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बालक ध्रुव – ध्रुव तारे की पौराणिक कथा (विष्णु पुराण से)

प्राचीन भारतवर्ष में उत्तानपाद नामक एक राजा राज्य किया करता था. उसकी दो रानियाँ थीं – सुनीति और सुरुचि. बड़ी रानी का नाम सुनीति थी जिसके पुत्र का नाम था ध्रुव और छोटी रानी सुरुचि के पुत्र नाम उत्तम था. सुरुचि चाहती थी कि उसका पुत्र उत्तम ही उत्तराधिकारी बने. इस कारण सुरुचि ध्रुव और सुनीति दोनों से ईर्ष्या करती थी. ध्रुव उम्र में उत्तम से बड़ा था अतः राज-नियमों के अनुसार उत्तराधिकारी बनने का अधिकार ध्रुव को ही था. लेकिन सुरुचि पुत्रमोह में अंधी हो गयी थी और किसी भी प्रकार से अपने बेटे उत्तम को राजा बनाना चाहती थी.

एक दिन ध्रुव खेलता हुआ अपने पिता की गोद में जाकर बैठ गया तो सुरुचि ने उसे उलाहना देते हुए कहा कि ध्रुव अपने पिता की गोद में बैठने लायक नहीं है. दुखी ध्रुव ने यह बात अपनी मां सुनीति को बताई और पूछा कि माँ! मुझे पिता की गोद में बैठने क्यों नहीं दिया गया? तब सुनीति ने कहा, बेटा, उदास मत हो, क्या हुआ अगर छोटी माँ ने तुम्हें पिता की गोद में बैठने नहीं दिया. तुम जगत के नाथ नारायण की गोद में बैठोगे. वे तो सम्पूर्ण सृष्टि के पिता हैं.

ध्रुव ने कहा- मां वो कहां मिलेंगे? मां सुनीति ने उत्तर की ओर दूर पहाड़ी की तरफ इशारा किया. यह सुनकर ध्रुव के मन में नारायण की प्राप्ति की तीव्र इच्छा जाग गयी और बिना किसी को कुछ कहे वह उत्तर की ओर अकेले ही निकल पड़ा. राह में उसे देवर्षि नारद मिली. उन्होंने ध्रुव को आगे जाने से रोका लेकिन ध्रुव नहीं माना. ध्रुव ने नारदमुनि से सादर निवेदन कर भगवान नारायण से मिलने का रास्ता पूछा.

तपस्या में लीन बालक ध्रुव - इमेज क्रेडिट Google Gemini 


नारदमुनि बोले- तुम धैर्य रखो बालक, नारायण तुम्हें अवश्य मिलेंगे. इसके बाद नारदमुनि ने ध्रुव को ध्यान करने का तरीका बताया. ध्रुव उसी समय वहां भगवान नारायण के ध्यान के लिए बैठ गया. ध्रुव की कठिन तपस्या और दृढ़ मनोबल से समस्त क्षेत्र में प्रकाश फ़ैल गया और एक दिव्य ऊर्जा फैलने लगी. पास रहने वाले ऋषियों को लगा कि कोई महान व्यक्ति ध्यान में लीन है. सात ऋषि-मुनि समूह जब वहां पहुँचे तो एक बालक को ध्यानरत देख हैरान रह गए.

नारदमुनि ने ध्रुव को विष्णु जी की प्राप्ति हेतु ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमःमंत्र के जाप की विधि बताई थी. ध्रुव ने पूरे छह माह तक कठिन तपस्या की. बालक ध्रुव के साथ सात ऋषि-मुनि भी भगवान नारायण का ध्यान करते रहे. अंत में भगवान नारायण ने ध्रुव की तपस्या से प्रसन्न होकर दर्शन दिए. भगवान ने कहा- बालक ध्रुव! मैं तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न हूं, क्या चाहिए तुम्हे?’

ध्रुव ने कहा- मुझे मेरी छोटी माँ पिता की गोद में बैठने नहीं देती. मेरी मां कहती है आप इस सृष्टि के पिता हैं. मैं आपकी गोद में बैठना चाहता हूं. नारायण बोले- आकाश ही मेरी गोद है मैं तुम्हें हमेशा के लिए अपनी इस गोद में स्थान देता हूं.इसके बाद भगवान नारायण ने ध्रुव को अपनी गोद में बिठाया और मरणोपरांत ध्रुव तारा बनने का वरदान दिया.

इसी के साथ भगवान नारायण ने उन सात ऋषिमुनियों को भी ध्रुव की रक्षा के लिए आसमान में उसके आसपास स्थान दिया, जिन्होंने ध्रुव के साथ तपस्या की.

कहते हैं कि ध्रुव के इसी दृढ इच्छा शक्ति के कारण ही उत्तर दिशा में स्थित ध्रुव तारा कभी भी अपने स्थान से नहीं हिलता.

गाने वाली चिड़िया और चीन का राजा

चीन देश में एक राजा बहुत ही सुंदर महल में रहता था। उसे अपने महल पर बहुत गर्व था। संसार के कोने-कोने से यात्री महल को देखने आते। राजा को इससे बहुत प्रसन्नता होती। यात्रियों ने अपने यात्रा-वर्णनों में महल की सुंदरता के बारे में कई बातें लिखीं। उन्होंने एक गाने वाली चिड़िया के बारे में भी लिखा। यह चिड़िया महल के पास वाले जंगल में रहती थी और बहुत मधुर स्वर में गाती थी।

राजा ने इस चिड़िया को कभी गाते हुए नहीं सुना था और न ही उसके बारे में कभी किसी ने उसे कुछ बताया ही था। इन यात्रियों द्वारा लिखे यात्रा-वर्णनों में जब उसने इस गानेवाली चिड़िया के बारे में पढ़ा तो उसने अपने मंत्रियों को बुलाया।

राजा ने कहा- तुम लोगों ने कभी मुझे गानेवाली चिड़िया के बारे में नहीं बताया। जाओ! जंगल से उस चिड़िया को पकड़ लाओ। मैं उसका गाना सुनूँगा।

राजा के सेवकों ने कभी इस चिड़िया को नहीं देखा था और न ही पूरे दरबार में कोई इसके बारे में कुछ जानता था। ढूँढ़ते-ढूँढ़ते उन्हें एक बहुत ही निर्धन लड़की मिली जिसने चिड़िया को गाते हुए सुना था। यह लड़की महल को रसोई में छोटे-मोटे काम करती थी। गानेवाली चिड़िया का नाम लेते ही बोली-हाँ-हाँ, मैं जानती हूँ उस गानेवाली चिड़िया को। मैं उसे बहुत अच्छी तरह से जानती हूँ। ओह ! वह कितने मधुर स्वर में गाती है। उसे तो निर्धन मछुए भी जानते हैं। जब मैं यहाँ काम समाप्त कर संध्या को घर जाती हूँ तो वह मुझे रास्ते भर अपना मीठा-मीठा गाना सुनाती हुई, मेरे आगे-आगे उड़ती है। इससे मेरी सारी थकान दूर हो जाती है।

संध्या के समय लड़की राजा के सेवकों के साथ महल से निकली। जंगल में घुसते ही चिड़िया के मधुर संगीत ने सबको मोह लिया। सबको ऐसा लगा कि ऐसा नैसर्गिक संगीत तो उन्होंने कभी नहीं सुना।

लड़की ने आवाज़ दी - मेरी छोटी सुंदर चिड़िया, हमारे सम्राट तुम्हारा मधुर संगीत सुनना चाहते हैं। क्या तुम उन्हें अपना गाना सुनाओगी ?

