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गाने वाली चिड़िया और चीन का राजा

चीन देश में एक राजा बहुत ही सुंदर महल में रहता था। उसे अपने महल पर बहुत गर्व था। संसार के कोने-कोने से यात्री महल को देखने आते। राजा को इससे बहुत प्रसन्नता होती। यात्रियों ने अपने यात्रा-वर्णनों में महल की सुंदरता के बारे में कई बातें लिखीं। उन्होंने एक गाने वाली चिड़िया के बारे में भी लिखा। यह चिड़िया महल के पास वाले जंगल में रहती थी और बहुत मधुर स्वर में गाती थी।

राजा ने इस चिड़िया को कभी गाते हुए नहीं सुना था और न ही उसके बारे में कभी किसी ने उसे कुछ बताया ही था। इन यात्रियों द्वारा लिखे यात्रा-वर्णनों में जब उसने इस गानेवाली चिड़िया के बारे में पढ़ा तो उसने अपने मंत्रियों को बुलाया।

राजा ने कहा- तुम लोगों ने कभी मुझे गानेवाली चिड़िया के बारे में नहीं बताया। जाओ! जंगल से उस चिड़िया को पकड़ लाओ। मैं उसका गाना सुनूँगा।

राजा के सेवकों ने कभी इस चिड़िया को नहीं देखा था और न ही पूरे दरबार में कोई इसके बारे में कुछ जानता था। ढूँढ़ते-ढूँढ़ते उन्हें एक बहुत ही निर्धन लड़की मिली जिसने चिड़िया को गाते हुए सुना था। यह लड़की महल को रसोई में छोटे-मोटे काम करती थी। गानेवाली चिड़िया का नाम लेते ही बोली-हाँ-हाँ, मैं जानती हूँ उस गानेवाली चिड़िया को। मैं उसे बहुत अच्छी तरह से जानती हूँ। ओह ! वह कितने मधुर स्वर में गाती है। उसे तो निर्धन मछुए भी जानते हैं। जब मैं यहाँ काम समाप्त कर संध्या को घर जाती हूँ तो वह मुझे रास्ते भर अपना मीठा-मीठा गाना सुनाती हुई, मेरे आगे-आगे उड़ती है। इससे मेरी सारी थकान दूर हो जाती है।

संध्या के समय लड़की राजा के सेवकों के साथ महल से निकली। जंगल में घुसते ही चिड़िया के मधुर संगीत ने सबको मोह लिया। सबको ऐसा लगा कि ऐसा नैसर्गिक संगीत तो उन्होंने कभी नहीं सुना।

लड़की ने आवाज़ दी - मेरी छोटी सुंदर चिड़िया, हमारे सम्राट तुम्हारा मधुर संगीत सुनना चाहते हैं। क्या तुम उन्हें अपना गाना सुनाओगी ?

"बहुत खुशी से। बहुत खुशी से।"

"तो फिर तुम कल दरबार में आना और अपना मधुर संगीत सबको सुनाना।"

एक सेवक ने कहा।

"मेरा संगीत तो इन हरे-भरे जंगलों में ही अच्छा लगता है। फिर भी मैं तुम्हारे सम्राट को अपना गाना अवश्य सुनाऊँगी।" चिड़िया बोली।

दरबार लगा हुआ था। सभी उपस्थित थे। और तो और उस निर्धन लड़की को भी राजसिंहासन के समीप खड़े होने की आज्ञा मिल गई थी। गानेवाली चिड़िया के लिए सोने का कंगूरा बनाया गया।

तभी उड़ती हुई चिड़िया आई और अपनी मधुर आवाज़ में गाने लगी। सभी मुग्ध हो गए। उसका गाना सुनकर सम्राट की आँखों में तो आँसू आ गए। वे बोले, "प्यारी चिड़िया तुम यहीं हमारे पास रहो। तुम जो माँगोगी तुम्हें मिलेगा।"

चिड़िया बोली- "सम्राट मैं आपके पास ही रहूँगी। मैंने आपकी आँखों में आँसू देखे हैं। मुझे और कुछ नहीं चाहिए।"

