लोमड़ी तनकर खड़ी हो गई। मास्टर जी समझदार थे। उन्होंने माँ की ममता पहचानी। लोमड़ी के पास बड़े प्यार से गए। कुछ खाने को दिया और फिर बच्चे को पकड़ने आगे बढ़े।

उसी समय लोमड़ी बालक अध्यापक को काटने दौड़ी । बड़ी मुश्किल से बालक को पकडकर आश्रम लाया गया। लोमड़ी भी उनके साथ-साथ आई। उसने कई दिन तक अपने बच्चे के वियोग में खाया पीया भी नहीं। आश्रम में कई दिन तक उसे देखनेवालों की भीड़ लगी रही।

गुरु जी उस लोमड़ी बालक को स्नेह से पालने लगे। उसे बड़ी कठिनाई से दो पाँवों पर चलना सिखाया गया। पहली बार जब उसे कपड़े पहनाए गए, तो वह उन्हें अपने नाखूनों से फाड़ने लगा।

एक दिन वह फिर जंगल में जाने के लिए मचल उठा। वह घर से भाग निकला। सारे आश्रमवासी परेशान हो गए। आश्रम के संचालक और उनकी पत्नी ने तो कई दिन तक कुछ खाया पीया तक नहीं।

एक दिन बड़ा करिश्मा हुआ। संचालक अपने घर में थे। अचानक बाहर शोर मचा - "लौट आया। लौट आया।"

गुरूजी और उनकी पत्नी दौड़े-दौड़े बाहर आए। सामने देखा, तो पुलक उठे। लोमड़ी बालक लौट आया था।

अब वह कहीं नहीं भागता। आश्रम के दूसरों लड़कों की तरह पढ़ता लिखता है और खेलता था। पर कभी-कभी लोमड़ी की तरह "चीखने-चिल्लाने" की आदत उसे जरूर होती। कुछ लोग प्यार से उसे लोमड़ी सिंह के नाम से भी पुकारते थे वैसे गुरूजी और उनकी पत्नी ने उसका नाम शेर सिंह रखा था।


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