"बहुत खुशी से। बहुत खुशी से।"

"तो फिर तुम कल दरबार में आना और अपना मधुर संगीत सबको सुनाना।"

एक सेवक ने कहा।

"मेरा संगीत तो इन हरे-भरे जंगलों में ही अच्छा लगता है। फिर भी मैं तुम्हारे सम्राट को अपना गाना अवश्य सुनाऊँगी।" चिड़िया बोली।

दरबार लगा हुआ था। सभी उपस्थित थे। और तो और उस निर्धन लड़की को भी राजसिंहासन के समीप खड़े होने की आज्ञा मिल गई थी। गानेवाली चिड़िया के लिए सोने का कंगूरा बनाया गया।

तभी उड़ती हुई चिड़िया आई और अपनी मधुर आवाज़ में गाने लगी। सभी मुग्ध हो गए। उसका गाना सुनकर सम्राट की आँखों में तो आँसू आ गए। वे बोले, "प्यारी चिड़िया तुम यहीं हमारे पास रहो। तुम जो माँगोगी तुम्हें मिलेगा।"

चिड़िया बोली- "सम्राट मैं आपके पास ही रहूँगी। मैंने आपकी आँखों में आँसू देखे हैं। मुझे और कुछ नहीं चाहिए।"

गायिका चिड़िया के लिए सोने का पिंजरा बनाया गया और जिस किसी चीज़ की वह इच्छा करती राजा उसे पूरा करता। सारे राज्य में उस चिड़िया के संगीत की धूम मच गई।

एक दिन राजा को एक घड़ी भेंट में मिली जिसमें एक चिड़िया बैठी हुई थी। घड़ी को चाबी देने पर वह सचमुच की चिड़िया की तरह गाती थी। चिड़िया इधर-उधर फुदकती और उसके सुनहरे पंख प्रकाश की किरणें पड़ने पर चमचमाते। चिड़िया के गले में लाल फीता था। फीते से लटकते कागज़ पर लिखा था- चीन के सम्राट को जापान के सम्राट की भेंट।

वाह! कितनी सुंदर भेंट है! उसे देखते ही दरबार का प्रत्येक व्यक्ति बोल उठा। सम्राट स्वयं भी इतनी सुंदर भेंट पाकर प्रसन्न था। बार-बार चाबी भरी जाती और घड़ी की चिड़िया अपना मधुर गान शुरू कर देती। वह इधर-उधर फुदकती हुई सुनहरे पंख फैलाती।

असली चिड़िया चुपचाप जंगल में उड़ गई। लकड़ी काटने वालों तथा मछुओं ने फिर से उसका संगीत सुना। और तुम सोच सकते हो कि वे सब उसका गाना सुनकर कितने प्रसन्न हुए होंगे।

पाँच वर्ष बीत गए। सम्राट बीमार पड़ा। सारी प्रजा सम्राट की बीमारी से उदास थी। सभी सोचने लगे कि राजा अब कभी नहीं उठेंगे। एक दिन सम्राट ने फुसफुसाते हुए कहा - "संगीत! संगीत! उस घड़ी वाली चिड़िया का गाना सुनवाओ।"

घड़ी को चाबी दी गई पर चिड़िया ने नहीं गाया। उस घड़ी को हिलाया-डुलाया गया पर कोई उससे गाना नहीं गवा सका। सम्राट धीरे-धीरे बेहोश होता जा रहा था। तभी सभी ने उस नैसर्गिक संगीत को फिर से सुना। असली चिड़िया अपनी मधुर आवाज़ में गा रही थी। उसने राजा की बीमारी के बारे में सुन लिया था और राजा को अपना संगीत सुनाने आ पहुँची थी। जैसे-जैसे वह गाना गाती, राजा की शक्ति लौटने लगी। कुछ देर बाद सम्राट ने कहा, "प्यारी चिड़िया मेरे पास लौट आओ। मैं घड़ी और उसकी चिड़िया को तोड़ दूँगा। बस ! तुम मेरे पास लौट आओ।"

"नहीं, नहीं! ऐसा मत करें! उस चिड़िया ने भी जहाँ तक हो सका, आप सबका मन बहलाया। उसे सज़ा मत दीजिए।" चिड़िया ने राजा से प्रार्थना की।

"तो क्या तुम अपने पिंजरे में लौट आओगी?" सम्राट ने पूछा। "नहीं", चिड़िया बोलीन "मुझे अपना संगीत निर्धन लकड़ी काटने वालों तथा मछुओं को भी सुनाना है। मैं प्रतिदिन यहाँ आऊँगी और आपको अपना संगीत सुनाऊँगी। आप जल्दी ही ठीक हो जाएँगे। अच्छा अब मैं गाती हूँ, आप सो जाइए" और चिड़िया का मधुर संगीत चारों ओर गूंज उठा। सम्राट धीरे-धीरे ठीक हो गए। सारे राज्य में खुशी की लहर दौड़ गई। सम्राट रोज़ अपनी खिड़की पर खड़े चिड़िया का मधुर संगीत सुनते।

अब सम्राट अपने राज्य के निर्धनों का विशेष ध्यान रखते। उनकी ज़रूरतों को पूरा करते। चिड़िया आती तो उसका गाना सुनते हुए सोचते-तुम निर्धनों को अपना संगीत बाँटने के लिए महल के सुखों को छोड़ गई हो, मैं महल में रहकर उनके सुख के लिए क्यों न कुछ करूँ।

लोमड़ी बालक (मध्यप्रदेश की लोककथा)

 बहुत पुरानी बात है। एक लोमड़ी मध्यप्रदेश के एक आदिवासी गाँव में घुस गई। गाँव के लोग खेतों और जंगलों में काम करने के लिए गए हुए थे। एक आदिवासी महिला अपने अपने बच्चे को चटाई पर सोता छोड़कर घास का गट्ठर लेने चली गई। वापस आने पर देखा, तो बच्चा वहाँ नहीं था।

माँ रोती बिलखती अपने बच्चे को पागलों की तरह इधर-उधर ढूँढने निकल पड़ी लेकिन कहीं कुछ पता न चला। गाँव के लोगों को खबर मिली तो वे भी परेशान हो गए, आखिर घर में सोता बच्चा कहाँ गया? कई लोग जंगल में उसकी तलाश में भी गए पर उस बच्चे का कुछ पता न चल सका।

उस बच्चे को एक लोमड़ी ले गई थी। किसी की नजर उस पर नहीं पड़ी थी लेकिन वापस जंगल जाते समय एक जंगली कुत्ते की नजर उस पर पड़ गयी और वह उसके पीछे दौड़ा भी। जब तक कुत्ता उसके पास पहुँचता वह बच्चे को लेकर एक संकरी गुफा में घुस गई।

लोमड़ी अकेली थी। उसे बच्चा बड़ा प्यारा लगा और उसने उसे पालने का सोच लिए। लोमड़ी बड़े प्यार से इसे अपना दूध पिलाती। रोता तो करतब दिखा-दिखाकर उसे हँसाती। वह बच्चा भी अब लोमड़ी को ही अपनी असली माँ समझने लगा।

महीने गुजरते गए और  फिर साल बीतने को आया। बच्चे की असली माँ ने संतोष कर लिया था। मगर लोमड़ी उसे अपने कलेजे का टुकड़ा समझने लगी थी। खुद भूखी-प्यासी रहती, लेकिन अपने लाडले बच्चे को सदा खुश रखती।

धीरे-धीरे बालक अपनी लोमड़ी माँ की तरह हाथ-पैरों पर चलना सीखने लगा। वह हाथों को भी पाँवों की तरह जमीन पर रखता और छलांगे लगाता। लोमड़ी उसे अपने साथ जंगल में ले जाती, शिकार करना और शिकार होने से बचना सिखाती। नंगधड़ंग बालक उसके साथ बंदर की तरह पड़ा रहता। उसे न सर्दी में जुकाम होता और न ही गर्मी महसूस होती। वह पूरा जंगली बनता जा रहा था।

एक दिन कुछ शिकारी जंगल से गुजर रहे थे। अचानक उन्होंने लोमड़ी और हाथ-पैरों से चौपाये जानवर की तरह चलते बालक को देखा, तो हक्के-बक्के रह गए। एक शिकारी उनकी तरफ दौड़ा मगर लोमड़ी तुरंत बच्चे को ले पास की घनी झाड़ियों में लोप हो गई।

शिकारियों ने कई घंटे तक उनकी तलाश की। हारकर वे गाँव में आए।

लोमड़ी और उसके विचित्र बच्चे के बारे में कई लोगों से पूछा गया। कुछ पता न लगा।

अब गाँव के लोगों में भी चर्चा होने लगी। आखिर लोमड़ी के साथ कौन रहता है? लगता तो आदमी का बच्चा है, उसके पास कैसे पहुँचा। पास के कई गाँवों में यह खबर फैल गई। गाँव के प्रधान ने कहा कि जो उस चौपाए बालक को पकड़कर लाएगा, उसे अच्छा-खासा इनाम दिया जाएगा।

गाँव के पास ही एक विद्यालय था जहाँ पहाड़ी आदिवासी जातियों के बच्चे पढ़ते थे। एक दिन उनके अध्यापक जंगल की तरफ जा रहे थे। तभी उन्हें यह बच्चा अपनी लोमड़ी माँ के साथ घूमता दिखाई दिया।

मास्टर जी ने शोर मचाया "मिल गया, दौड़ो। वह भागा, वह भागा।"

कुछ बड़े बालक अपने गुरूजी की सहायता के लिए आए। लोमड़ी और उसके विचित्र बच्चे को चारों ओर से घेर लिया। लोमड़ी तनकर खड़ी हो गई। मास्टर जी समझदार थे। उन्होंने माँ की ममता पहचानी। लोमड़ी के पास बड़े प्यार से गए। कुछ खाने को दिया और फिर बच्चे को पकड़ने आगे बढ़े।