गायिका चिड़िया के लिए सोने का पिंजरा बनाया गया और जिस किसी चीज़ की वह इच्छा करती राजा उसे पूरा करता। सारे राज्य में उस चिड़िया के संगीत की धूम मच गई।

एक दिन राजा को एक घड़ी भेंट में मिली जिसमें एक चिड़िया बैठी हुई थी। घड़ी को चाबी देने पर वह सचमुच की चिड़िया की तरह गाती थी। चिड़िया इधर-उधर फुदकती और उसके सुनहरे पंख प्रकाश की किरणें पड़ने पर चमचमाते। चिड़िया के गले में लाल फीता था। फीते से लटकते कागज़ पर लिखा था- चीन के सम्राट को जापान के सम्राट की भेंट।

वाह! कितनी सुंदर भेंट है! उसे देखते ही दरबार का प्रत्येक व्यक्ति बोल उठा। सम्राट स्वयं भी इतनी सुंदर भेंट पाकर प्रसन्न था। बार-बार चाबी भरी जाती और घड़ी की चिड़िया अपना मधुर गान शुरू कर देती। वह इधर-उधर फुदकती हुई सुनहरे पंख फैलाती।

असली चिड़िया चुपचाप जंगल में उड़ गई। लकड़ी काटने वालों तथा मछुओं ने फिर से उसका संगीत सुना। और तुम सोच सकते हो कि वे सब उसका गाना सुनकर कितने प्रसन्न हुए होंगे।

पाँच वर्ष बीत गए। सम्राट बीमार पड़ा। सारी प्रजा सम्राट की बीमारी से उदास थी। सभी सोचने लगे कि राजा अब कभी नहीं उठेंगे। एक दिन सम्राट ने फुसफुसाते हुए कहा - "संगीत! संगीत! उस घड़ी वाली चिड़िया का गाना सुनवाओ।"

घड़ी को चाबी दी गई पर चिड़िया ने नहीं गाया। उस घड़ी को हिलाया-डुलाया गया पर कोई उससे गाना नहीं गवा सका। सम्राट धीरे-धीरे बेहोश होता जा रहा था। तभी सभी ने उस नैसर्गिक संगीत को फिर से सुना। असली चिड़िया अपनी मधुर आवाज़ में गा रही थी। उसने राजा की बीमारी के बारे में सुन लिया था और राजा को अपना संगीत सुनाने आ पहुँची थी। जैसे-जैसे वह गाना गाती, राजा की शक्ति लौटने लगी। कुछ देर बाद सम्राट ने कहा, "प्यारी चिड़िया मेरे पास लौट आओ। मैं घड़ी और उसकी चिड़िया को तोड़ दूँगा। बस ! तुम मेरे पास लौट आओ।"

"नहीं, नहीं! ऐसा मत करें! उस चिड़िया ने भी जहाँ तक हो सका, आप सबका मन बहलाया। उसे सज़ा मत दीजिए।" चिड़िया ने राजा से प्रार्थना की।

"तो क्या तुम अपने पिंजरे में लौट आओगी?" सम्राट ने पूछा। "नहीं", चिड़िया बोलीन "मुझे अपना संगीत निर्धन लकड़ी काटने वालों तथा मछुओं को भी सुनाना है। मैं प्रतिदिन यहाँ आऊँगी और आपको अपना संगीत सुनाऊँगी। आप जल्दी ही ठीक हो जाएँगे। अच्छा अब मैं गाती हूँ, आप सो जाइए" और चिड़िया का मधुर संगीत चारों ओर गूंज उठा। सम्राट धीरे-धीरे ठीक हो गए। सारे राज्य में खुशी की लहर दौड़ गई। सम्राट रोज़ अपनी खिड़की पर खड़े चिड़िया का मधुर संगीत सुनते।

अब सम्राट अपने राज्य के निर्धनों का विशेष ध्यान रखते। उनकी ज़रूरतों को पूरा करते। चिड़िया आती तो उसका गाना सुनते हुए सोचते-तुम निर्धनों को अपना संगीत बाँटने के लिए महल के सुखों को छोड़ गई हो, मैं महल में रहकर उनके सुख के लिए क्यों न कुछ करूँ।

