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युवा शिकारी और बाघिन (पावी आदिवासी लोककथा)

पावी जनजाति में एक लोककथा प्रचलित है. बात पुरानी है  - एक युवा शिकारी अपने ही गाँव की किसी वन्य सुन्दरी पर मुग्ध हो गया। दोनों के बीच प्यार बढ़ता गया और विवाह की तिथि तय कर दी गई। पावी प्रेमी-प्रेमिका विवाह की तिथि की प्रतीक्षा में और भी अधीर होते गए और झूम खेतों (खेती करने का एक पारंपरिक तरीका) में छुप-छुप कर मिलते।

एक दिन बड़ी गर्मी थी। लड़की को जोर की प्यास लगी। उसने अपने प्रेमी से कहा कि वह पास के गड्ढे के पास  जाकर अपनी प्यास बुझाना चाहती है। युवा शिकारी ने उसे वहाँ जाने से मना किया क्योंकि उसे पता था कि वहाँ के पानी में कुछ जादू है जो व्यक्ति का रूप बदल सकता है।

युवती ने प्रेमी की सलाह मान ली किंतु अपनी प्यास पर काबू न पा सकी। वह आखिरकार उस गड्ढे पर पहुँच गई। उसने अंजुली भर कर पानी पिया और अपने प्रेमी के पास लौट आई।

प्रेमी अपनी प्रेमिका से अगले दिन मिलने के बारे में कुछ कहने ही वाला था कि अचानक प्रेमिका का रूप बदलने लगा। पहले उसके पाँव लंबे हुए फिर हाथ और फिर उनके चार पैर बन गए। नाखून बड़े-बड़े हो गए और देखते ही देखते वह एक जंगली बाघिन बन गई। यह सब देखकर वह युवा शिकारी घबरा गया। अपनी प्रेमिका को इस रूप में देखकर उसका हृदय व्यथित हो गया। उसे प्रेमिका पर क्रोध भी आया। उसने उसे उस जगह का पानी पीने से मना किया था। किंतु बहुत देर हो चुकी थी। क्या करता बेचारा। भाग्य को कोसता हुआ वह अपना सर पिटते हुए घर की तरफ चल पड़ा। उसकी बाघिन प्रेमिका भी पीछे-पीछे चलने लगी। लेकिन उसे गाँव में कैसे रखा जाता अतः पास के जंगल में छोड़ आया।

इस घटना में गाँव से सब लोग आश्चर्यचकित थे। बाघिन बनी लड़की के माता-पिता तो बहुत ही दुखी थे। बेटी की चाहत में वे कुछ भी करने को तैयार थे यहाँ तक कि उन्होंने अपने पशु बाघिन लड़की को खाने के लिए भेजने शुरू किए। वह पूरा पशु एक या दो दिन में खा जाती। आखिर पशुओं की संख्या घटने लगी। उसने आदमियों का शिकार करना भी शुरू कर दिया।

गाँव के लोग घबराए हुए थे। उन्होंने बाध लड़की को मारने की योजना बनाई। एक-दो बार कुछ शिकारी उसके पीछे दौड़े लेकिन सफलता न मिल सकी। एक शिकारी तो खुद उसका शिकार हो गया।

जंगल के हिंसक पशु घबराए हुए थे। गाँव के पशु तो पहले ही समाप्त हो गए थे। अब जंगल के पशु भी खत्म होने लगे। तूफान मा मचा हुआ था। लोग त्राहि-त्राहि कर उठे।

आखिरकार गाँव के लोगों ने निर्णय किया कि युवा शिकारी को ही यह काम सौंपा जाए। गाँव का मुखिया पंचों को लेकर उसके घर गया। उसने अनुरोध किया कि वह बाघिन को यथाशीघ्र मार भगाए। युवा शिकारी परेशान था। क्या उसे अपनी प्रेमिका का ही शिकार करना पड़ेगा? उसने गाँववालों से कहा- "मझे गाँव से निकाल दो लेकिन यह, जघन्य कर्म मुझसे न कराओ। मैं अपनी प्रेमिका को नहीं मार सकूँगा। भले ही वह बाघिन बनकर पशुओं तथा आदमियों का शिकार कर रही हो।"

गाँव के लोगों ने कहा, "लेकिन वह अब तुम्हारी प्रेमिका कहाँ रही? वह तो क्रूर हिंसक पशु है जो निर्बोध पशुओं और लाचार इंसानों को सबको खाए जा रही है। कल हम भी जिंदा नहीं बचेंगे और एक दिन तुम भी उसके शिकार बन जाओगे।"

शिकारी उन तर्कों को सुनकर भी तैयार नहीं हुआ। तभी एक वृद्धा आदिवासिन दौड़ी-दौड़ी आई। उसने कहा- "शिकारी बेटे, अब हमसे नहीं सहा जाता। तुम्हारी प्रेमिका बाघिन पहले मेरे पशुओं को खा गई, फिर मेरे पति को और आज मेरा इकलौता बेटा भी उसकी बलि चढ़ गया। क्या अब भी तुम उस पर तरस ही खाते रहोगे?

शिकारी विवश था। उसने अपने शस्त्र उठाए और जंगल की ओर बेमन से अपनी प्रेमिका का शिकार करने चल पड़ा। लेकिन वह प्रेमिका अब रही नहीं थी वह एक शिकारी बाघिन बन गई है। आखिर एक शिकारी ने दूसरे  शिकारी की जान ले ही ली। बाघिन-प्रेमिका सदा के लिए सो गई। कुछ लोगों का कहना है कि शिकारी भी अपार दुख को सहन न कर सका और खुद की भी जान दे दी।

एक सुखमय प्रेम के ऐसे ह्रदय विदारक परिवर्तन की यह लोककथा आज भी पावी जनजाति बड़े दर्द के साथ सुनाई जाती है।

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