उसी समय लोमड़ी बालक अध्यापक को काटने दौड़ी । बड़ी मुश्किल से बालक को पकडकर आश्रम लाया गया। लोमड़ी भी उनके साथ-साथ आई। उसने कई दिन तक अपने बच्चे के वियोग में खाया पीया भी नहीं। आश्रम में कई दिन तक उसे देखनेवालों की भीड़ लगी रही।

गुरु जी उस लोमड़ी बालक को स्नेह से पालने लगे। उसे बड़ी कठिनाई से दो पाँवों पर चलना सिखाया गया। पहली बार जब उसे कपड़े पहनाए गए, तो वह उन्हें अपने नाखूनों से फाड़ने लगा।

एक दिन वह फिर जंगल में जाने के लिए मचल उठा। वह घर से भाग निकला। सारे आश्रमवासी परेशान हो गए। आश्रम के संचालक और उनकी पत्नी ने तो कई दिन तक कुछ खाया पीया तक नहीं।

एक दिन बड़ा करिश्मा हुआ। संचालक अपने घर में थे। अचानक बाहर शोर मचा - "लौट आया। लौट आया।"

गुरूजी और उनकी पत्नी दौड़े-दौड़े बाहर आए। सामने देखा, तो पुलक उठे। लोमड़ी बालक लौट आया था।

अब वह कहीं नहीं भागता। आश्रम के दूसरों लड़कों की तरह पढ़ता लिखता है और खेलता था। पर कभी-कभी लोमड़ी की तरह "चीखने-चिल्लाने" की आदत उसे जरूर होती। कुछ लोग प्यार से उसे लोमड़ी सिंह के नाम से भी पुकारते थे वैसे गुरूजी और उनकी पत्नी ने उसका नाम शेर सिंह रखा था।


युवा शिकारी और बाघिन (पावी आदिवासी लोककथा)

पावी जनजाति में एक लोककथा प्रचलित है. बात पुरानी है  - एक युवा शिकारी अपने ही गाँव की किसी वन्य सुन्दरी पर मुग्ध हो गया। दोनों के बीच प्यार बढ़ता गया और विवाह की तिथि तय कर दी गई। पावी प्रेमी-प्रेमिका विवाह की तिथि की प्रतीक्षा में और भी अधीर होते गए और झूम खेतों (खेती करने का एक पारंपरिक तरीका) में छुप-छुप कर मिलते।

एक दिन बड़ी गर्मी थी। लड़की को जोर की प्यास लगी। उसने अपने प्रेमी से कहा कि वह पास के गड्ढे के पास  जाकर अपनी प्यास बुझाना चाहती है। युवा शिकारी ने उसे वहाँ जाने से मना किया क्योंकि उसे पता था कि वहाँ के पानी में कुछ जादू है जो व्यक्ति का रूप बदल सकता है।

युवती ने प्रेमी की सलाह मान ली किंतु अपनी प्यास पर काबू न पा सकी। वह आखिरकार उस गड्ढे पर पहुँच गई। उसने अंजुली भर कर पानी पिया और अपने प्रेमी के पास लौट आई।

प्रेमी अपनी प्रेमिका से अगले दिन मिलने के बारे में कुछ कहने ही वाला था कि अचानक प्रेमिका का रूप बदलने लगा। पहले उसके पाँव लंबे हुए फिर हाथ और फिर उनके चार पैर बन गए। नाखून बड़े-बड़े हो गए और देखते ही देखते वह एक जंगली बाघिन बन गई। यह सब देखकर वह युवा शिकारी घबरा गया। अपनी प्रेमिका को इस रूप में देखकर उसका हृदय व्यथित हो गया। उसे प्रेमिका पर क्रोध भी आया। उसने उसे उस जगह का पानी पीने से मना किया था। किंतु बहुत देर हो चुकी थी। क्या करता बेचारा। भाग्य को कोसता हुआ वह अपना सर पिटते हुए घर की तरफ चल पड़ा। उसकी बाघिन प्रेमिका भी पीछे-पीछे चलने लगी। लेकिन उसे गाँव में कैसे रखा जाता अतः पास के जंगल में छोड़ आया।

इस घटना में गाँव से सब लोग आश्चर्यचकित थे। बाघिन बनी लड़की के माता-पिता तो बहुत ही दुखी थे। बेटी की चाहत में वे कुछ भी करने को तैयार थे यहाँ तक कि उन्होंने अपने पशु बाघिन लड़की को खाने के लिए भेजने शुरू किए। वह पूरा पशु एक या दो दिन में खा जाती। आखिर पशुओं की संख्या घटने लगी। उसने आदमियों का शिकार करना भी शुरू कर दिया।

गाँव के लोग घबराए हुए थे। उन्होंने बाध लड़की को मारने की योजना बनाई। एक-दो बार कुछ शिकारी उसके पीछे दौड़े लेकिन सफलता न मिल सकी। एक शिकारी तो खुद उसका शिकार हो गया।

जंगल के हिंसक पशु घबराए हुए थे। गाँव के पशु तो पहले ही समाप्त हो गए थे। अब जंगल के पशु भी खत्म होने लगे। तूफान मा मचा हुआ था। लोग त्राहि-त्राहि कर उठे।

आखिरकार गाँव के लोगों ने निर्णय किया कि युवा शिकारी को ही यह काम सौंपा जाए। गाँव का मुखिया पंचों को लेकर उसके घर गया। उसने अनुरोध किया कि वह बाघिन को यथाशीघ्र मार भगाए। युवा शिकारी परेशान था। क्या उसे अपनी प्रेमिका का ही शिकार करना पड़ेगा? उसने गाँववालों से कहा- "मझे गाँव से निकाल दो लेकिन यह, जघन्य कर्म मुझसे न कराओ। मैं अपनी प्रेमिका को नहीं मार सकूँगा। भले ही वह बाघिन बनकर पशुओं तथा आदमियों का शिकार कर रही हो।"

गाँव के लोगों ने कहा, "लेकिन वह अब तुम्हारी प्रेमिका कहाँ रही? वह तो क्रूर हिंसक पशु है जो निर्बोध पशुओं और लाचार इंसानों को सबको खाए जा रही है। कल हम भी जिंदा नहीं बचेंगे और एक दिन तुम भी उसके शिकार बन जाओगे।"

शिकारी उन तर्कों को सुनकर भी तैयार नहीं हुआ। तभी एक वृद्धा आदिवासिन दौड़ी-दौड़ी आई। उसने कहा- "शिकारी बेटे, अब हमसे नहीं सहा जाता। तुम्हारी प्रेमिका बाघिन पहले मेरे पशुओं को खा गई, फिर मेरे पति को और आज मेरा इकलौता बेटा भी उसकी बलि चढ़ गया। क्या अब भी तुम उस पर तरस ही खाते रहोगे?

शिकारी विवश था। उसने अपने शस्त्र उठाए और जंगल की ओर बेमन से अपनी प्रेमिका का शिकार करने चल पड़ा। लेकिन वह प्रेमिका अब रही नहीं थी वह एक शिकारी बाघिन बन गई है। आखिर एक शिकारी ने दूसरे  शिकारी की जान ले ही ली। बाघिन-प्रेमिका सदा के लिए सो गई। कुछ लोगों का कहना है कि शिकारी भी अपार दुख को सहन न कर सका और खुद की भी जान दे दी।

एक सुखमय प्रेम के ऐसे ह्रदय विदारक परिवर्तन की यह लोककथा आज भी पावी जनजाति बड़े दर्द के साथ सुनाई जाती है।

सूना रास्ता

आर्य दिन भर पर्वतों के विशाल बाहों में अपना समय बिताकर अब अनमने ढंग से घर की तरफ लौट रहा था. वापसी के मार्ग में एक लम्बा रास्ता सूना रहता है और उस ओर जाने वाले अक्सर दिन ढलने के पहले ही उसे पार कर लेना पसंद करते हैं क्योंकि सभी ने उस राह के बारे में कुछ अजीब सा सुन रखा था. उसी राह से आर्य को भी जाना था लेकिन वह तो अभी भी पहाड़ों के खूबसूरत दृश्यों में खोया हुआ था और इस बात से अनजान भी कि अब वो उसी रास्ते को पार कर रहा है जिससे दिन ढलने के बाद लोग निकलने से डरते हैं.

सहसा किसी आवाज़ ने उसका ध्यान खींच लिया और उसे अहसास हुआ कि वह उस चर्चित रास्ते पर चला जा रहा है वो भी सूरज डूबने के समय. अँधेरा होने में बस कुछ ही क्षण बाकी थे लेकिन किसी भी सूरत में वह अँधेरे से पहले उसे पार नहीं कर सकता था. उसके मन में डर ने अपनी जगह बनाना सुरु कर दिया था वह तेज क़दमों से आगे बढ़ने की कोशिश करने लगा. पर कहते हैं ना कि डर लगने पर अपने ही पैर अपना साथ नहीं देते. वह छह कर भी तेज नहीं चल पा रहा था.