लोमड़ी बालक (मध्यप्रदेश की लोककथा)

 बहुत पुरानी बात है। एक लोमड़ी मध्यप्रदेश के एक आदिवासी गाँव में घुस गई। गाँव के लोग खेतों और जंगलों में काम करने के लिए गए हुए थे। एक आदिवासी महिला अपने अपने बच्चे को चटाई पर सोता छोड़कर घास का गट्ठर लेने चली गई। वापस आने पर देखा, तो बच्चा वहाँ नहीं था।

माँ रोती बिलखती अपने बच्चे को पागलों की तरह इधर-उधर ढूँढने निकल पड़ी लेकिन कहीं कुछ पता न चला। गाँव के लोगों को खबर मिली तो वे भी परेशान हो गए, आखिर घर में सोता बच्चा कहाँ गया? कई लोग जंगल में उसकी तलाश में भी गए पर उस बच्चे का कुछ पता न चल सका।

उस बच्चे को एक लोमड़ी ले गई थी। किसी की नजर उस पर नहीं पड़ी थी लेकिन वापस जंगल जाते समय एक जंगली कुत्ते की नजर उस पर पड़ गयी और वह उसके पीछे दौड़ा भी। जब तक कुत्ता उसके पास पहुँचता वह बच्चे को लेकर एक संकरी गुफा में घुस गई।

लोमड़ी अकेली थी। उसे बच्चा बड़ा प्यारा लगा और उसने उसे पालने का सोच लिए। लोमड़ी बड़े प्यार से इसे अपना दूध पिलाती। रोता तो करतब दिखा-दिखाकर उसे हँसाती। वह बच्चा भी अब लोमड़ी को ही अपनी असली माँ समझने लगा।

महीने गुजरते गए और  फिर साल बीतने को आया। बच्चे की असली माँ ने संतोष कर लिया था। मगर लोमड़ी उसे अपने कलेजे का टुकड़ा समझने लगी थी। खुद भूखी-प्यासी रहती, लेकिन अपने लाडले बच्चे को सदा खुश रखती।

धीरे-धीरे बालक अपनी लोमड़ी माँ की तरह हाथ-पैरों पर चलना सीखने लगा। वह हाथों को भी पाँवों की तरह जमीन पर रखता और छलांगे लगाता। लोमड़ी उसे अपने साथ जंगल में ले जाती, शिकार करना और शिकार होने से बचना सिखाती। नंगधड़ंग बालक उसके साथ बंदर की तरह पड़ा रहता। उसे न सर्दी में जुकाम होता और न ही गर्मी महसूस होती। वह पूरा जंगली बनता जा रहा था।

एक दिन कुछ शिकारी जंगल से गुजर रहे थे। अचानक उन्होंने लोमड़ी और हाथ-पैरों से चौपाये जानवर की तरह चलते बालक को देखा, तो हक्के-बक्के रह गए। एक शिकारी उनकी तरफ दौड़ा मगर लोमड़ी तुरंत बच्चे को ले पास की घनी झाड़ियों में लोप हो गई।

शिकारियों ने कई घंटे तक उनकी तलाश की। हारकर वे गाँव में आए।

लोमड़ी और उसके विचित्र बच्चे के बारे में कई लोगों से पूछा गया। कुछ पता न लगा।

अब गाँव के लोगों में भी चर्चा होने लगी। आखिर लोमड़ी के साथ कौन रहता है? लगता तो आदमी का बच्चा है, उसके पास कैसे पहुँचा। पास के कई गाँवों में यह खबर फैल गई। गाँव के प्रधान ने कहा कि जो उस चौपाए बालक को पकड़कर लाएगा, उसे अच्छा-खासा इनाम दिया जाएगा।

गाँव के पास ही एक विद्यालय था जहाँ पहाड़ी आदिवासी जातियों के बच्चे पढ़ते थे। एक दिन उनके अध्यापक जंगल की तरफ जा रहे थे। तभी उन्हें यह बच्चा अपनी लोमड़ी माँ के साथ घूमता दिखाई दिया।