अचानक उसे लगा कि कोई उसे दूर से देख रहा है. उसने हिम्मत की लेकिन उसकी नजर उस अनजाने साए की ओर जाने को तैयार नहीं थी. अचानक उसने किसी को मदद के लिए पुकारते सुना. एक पल के लिए वह अपना डर भूल गया और आवाज़ की दिशा में दौड़ पड़ा. वहाँ उसने देखा कि एक वृद्ध जख्मी हालत में कराह रहा है और आर्य को देखकर अपने हाथ मदद की आस में आगे बढ़ा रहा है.

आर्य तुरंत उसके पास गया और अपने बैग से पानी की बोतल निकालकर वृद्ध को पानी पिलाया. अपने रोमांचक जगहों पर जाने के शौक के कारण आपातकाल के लिए वह हमेशा अपने साथ प्राथमिक उपचार का किट हमेशा रखा करता था. उसने बूढ़े के जख्मों को साफ़ करके उसपर पट्टी बाँध दी. उसने बूढ़े से जानना चाहा कि उनकी यह हालत कैसे हुयी. जवाब में बूढ़ा मुस्कुराया और बस इतना ही कहा – बस यह जानने के लिए कि क्या ऐसे भयानक सूने रास्ते में भी लोग डर कर अपनी जान बचाने के बदले किसी की मदद करने में यकीन रखते हैं?

आर्य कुछ समझा नहीं. बूढ़े ने बताया कि कई साल पहले एक तेज रफ़्तार गाड़ी की टक्कर से वह घायल हो गया था लेकिन किसी ने भी उसकी मदद नहीं की. आर्य ने हँसते हुए कहा कि बाबा, मजाक मत कीजिये. कई साल पहले से आप कैसे यहाँ इस हालत में रह सकते हैं. सच-सच बताइए. और वैसे भी इस रास्ते के बारे में लोग बहुत अजीब बाते करते हैं. फिर आप अँधेरे में इस डरावनी जगह पर आये क्यों?

बूढ़े से हंसकर कहा – लोग जिससे डरकर यहाँ अँधेरे में नहीं आते वो डर मैं ही हूँ. यह कहकर वह बूढ़ा गायब हो गया और फिर कभी नजर नहीं आया. शायद उसे बस एक मददगार का इन्तेजार था जिससे मिलकर उसका दर्द कम हो गया कि किसी ने भी उसकी मदद नहीं की थी.

आर्य को कुछ समझ नहीं आया लेकिन वो इतना जरूर जान गया कि आज उसने एक घायल की सहायता की है और शायद इसी लिए वह सुरक्षित उस राह से निकल आया.


एकलव्य की गुरु-भक्ति

गुरु भक्त एकलव्य की कथा महाभारत में वर्णित है । कथा के अनुसार एकलव्य एक भील बालक था। वह बचपन से बहुत होनहार था और उसे तीर चलाने में बड़ा आनंद आता था । वह हमेशा धनुष-बाण अपने साथ रखता था । जब वह बड़ा हुआ तो उसे धनुर्विद्या में निपुणता प्राप्त करने की बहुत इच्छा हुई और वह एक योग्य गुरु की खोज में घर से निकल पड़ा ।

महाभारत काल में गुरु द्रोणाचार्य धनुर्विद्या के महानतम आचार्य माने जाते थे । पांडवों और कौरव भी उन्हीं के आश्रम में शिक्षा ग्रहण कर रहे थे। गुरु द्रोणाचार्य केवल राजपुत्रों को ही  सिखाते थे, सामान्य जन के लिए उनसे शिक्षा प्राप्त करना बहुत दुष्कर कार्य था ।

एक दिन एकलव्य द्रोणाचार्य के आश्रम में पहुंचा । उसने गुरु को प्रणाम किया और बोला, "गुरुवर, मैं एक भील-पुत्र हूँ। मैं बहुत ही आशा के साथ आपके पास धनुर्विद्या सीखने आया हूँ। धनुर्विद्या ही मेरा जीवन है और मैं इस विद्या के महानतम गुरु से ज्ञान प्राप्त करना चाहता हूँ । " द्रोणाचार्य उसके साहस और उत्साह को देखकर बड़े प्रभावित हुए । उन्होंने स्नेह से कहा, "वत्स ! मैं विवश हूँ, मैं तुम्हें शिक्षा नहीं दे सकता। मैं केवल राजपुत्रों को धनुर्विद्या सिखाता हूँ।"

गुरु द्रोणाचार्य की बात सुनकर एकलव्य बहुत दुखी हुआ। पर उसने हार न मानी । मन ही मन उसने धनुर्विद्या सीखने का पक्का निश्चय कर लिया। उसने गुरु द्रोणाचार्य को प्रणाम किया और वहाँ से चला गया ।

एकलव्य एक घने जंगल में पहुंचा। वहाँ उसने गुरु द्रोणाचार्य की एक मूर्ति बनाई और उसे ही साक्षात् गुरु मानकर वह धनुर्विद्या की साधना करने लगा । अपनी लगन के कारण वह इतना कुशल हो गया कि केवल शब्द सुनकर ही निशाना लगाने लगा ।

एक दिन की बात है। द्रोणाचार्य अपने प्रिय शिष्य अर्जुन तथा अन्य राजकुमारों के साथ घूमते-घूमते उसी जंगल में आए । उनके साथ एक कुत्ता भी था। कुछ आगे बढ़कर अचानक ही वह जोर-जोर से भौंकने लगा, पर कुछ ही देर बाद उसका भोंकना बंद हो गया। इससे गुरु द्रोण और अर्जुन को कुछ शंका हुई । वे शीघ्रता से आगे बढ़े । उन्होंने देखा कि कुत्ते का मुंह तीरों से भरा हुआ है।

द्रोणाचार्य आश्चर्यचकित होकर सोचने लगे कि अर्जुन के सिवाय केवल शब्द सुनकर बाण से निशाना लगाने वाला दूसरा कौन है दोनों आगे बढ़े । जब उन्होंने जाकर देखा तो उनके सामने हाथ में धनुष लिए एकलव्य खड़ा था। अपने गुरु को देखकर एकलव्य ने उन्हें प्रणाम किया। द्रोणाचार्य ने उससे पूछा कि उसने यह विद्या किससे सीखी, तो एकलव्य ने बताया कि वह किस प्रकार उनकी मूर्ति के सामने प्रतिदिन अभ्यास करता है। यह सुनकर द्रोणाचार्य आश्चर्यचकित हुए।

सहसा गुरु द्रोणाचार्य को स्मरण हुआ कि उन्होंने अर्जुन को वचन दिया था कि उससे बेहतर धनुर्धारी संसार में कोई नहीं होगा, लेकिन एकलव्य की विद्या उनके इस वचन में बाधा बन रही थी। ऐसे में उन्हें एक युक्ति सूझी। उन्होंने एकलव्य से कहा, “वत्स, तुमने मुझसे शिक्षा तो ले ली, लेकिन मुझे गुरु दक्षिणा तो अभी तक नहीं दी है।

आदेश करें गुरुवर। आपको दक्षिणा में क्या चाहिए।एकलव्य ने कहा। एकलव्य की बात का जवाब देते हुए द्रोणाचार्य ने कहा कि गुरु दक्षिणा में मुझे तुम्हारे दाहिने हाथ का अंगूठा चाहिए।“

दाहिने हाथ के अंगूठे के बिना तीर चलाना असंभव था। ऐसा करने पर एकलव्य को अपनी धनुर्विद्या के कौशल से वंचित होना पड़ता । परन्तु महान गुरुभक्त एकलव्य ने तुरंत अपनी कृपाण निकाली और अपना अंगूठा काट कर गुरु द्रोणाचार्य के चरणों में रख दिया। एकलव्य का यह त्याग और गुरु के प्रति श्रद्धा देख द्रोणाचार्य बहुत प्रभावित हुए और बोले- "वत्स ! तू मेरा सच्चा शिष्य है, तेरी साधना महान है। तुम्हारा नाम युगों-युगांतर तक अमर रहेगा।”ऐसा कहते हुए उन्होंने एकलव्य को ह्रदय से लगा लिया ।

सहस्त्रों वर्ष बीत गए लेकिन आज भी एकलव्य की गुरुभक्ति और लगन के कारण उसका नाम एक महान शिष्य के रूप में अमर है।

उपमन्यु की गुरुभक्ति

गुरु आयोदधौम्य के आश्रम में दूर-दूर से शिक्षा प्राप्त करने के लिए बालक आते थे। आयोदधौम्य के आश्रम में  शिष्यों को शिक्षा ग्रहण करने के साथ अन्य समस्त कार्य जैसे साफ़-सफाई, भोजन बनाना, जानवरों की देखभाल करना करने होते थे। सभी शिष्य अपने गुरु का सम्मान करते थे और गुरु भी उनको पुत्रवत स्नेह करते थे। इन्हीं शिष्यों में से एक शिष्य का नाम उपमन्यु था। उससे महान गुरुभक्त उनके आश्रम में और कोई नहीं था। गुरु की आज्ञा से वह रोज गाय चराने जाता था। एक दिन गुरु ने उससे पूछा कि तुम अन्य शिष्यों से अधिक स्वस्थ और शक्तिशाली लग रहे हो, इसका कारण क्या है? गुरु का प्रश्न सुनकर उपमन्यु ने बताया कि मैं भिक्षा में प्राप्त अन्न ग्रहण कर लेता हूं। गुरु ने उसकी परीक्षा लेनी कि सोची और उससे कहा कि बिना मेरी अनुमति के तुम भिक्षा का अन्न ग्रहण नहीं करोगे। उपमन्यु ने बिना किसी विरोध के अपने गुरु की बात मान ली।

लेकिन उपमन्यु के स्वास्थ्य में कोई परिवर्तन नहीं हुआ। कुछ दिनों बाद पुन: गुरुजी ने उपमन्यु से वही प्रश्न पूछा तो उसने बताया कि वह अब जिन गायों को चराने जाता है, उनका दूध पीकर अपनी भूख मिटाता है। तब गुरु ने उससे कहा कि वह बछड़े के हिस्से का दूध स्वयं पी रहा है जो कि अनुचित है और उसे गाय का दूध ग्रहण करने भी मना कर दिया। उपमन्यु के बिना प्रत्युत्तर के उनका यह आदेश भी माँ लिया। लेकिन इसके उपरांत भी उपमन्यु पहले की तरह सबसे स्वस्थ ही दीखता रहा तब गुरु ने उससे पुन: वही प्रश्न किया। इस बार उपमन्यु ने बताया कि बछड़े गाय का दूध पीकर जो झाग उगल देते हैं, वह उसका सेवन करता है। गुरु आयोदधौम्य ने अत्यधिक कठोरता दिखाते हुए उसे ऐसा करने से भी मना कर दिया।

जब उपमन्यु के सामने खाने-पीने के सभी रास्ते बंद हो गए तब उसने एक दिन भूख से व्याकुल होकर आकड़े के पत्ते खा लिए। वह पत्तों के रस जहरीले होते हैं। उनका रस शरीर में जाते ही उपमन्यु को दिखाई देना बंद हो गया और वह बेचारा वन में भटकने लगा। अंधेपन के कारण भटकता हुआ वह एक सूखे कुएं में गिर गया। जब उपमन्यु शाम तक आश्रम नहीं लौटा तो गुरु अपने अन्य शिष्यों के साथ उसे ढूंढने वन में पहुंचे। वन में जाकर गुरु ने उसे आवाज लगाई तब उपमन्यु ने बताया कि वह कुएं में गिर गया है।

गुरु ने जब इसका कारण पूछा तो उसने निर्मल भावना से सब कुछ सच-सच बता दी। गुरु आयोदधौम्य को अपनी कठोरता पर पश्चाताप होने लगा और उपमन्यु को देवताओं के चिकित्सक अश्विनी कुमार की स्तुति करने के लिए कहा। उपमन्यु ने ऐसा ही किया। स्तुति से प्रसन्न होकर अश्विनी कुमार प्रकट हुए और उपमन्यु को एक फल देकर बोले कि इसे खाने से तुम पहले की तरह स्वस्थ हो जाओगे। लेकिन गुरुभक्त उपमन्यु ने कहा कि वह अपने गुरु की अनुमति के बिना फल का सेवन नहीं करेगा।

आयोदधौम्य के नेत्रों से उपमन्यु की गुरुभक्ति देखकर अश्रुधारा बहने लगी, उन्होंने उसे फल सेवन की अनुमति प्रदान की। उपमन्यु की इस अडिग गुरुभक्ति से प्रसन्न होकर अश्विन कुमार ने उन्हें सदैव स्वस्थ रहने का वरदान दिया। फल खाते ही उपमन्यु की आंखों की रोशनी भी पुन: लौट आई। आयोदधौम्य के आशीर्वाद से उसे जल्द ही समस्त वेदों, पुराणों  और धर्मशास्त्रों का ज्ञान हो गया। यह महान गुरुभक्त उपमन्यु आगे जाकर महान ऋषि कहलाया और दुनिया में उसका नाम अमर हो गया।

धूप के दिन–बारिश के दिन (तुर्की की लोककथा)

एक गाँव में हैदर नाम का एक व्यापारी रहता था। उसकी किराने की दुकान थी। गाँव में किराने की एकमात्र दुकान होने के कारण इसकी दुकान में काफी अच्छी ग्राहकी रहती थी।

हैदर की दो बहुत सुंदर और प्रतिभाशाली बेटियाँ थीं। उनके नाम अलीज़ा और सोरा थे। बहनें एक-दूसरे से बहुत प्यार करती थीं। वे अपने पिता का भी बहुत ख्याल रखती थीं। बहनें पिता के लिए स्वादिष्ट भोजन बनाती थीं और घर के काम में माँ की मदद करती थीं। अलीज़ा और सोरा कभी भी एक-दूसरे से अलग नहीं होते थे और हमेश साथ-साथ ही रहते थे। दोनों एक साथ खेलते, गपशप करते, काम करते और सोते थे। एक दूसरे के बिना वे नहीं रह सकते थे।

दोनों बहनों का कोई भाई नहीं था। दोनों बहनों का कोई भाई नहीं था और इस बात से हैदर थोड़ा दुखी रहता था। उसे चिंता रहती थी कि बेटियाँ बड़ी होने के बाद शादी कर अपने-अपने ससुराल चली जायेंगीं तब दुकान और उनकी देखभाल कैसे होगी। लेकिन अपनी दोनों बेटियों से वो बेहद प्यार करता था। समय निकलता गया और लड़कियाँ अब बड़ी हो गयीं। हैदर चाहता था कि रिवाज के अनुसार उनकी जल्द से जल्द शादी कर दी जाए।

 

एक दिन उसकी पत्नी ने कहा, ''हमारी बड़ी बेटी अलीज़ा अब विवाह के लायक बड़ी हो गयी है, हमें उसके लिए एक उपयुक्त दूल्हे की तलाश करनी चाहिए। हैदर ने सहमति व्यक्त की, "मुझे पता है। मैं चाहता हूं कि यह एक भव्य शादी हो। एक व्यापारी का बेटा उसके लिए अच्छा होगा।"

उसकी पत्नी ने इस बात पर आपत्ति जताई, “नहीं। एक व्यापारी का बेटा आपकी तरह व्यस्त रहेगा। उसके पास अलीज़ा के लिए बहुत कम समय होगा। मुझे एक किसान का बेटा चाहिए।“

"हो सकता है, आप सही हों। मैं पास के गाँव के एक बड़े जमींदार को जानता हूँ। लेकिन मुझे नहीं पता कि उसका कोई बड़ा अविवाहित बेटा है या नहीं।"

हैदर ने गाँव के मौलवी से अनुरोध किया कि वह उस गाँव में जाकर पता लगाए कि क्या शादी संभव है। मौलवी को पता चला कि जमींदार गेदाना का एक बेटा था जो शादी के लिए तैयार था। वह गेदाना का इकलौता बेटा था। मौलवी ने तुरंत शादी का प्रस्ताव रखा और अलीज़ा की सुंदरता और गुणों की प्रशंसा की।

कुछ ही समय बाद अलीज़ा की शादी गेदाना के बेटे समर से हो गई। अब सोरा अकेली और बहुत उदास थी। वह बहुत कम हँसती या बात करती थी। वो अलीज़ा की यादों में खोई रहती. इस बीच, अलीज़ा अपने नए घर में खुश थी। परिवार के पास बड़ी ज़मीनें थीं जिनमें हर मौसम में अच्छी फसल होती थी। अलीज़ा जब भी अपने माता-पिता से मिलने आती तो अपने पति और ससुर की खूब तारीफ करती।

एक मुलाकात में, उसने अपने पिता को सलाह दी, "पापा! मुझे लगता है कि आपको सोरा की भी शादी कर देनी चाहिए। इससे उसका अकेलापन दूर हो जाएगा और वह भी प्रसन्न रहेगी। अपने पति के घर में वह नए लोगों से मिलेगी और उसे मेरी याद नहीं आएगी।"

पिता उससे सहमत थे। उसने अपनी पत्नी से कहा, "चाची से सोरा के बारे में बात करो। वह सोरा के लिए दूल्हा ढूंढेगी। तुम्हारी चाची एक मिलनसार व्यक्ति है। वह कई परिवारों को जानती है।"