मास्टर जी ने शोर मचाया "मिल गया, दौड़ो। वह भागा, वह भागा।"

कुछ बड़े बालक अपने गुरूजी की सहायता के लिए आए। लोमड़ी और उसके विचित्र बच्चे को चारों ओर से घेर लिया। लोमड़ी तनकर खड़ी हो गई। मास्टर जी समझदार थे। उन्होंने माँ की ममता पहचानी। लोमड़ी के पास बड़े प्यार से गए। कुछ खाने को दिया और फिर बच्चे को पकड़ने आगे बढ़े।

उसी समय लोमड़ी बालक अध्यापक को काटने दौड़ी । बड़ी मुश्किल से बालक को पकडकर आश्रम लाया गया। लोमड़ी भी उनके साथ-साथ आई। उसने कई दिन तक अपने बच्चे के वियोग में खाया पीया भी नहीं। आश्रम में कई दिन तक उसे देखनेवालों की भीड़ लगी रही।

गुरु जी उस लोमड़ी बालक को स्नेह से पालने लगे। उसे बड़ी कठिनाई से दो पाँवों पर चलना सिखाया गया। पहली बार जब उसे कपड़े पहनाए गए, तो वह उन्हें अपने नाखूनों से फाड़ने लगा।

एक दिन वह फिर जंगल में जाने के लिए मचल उठा। वह घर से भाग निकला। सारे आश्रमवासी परेशान हो गए। आश्रम के संचालक और उनकी पत्नी ने तो कई दिन तक कुछ खाया पीया तक नहीं।

एक दिन बड़ा करिश्मा हुआ। संचालक अपने घर में थे। अचानक बाहर शोर मचा - "लौट आया। लौट आया।"

गुरूजी और उनकी पत्नी दौड़े-दौड़े बाहर आए। सामने देखा, तो पुलक उठे। लोमड़ी बालक लौट आया था।

अब वह कहीं नहीं भागता। आश्रम के दूसरों लड़कों की तरह पढ़ता लिखता है और खेलता था। पर कभी-कभी लोमड़ी की तरह "चीखने-चिल्लाने" की आदत उसे जरूर होती। कुछ लोग प्यार से उसे लोमड़ी सिंह के नाम से भी पुकारते थे वैसे गुरूजी और उनकी पत्नी ने उसका नाम शेर सिंह रखा था।


युवा शिकारी और बाघिन (पावी आदिवासी लोककथा)

पावी जनजाति में एक लोककथा प्रचलित है. बात पुरानी है  - एक युवा शिकारी अपने ही गाँव की किसी वन्य सुन्दरी पर मुग्ध हो गया। दोनों के बीच प्यार बढ़ता गया और विवाह की तिथि तय कर दी गई। पावी प्रेमी-प्रेमिका विवाह की तिथि की प्रतीक्षा में और भी अधीर होते गए और झूम खेतों (खेती करने का एक पारंपरिक तरीका) में छुप-छुप कर मिलते।

एक दिन बड़ी गर्मी थी। लड़की को जोर की प्यास लगी। उसने अपने प्रेमी से कहा कि वह पास के गड्ढे के पास  जाकर अपनी प्यास बुझाना चाहती है। युवा शिकारी ने उसे वहाँ जाने से मना किया क्योंकि उसे पता था कि वहाँ के पानी में कुछ जादू है जो व्यक्ति का रूप बदल सकता है।

युवती ने प्रेमी की सलाह मान ली किंतु अपनी प्यास पर काबू न पा सकी। वह आखिरकार उस गड्ढे पर पहुँच गई। उसने अंजुली भर कर पानी पिया और अपने प्रेमी के पास लौट आई।