पत्नी ने बताया, "सही है। कल ही वह एक उपयुक्त लड़के के बारे में जिक्र कर रही थी। मैंने दिलचस्पी नहीं दिखाई क्योंकि मुझे लगा कि अगर सोरा भी चली गई तो हमारी जिंदगी सूनी हो जाएगी।"

हैदर ने टिप्पणी की, "यह आपका स्वार्थ है। अगर कोई अच्छा लड़का है तो हमें मौका नहीं चूकना चाहिए।"

शादी का प्रस्ताव रखा गया और शादी तय हो गई. सोरा की शादी हो गई. उनके पति का मिट्टी के बर्तनों का बड़ा कारोबार था। परिवार का मिट्टी के बर्तन बनाने का व्यवसाय था। आसपास के सभी गांवों के लोग उनसे ही मिट्टी के बर्तन खरीदते थे। अब सोरा भी अपने ससुराल में खुश थी। सोरा के लिए नया जीवन सुखद था। एक साल के बाद, हैदर ने अपनी दोनों बेटियों को अपने पास आने के लिए आमंत्रित किया।

अपने माता-पिता के घर अलीज़ा और सोरा लगभग एक ही समय पर पहुंचीं। इतने दिनों बाद एक-दूसरे से मिलकर वे बहुत खुश थीं उन्होंने एक-दूसरे को गले लगाया।

अगले दिन, हैदर ने कमरे में अपनी बेटियों को आपस में बहस करते हुए सुना। दोनों आपस में किसी बात को लेकर झगड़ रही थीं। हैदर को आश्चर्य हुआ कि जो बहनें एक-दूसरे से इतना प्यार करती थीं, वे किस बात पर झगड़ रही थीं? हैदर ने सुनने की कोशिश की.

अलीज़ा कह रही थी, "इस साल हम मुसीबत में हैं. अकाल के संकेत हैं. भयंकर सूखा है. हम सभी भारी बारिश के लिए प्रार्थना कर रहे हैं।"

सोरा ने नाराजगी के साथ कहा, "आप भारी बारिश के लिए प्रार्थना क्यों करते हैं? थोड़ी सी बारिश आपकी फसलों को बचा सकती है। क्या आप चाहते हैं कि हम बर्बाद हो जाएं?"

"मैं तुम्हारी बर्बादी की कामना क्यों करूं?" अलीज़ा ने तर्क दिया और कहा, "मैं सिर्फ बारिश के लिए प्रार्थना कर रही हूं। भारी बारिश। इतनी भारी कि हफ्तों तक सूरज नहीं दिखना चाहिए।"

सोरा ने शिकायत की, "तुम बहुत बुरी हो, बहन। तुम मेरी विपत्ति के लिए प्रार्थना कर रही हो। मैं प्रार्थना करती हूं कि हमारे मिट्टी के बर्तनों को सुखाने के लिए हर दिन धूप हो। यहां तक ​​कि एक दिन की बारिश का मतलब हमारे लिए नुकसान है। हमारे पास बेचने के लिए कोई बर्तन नहीं है।"

हैदर को आश्चर्य हुआ कि कैसे वे दोनों बहनें जो एक-दूसरे के लिए अपनी जान तक देने को तैयार रहती थीं कैसे अपने-अपने स्वार्थ के लिए विपरीत चीजें घटित घटित होने की प्रार्थना कर रही थीं। अब हैदर अपनी बेटियों की शादी विपरीत जरूरतों और रुचियों वाले परिवारों में करने से दुखी था। एक चीज जो एक के लिए खुशी लाती थी वह दूसरे के लिए दुख का कारण साबित हो सकती थी। अपने-अपने स्वार्थ के लिए अब वे दोनों बहनें अब एक-दूसरे से नाराज रहने लगीं और अब वे एक-दूसरे से प्यार नहीं करतीं थीं। हैदर को समझ आ गया था कि रिश्ते सोच-समझकर करने चाहिए क्योंकि समय आने पर व्यक्ति का व्यवहार बदलने में देर नहीं लगती।

होशियार लड़का (कोरिया की लोककथा)

 किसी गाँव में एक चरवाहे का जवान बेटा चीमो रहता था।  वह प्रतिदिन अपनी भेड़ें चराने के लिए चारागाह में जाता था। वह भोर होते ही अपनी भेड़ों के साथ चारागाह की ओर निकल पड़ता था और सूर्यास्त से ठीक पहले ही लौट आता था।

एक दिन वह चरागाह में किसी जगह बैठा कुछ सोच रहा थाअचानक उसकी आँखों में चमक आ गई और उसने उत्साह से अपनी फर वाली टोपी हवा में उछाल दी।

दुर्भाग्य से फर की टोपी पास से गुजर रहे एक घोड़े के सिर पर गिर गयी जिसके कारण घोड़ा डर गया और डरकर वह अपने पिछले पैरों पर खड़ा हो गया। घोड़े के ऐसा करने से बेचारा घुड़सवार घोड़े से गिर गया।

वह घुड़सवार शहर के सबसे अमीर व्यापारी का बेटा था। वह कीमती सुन्दर कपड़े पहन कर अपने पिता के किसी काम से जा रहा था। इस अचानक से हुई घटना से वह युवक आक्रोशित हो गया। वह उठा और अपने कपड़े झाड़े। वह चरवाहे लड़के पर चिल्लाया, "बेवकूफ लड़के! क्या तुम्हें कोई समझ नहीं हैतुमने मेरे घोड़े को डरा दिया और मैं गिर गया।"

चीमो बोला, "मैंने खुशी में अपनी टोपी उछाल दी थी। मुझे नहीं पता था कि यह घोड़े के सिर पर गिर जाएगा और ऐसा कुछ हो जाएगा।“

"ऐसी कौन सी बात पर इतना खुश हो रहे थेमुझे सुनने दो। खुशकिस्मती से मुझे गंभीर चोट नहीं आयी, अगर मुझे गंभीर चोट लगती तो मैं तुम्हें जरूर एक थप्पड़ मार देता।"

चीमो ने बताया, "मेरे पिता ने मेरे सामने एक पहेली रखी थी और मैंने उसका उत्तर दे दिया।"

"पहेली क्या थी?"

"ऐसी कौन सी चीज़ है जो आदमी से ऊंची है लेकिन मुर्गी से छोटी है?"

"वह क्या हो सकता है?"

क्या तुम्हें भी उत्तर नहीं मालूम?”

"मुझे पता हैमूर्ख। लेकिन मैं यह तुमसे सुनना चाहता हूँ," युवक ने चतुराई से कहा।

चीमो ने गर्व से बताया, "एक टोपी। सिर पर यह हमेशा एक आदमी से ऊंची होती है। लेकिन नीचे जमीन पर यह मुर्गी से भी छोटी होती है।"

चीमो की चतुराई से युवक प्रसन्न हुआ, "तुम बहुत चतुर हो। अब अगर तुम मुझे कुछ ला दोगे तो मैं तुम्हें बहुत सारा इनाम दूंगा। कल जब मैं वापस यहां आऊंगा तब मेरे लिए एक भेड़ तैयार रखना पर ध्यान रहे वह काली नहीं होनी चाहिए। सफ़ेदस्लेटीमिश्रित काला और सफ़ेद या किसी अन्य रंग का।"।

इतना कहकर युवक चला गया। और चीमो ने इसके बारे में सोचा और सोचा।

अगले दिनवह अपनी भेड़ें चरा रहा था। लौटते समय वह युवक अपने घोड़े पर सवार होकर आया। उसने पूछा, "क्यों प्यारे लड़के! क्या तुम्हें वह भेड़ मिल गयी जो मैंने माँगी थी?"

चीमो ने ख़ुशी से जवाब दिया, "हाँमहोदय। मुझे मिल गया। उसे मैंने घर पर ही रखा है। आप अपने आदमी को भेजकर इसे किसी भी समय ले सकते हैं। लेकिन याद रखें कि आपका आदमी रविवारसोमवारमंगलवारबुधवारगुरुवारशुक्रवार नहीं होना चाहिए, और शनिवार को वह सुबहशाम या रात को नहीं आना चाहिए।“

युवक जोर से हंसा और बोला, "मैं तुम्हारी चतुराई से बहुत प्रसन्न हूं। इनाम के रूप में ये पांच सोने के सिक्के ले लो। और याद रखनाअगर तुम्हें कभी भी नौकरी की जरूरत हो तो सीधे मेरे पास आना।"

युवक ने सिक्के और अपना पता चीमो को बता दिया। और मुस्कुराते हुए अपने घोड़े पर बैठा अपने घर की ओर चल पड़ा।

डींगें हांकने का नतीजा (इटली की लोक कथा)

एनोवा और ग्रीट्स घनिष्ठ मित्र थे। वे एक-दूसरे के ह्रदय के बहुत करीब थे। वे अपना समय एक-दूसरे के साथ व्यतीत करना पसंद करते थे। कुछ समय पश्चात् मोरियो नाम के एक व्यक्ति से उनकी मुलाकात हुई और वह भी उनका ख़ास दोस्त बन गया।

एक बार एक पार्टी में खाना खाते समय मोरियो को कुछ सूझा और वह जोर-जोर से बात करने लगा। उसकी ऊँची आवाज़ सुनकर बाकी लोगों उन तीनों की ओर देखने लगे।

मोरियो डींगें हांकने लगा और उसने दावा किया, "मैं जिस घर में रहता हूं, वह आश्चर्य से भरा हुआ है। यदि आप एक कमरे में जोर से कुछ भी बोलते हैं तो दूसरे कमरे में उसकी गूंज सुनाई देती है।" एनोवा ने बड़े आश्चर्य से पूछा, "सचमुच! एक कमरे की बात दूसरे कमरे में कैसे गूंज सकती है? यह कैसे संभव है?"

मोरियो ने कहा, "यह कोई सामान्य प्रतिध्वनि नहीं है। आवाज़ एक बार नहीं बल्कि दस बार गूँजती है। यदि तुम एक कमरे में मेरा नाम जोर से पुकारोगे तो दूसरे कमरे में मेरा नाम दस बार गूँजेगा।"

"वास्तव में!" सभी ने मोरियो की ओर देखा। पार्टी में एक अमीर आदमी भी मौजूद था। वह मोरियो की डींगें हांकना बर्दाश्त नहीं कर सका। उसे सबसे ज्यादा नापसंद यह लगा कि सबका ध्यान मोरियो की तरह और उस पर कोई ध्यान नहीं दे रहा था। उसने जोर से कहा, "तुम्हारे कमरों से दस बार आवाजें गूंजती हैं? यह कोई बड़ी बात नहीं है। मेरी हवेली में तो बीसों बार आवाजें गूंजती हैं।"

अब सबका ध्यान अमीर आदमी की ओर चला गया जिससे वो खुश हो गया। मोरियो भी आश्चर्यचकित था। एनोवा ने कहा, “ऐसा कैसे संभव हो सकता है। यह असंभव है कि किसी कमरे में एक ध्वनि बीस बार गूँज सकें।"

अमीर आदमी ने तर्क दिया, "यह संभव क्यों नहीं है? आप नहीं जानते कि मेरी हवेली कितनी पुरानी है। आप मेरी हवेली में आ सकते हैं और इसे खुद देख सकते हैं।"

यह सुनकर अनेक लोग उसके दावे का सच जानने के लिए हवेली आने की इच्छा व्यक्त करने लगे। इस बात ने अमीर आदमी को परेशानी में डाल दिया। उसे उम्मीद थी कि वास्तव में कोई भी उनके दावे का परीक्षण नहीं करना चाहेगा। अब वह लोगों को अपने घर आने से नहीं रोक सकता था.

एनोवा और ग्रिट्स ने पूछा, "अच्छा सर, हम आपके घर कब आएंगे?" अमीर आदमी को उन्हें अगली शाम को आमंत्रित करना पड़ा।

अमीर आदमी अब बहुत चिंतित था। अगली शाम लोग आएँगे और उसके कमरों में कोई गूँज नहीं होगी। यह उसके लिए बहुत शर्म की बात होगी। उसने अपनी पत्नी को अपनी समस्या बताई। उन्होंने बातचीत करके एक योजना बनाई।

 

योजना के अनुसार अमीर आदमी ने अपने पुराने वफादार नौकर पिएरो को बुलाया और उसे योजना के बारे में बताया। पिएरो को अगले कमरे से सटी एक कोठरी में छिपना था। जब अमीर आदमी पुकारेगा तो उसे उस बात को बीस बार दोहराना होगा।

नियत समय पर लोग अमीर आदमी की हवेली पर पहुँचे एनोवा और ग्रीट्स भी आ चुके थे। अमीर आदमी ने पुकारा, "एनोवा! एनोवा!" दूसरे कमरे में बीस बार एनोवा के नाम की गूँज उठी जिसे लोग बड़े आश्चर्य से सुनते रहे। गूँज सुनने के लिए लोग एक-दूसरे का नाम पुकारते रहे और जाहिर सी बात थी पिएरो अपने मालिक के आदेशानुसार उन्हें दोहराता रहा।

संयोग से उनमें से एक व्यक्ति का नाम पियरो था। उसके मित्र ने उसका नाम जोर से पुकारा, "पियरो! पियरो! आप कहाँ हैं?" इस बार प्रतिध्वनि की जगह उत्तर आया, "सर! मैं यहाँ हूँ। आ रहा हूँ सर!"

और पियरो कोठरी से बाहर आ गया। उसने सोचा कि उसके मालिक ने उसे मेहमानों की सेवा के लिए बुलाया है। ज्यादा लोगों के होने से शोर ज्यादा था लेकिन कुछ लोगों को एहसास हुआ कि उन्होंने आखिरी आवाज की गूँज नहीं सुनी। एनोवा को भी संदेह हुआ तो उसने भी आवाज लगाई लेकिन इस बार कोई प्रतिध्वनि नहीं थी। लोगों को अब पता चल गया कि उन्हें धोखा दिया गया है। उनमें से कई गुस्से में अमीर आदमी की ओर बढ़े। एनोवा ने गरजते हुए कहा, "क्या तुम्हें हमें धोखा देने के लिए खुद पर शर्म नहीं आती?" कुछ तो उसे मारने के लिए आगे बढ़ने लगे तब अमीर आदमी ने गिड़गिड़ाते हुए कहा, "कृपया मुझे माफ कर दीजिए। मुझे बहुत खेद है। मैं फिर कभी आपके साथ कोई गलत काम नहीं करूंगा।"

लोग उस अमीर आदमी का मज़ाक उड़ाते हुए चले गये। उसने निश्चय किया कि वह फिर कभी घमंड नहीं करेगा और न ही डींगें हांकेगा। मोरियो की बेवकूफी भरी बातें सुनकर उसने जो मूर्खता की थी उससे उसकी बेइज्जती तो हुई ही, वह मार खाने से बाल-बाल बच गया। इसलिए अगर कोई मूर्ख कुछ बोल रहा है तो हमें अपना विवेक खोकर उसके जैसा मूर्ख नहीं बनाना चाहिए।

बड़ी बात या सोने की ईंट (रूस की लोक कथा)

रूस के सुदूर प्रान्त के एक गाँव में एक किसान के बेटे की शादी थी। घर में उत्सव का माहौल था। घर की महिलाएँ नाच-गा रही थीं। घर के बाहर काफी लोग जमा थे और वे सब हंसी-मज़ाक कर रहे थे। इस अवसर पर कोई भी शांत रहने को तैयार नहीं था, सब के पास कहने को कुछ-न-कुछ अवश्य था. तभी गाँव के दुकानदार ने शेखी बघारी, "तुम्हें पता है

कल हुआ?"

"क्या हुआ?" दूसरे ने पूछा।

"कल मैं गांव के जागीरदार से मिला। उसने मेरा स्वागत किया और मेरा हालचाल पूछा।“

साथ खड़े लोग बोले. "यह असंभव है, इस गाँव का जागीरदार बहुत ही अहंकारी है, उसका शिष्टता से कोई नाता नहीं है। उसे तो बात तक करने का तरीका नहीं पता।"

यह बातचीत किसान का बेटा रॉजर सुन रहा था। उसने भी शेखी बघारी, “अरे चाचा! ऐसा कुछ नहीं है। मैं तो जागीरदार के साथ भोजन भी कर सकता हूँ।“

उसकी बात सुनकर लोग हंसे। तब एक बुजुर्ग ने सलाह दी, "बेटा, एक व्यक्ति को अपनी स्थिति के अनुसार ही बात करना चाहिए। हमें लंबी-लम्बी मनगढ़ंत बाते नहीं करनी चाहिए। जागीरदार हमारा राजा है, वह हम जैसे किसानों को अपने सामने भी नहीं आने देगा।"

रॉजर मुस्कुराया। वह एक चतुर लड़का था। उसने विनम्रता से कहा, "महोदय, मैं बड़े-बड़े दावे नहीं कर रहा हूं। मैं सच बोलता हूं।"

गाँव के दुकानदार को रॉजर की यह बात नहीं जंची, उसने चुनौती दी, "बेटा रॉजर! यदि तुम वास्तव में जागीरदार के साथ एक समय का भी भोजन कर सके तो मैं तुम्हें एक बड़ा इनाम दूँगा।"

"तो, आप क्या इनाम देंगे? क्या आप मुझे अपने दोनों घोड़े देंगे?” रॉजर ने पूछा।

"न केवल दोनों घोड़े बल्कि मैं तुम्हें अपनी सबसे बढ़िया गाय भी दे दूंगा। दुकानदार ने घमंड से कहा और पूछा, "लेकिन मुझे एक बात बताओ कि तुम एक दिन के भीतर उसके साथ भोजन नहीं कर सके तो तुम मुझे क्या दोगे?"