प्रेमी अपनी प्रेमिका से अगले दिन मिलने के बारे में कुछ कहने ही वाला था कि अचानक प्रेमिका का रूप बदलने लगा। पहले उसके पाँव लंबे हुए फिर हाथ और फिर उनके चार पैर बन गए। नाखून बड़े-बड़े हो गए और देखते ही देखते वह एक जंगली बाघिन बन गई। यह सब देखकर वह युवा शिकारी घबरा गया। अपनी प्रेमिका को इस रूप में देखकर उसका हृदय व्यथित हो गया। उसे प्रेमिका पर क्रोध भी आया। उसने उसे उस जगह का पानी पीने से मना किया था। किंतु बहुत देर हो चुकी थी। क्या करता बेचारा। भाग्य को कोसता हुआ वह अपना सर पिटते हुए घर की तरफ चल पड़ा। उसकी बाघिन प्रेमिका भी पीछे-पीछे चलने लगी। लेकिन उसे गाँव में कैसे रखा जाता अतः पास के जंगल में छोड़ आया।

इस घटना में गाँव से सब लोग आश्चर्यचकित थे। बाघिन बनी लड़की के माता-पिता तो बहुत ही दुखी थे। बेटी की चाहत में वे कुछ भी करने को तैयार थे यहाँ तक कि उन्होंने अपने पशु बाघिन लड़की को खाने के लिए भेजने शुरू किए। वह पूरा पशु एक या दो दिन में खा जाती। आखिर पशुओं की संख्या घटने लगी। उसने आदमियों का शिकार करना भी शुरू कर दिया।

गाँव के लोग घबराए हुए थे। उन्होंने बाध लड़की को मारने की योजना बनाई। एक-दो बार कुछ शिकारी उसके पीछे दौड़े लेकिन सफलता न मिल सकी। एक शिकारी तो खुद उसका शिकार हो गया।

जंगल के हिंसक पशु घबराए हुए थे। गाँव के पशु तो पहले ही समाप्त हो गए थे। अब जंगल के पशु भी खत्म होने लगे। तूफान मा मचा हुआ था। लोग त्राहि-त्राहि कर उठे।

आखिरकार गाँव के लोगों ने निर्णय किया कि युवा शिकारी को ही यह काम सौंपा जाए। गाँव का मुखिया पंचों को लेकर उसके घर गया। उसने अनुरोध किया कि वह बाघिन को यथाशीघ्र मार भगाए। युवा शिकारी परेशान था। क्या उसे अपनी प्रेमिका का ही शिकार करना पड़ेगा? उसने गाँववालों से कहा- "मझे गाँव से निकाल दो लेकिन यह, जघन्य कर्म मुझसे न कराओ। मैं अपनी प्रेमिका को नहीं मार सकूँगा। भले ही वह बाघिन बनकर पशुओं तथा आदमियों का शिकार कर रही हो।"

गाँव के लोगों ने कहा, "लेकिन वह अब तुम्हारी प्रेमिका कहाँ रही? वह तो क्रूर हिंसक पशु है जो निर्बोध पशुओं और लाचार इंसानों को सबको खाए जा रही है। कल हम भी जिंदा नहीं बचेंगे और एक दिन तुम भी उसके शिकार बन जाओगे।"

शिकारी उन तर्कों को सुनकर भी तैयार नहीं हुआ। तभी एक वृद्धा आदिवासिन दौड़ी-दौड़ी आई। उसने कहा- "शिकारी बेटे, अब हमसे नहीं सहा जाता। तुम्हारी प्रेमिका बाघिन पहले मेरे पशुओं को खा गई, फिर मेरे पति को और आज मेरा इकलौता बेटा भी उसकी बलि चढ़ गया। क्या अब भी तुम उस पर तरस ही खाते रहोगे?

शिकारी विवश था। उसने अपने शस्त्र उठाए और जंगल की ओर बेमन से अपनी प्रेमिका का शिकार करने चल पड़ा। लेकिन वह प्रेमिका अब रही नहीं थी वह एक शिकारी बाघिन बन गई है। आखिर एक शिकारी ने दूसरे  शिकारी की जान ले ही ली। बाघिन-प्रेमिका सदा के लिए सो गई। कुछ लोगों का कहना है कि शिकारी भी अपार दुख को सहन न कर सका और खुद की भी जान दे दी।

एक सुखमय प्रेम के ऐसे ह्रदय विदारक परिवर्तन की यह लोककथा आज भी पावी जनजाति बड़े दर्द के साथ सुनाई जाती है।