"अगर मैं असफल हुआ तो मैं तीन साल तक आपका गुलाम बनकर रहूँगा" रॉजर ने उत्तर दिया।

सभी ने रॉजर की ओर अविश्वास से देखा। उसने एक ऐसी चुनौती स्वीकार की थी जिसे पूरा करना असंभव था।

अगली सुबह, रॉजर जागीरदार की हवेली में गया। द्वारपाल ने उसे रोका। रॉजर ने उससे कहा, "अंदर जाओ और जागीरदार से पूछो कि क्या वह सोने की ईंटों के बारे में जानता है। अन्यथा, मैं किसी और के पास जा रहा हूँ।" द्वारपाल हैरान था। वह दौड़कर अंदर गया और उसने इसके बारे में बताया।

यह सुनकर जागीरदार भी हैरान रह गया। लेकिन उसने शांत दिखने की कोशिश की और आदेश दिया, "लड़के को अन्दर बुला लाओ। और हमारे दोपहर के भोजन की व्यवस्था करो।" रॉजर को सम्मानपूर्वक अंदर ले जाया गया और खाने की मेज पर बैठाया गया। दोपहर का भोजन और फल रखे गये थे।

थोड़ी ही देर में जागीरदार भी आ गया। वहां जाकर उसने अपना स्थान ग्रहण किया। उसने लड़के से पूछा, "बेटा, तुम कौन हो? तुम्हारे पिताजी क्या करते हैं?"

रॉजर ने उत्तर दिया, "मेरा नाम रॉजर है, सर। मेरे पिता एक किसान हैं। मैं सिर्फ यह जानना चाहता था कि सोने की एक ईंट कितने धन के बराबर होगी? कोई उस पैसे में क्या खरीद सकता है?" जागीरदार अब भी बहुत हैरान था। उसने रॉजर को बताया, "बेटा, सोने का एक ईंट का मतलब है एक बड़ा पैसा। इतना पैसा कि इससे तुम बहुत सी जमीनें और बहुत सारे मवेशी खरीद सकते हो। वैसे ईंट का सही मूल्य जानना ईंट के वजन पर निर्भर करता है। मुझे ईंट देखने दो। तुम्हारे पास कितनी ईंटें हैं? या सिर्फ एक ईंट है? ईंट मेरे पास लाओ. मैं तुम्हें अच्छी कीमत दूँगा।" जागीरदार की रुचि सोने की ईंट के बारे में बढती जा रही थी।

रॉजर चुपचाप अपना दोपहर का भोजन बड़े स्वाद के साथ खा रहा था। जागीरदार ने सोचा कि शायद लड़के को उससे अच्छी कीमत मिलने की आशा नहीं है तभी वह कुछ उत्तर नहीं दे रहा है तो उसने रॉजर को आश्वस्त करते हुए कहा, "बेटा! तुम्हें जो कीमत चाहिए, वही मिलेगी।" मैं तुम्हें जमीनें भी दूंगा। मुझ पर विश्वास करो और ईंट मेरे पास ले आओ।"

रॉजर ने शांत स्वर में कहा, "महोदय, मैंने कभी नहीं कहा कि मेरे पास सोने की ईंटें हैं। मैं बस एक सोने की ईंट का मूल्य जानने की कोशिश कर रहा था। अगर कल या किसी और दिन मुझे अगर कोई ऐसी ईंट मिली तो ...''

''हट जाओ, बदमाश! क्या तुम मुझे मूर्ख बनाने की कोशिश कर रहे हो?" जागीरदार गुस्से में गरजा और उसने अपने सैनिकों को बुलाया।

"कृपया परेशानी न उठाएं। मैं खुद जा रहा हूं", रॉजर ने प्रस्थान करते समय कहा, "मुझे आपसे जमीन या मवेशियों की आवश्यकता क्यों होगी, आपके साथ दोपहर के भोजन कर लेने मात्र से ही अब मुझे दो घोड़े और एक दुधारू गाय मिल जाएगी।"

जागीरदार ने मुस्कुराते हुए बातूनी रॉजर को जाते देखा और गुस्से के साथ अपने महल के अन्दर चला गया।

पेड़ों के लिए पत्तियां (न्यूजीलैंड की लोककथाएँ)

क्या आप विश्वास कर सकते हैं कि सदियों पहले पेड़ों पर पत्तियाँ नहीं हुआ करती थी। बाद में उनमें पत्तियाँ अलग से लगायी गयी। बात सच तो नहीं है लेकिन न्यूजीलैंड में एक बहुत ही प्रसिद्ध लोककथा तो ऐसा ही कुछ कहती है इस बारे में. आइये पढ़ते हैं -

सदियों पहले की बात है, उस समय पेड़ों पर पत्ते नहीं हुआ करते थे। मनुष्य, पशु-पक्षियों और अन्य जीव-जन्तु बिना पत्तों वाले पेड़ों को देखते थे। गर्मी के दिनों में लोग गर्मी से राहत पाने के लिए कुछ न कुछ इंतजाम करते थे क्योंकि पत्तों के बिना पेड़ ठंडी छाया नहीं दे पाते थे। सर्दियों के दौरान जीव-जंतु बिलों के अंदर रहते थे क्योंकि नंगे पेड़ बाहर बर्फीली ठंडी हवाओं को नहीं रोक पाते थे। ऐसे ही कई वर्षों तक चलता रहा, किसी ने कुछ न सोचा, न किया ।

लेकिन एक साल बहुत तेज गर्मी पड़ी जिससे मनुष्य और सभी प्राणी परेशान हो उठे। सारा पानी पानी सूख रहा था जिससे  तालाब और झीलें मिट्टी के दलदल में बदलने लगे थे।

तब गाँव के जानवरों ने एक बैठक की और फैसला किया कि वे राजा से अनुरोध करेंगे कि पेड़ों को किसी चीज़ से ढक दिया जाए ताकि उन्हें गर्मी से राहत मिल सके। इसलिए, कुछ हाथी, हिरण, शेर और बैल राजा के पास गए और विनती की, "राजा! इस बार गर्मी ने हमारा जीवन कठिन बना दिया है। इससे भी बदतर पानी की कमी है। कृपया हमें छाया प्रदान करने के लिए कुछ करें।

राजा ने एक मंत्री से प्राणियों को छाया देने और कुछ पानी उपलब्ध कराने के लिए पेड़ों को किसी वस्त्र आदि से ढकने को कहा। मंत्री जंगल में गया और कुछ पेड़ों को ढँकदाया इससे  कुछ तो राहत मिली लेकिन सभी के लिए तो ये पर्याप्त नहीं था इसलिए उन्होंने बारी-बारी से पेड़ों की छाया का उपयोग किया।

मंत्री ने देखा कि छाया ने जानवरों को खुश कर दिया है और वे पानी के बारे में भूल गए हैं। अत: वह चुपचाप लौट आये।

जब मनुष्यों को जानवरों के लिए पेड़ों की छाया के बारे में पता चला तो वे भी राजा के पास गये। उन्होंने राजा से मनुष्यों को भी छाया देने का अनुरोध किया। उनके लिए पेड़ भी लगाएं और पानी भी उपलब्ध कराएं। राजा ने उसी मंत्री से आवश्यक कदम उठाने को कहा।

मंत्री ने फिर उसी तरह दो-तीन पेड़ लगवाये और लौटकर दूसरे कामों में लग गये।

लेकिन मनुष्य अन्य जानवरों की तरह शांत नहीं थे। वे छायादार पेड़ों के नीचे जाने के लिए आपस में लड़ने लगे। जब लड़ाई बहुत गंभीर हो गई तो राजा को इसकी सूचना दी गई। राजा ने संबंधित मंत्री से पूछा, "प्रिय मंत्री! हमारी प्रजा इतनी दुखी क्यों है! यह बहुत बुरा है। आपको इसके बारे में कुछ करना होगा।"

मंत्री ने कहा, "महाराज, मेरा सुझाव है कि पेड़ों को तिरपाल से ढकने के बजाय, अगर हम पेड़ों की शाखाओं पर पत्तियां चिपका दें तो यह बेहतर विचार होगा। इससे छाया मिलेगी और हवा भी गुजरेगी जिससे आसपास का वातावरण ठंडा हो जाएगा। यदि हम ऐसा अधिक से अधिक पेड़ों के साथ कर सकें तो इससे लोगों को अधिक राहत मिलेगी।

राजा ने सहमति व्यक्त की, "ठीक है। पत्तों को चिपका दो।"

मंत्री बोला, 'सर, अगर हम एक ही जैसे और एक ही आकार की पत्तियां चिपका दें तो पेड़ खूबसूरत दिखेंगे। हमें कुछ कारीगरों की जरूरत होगी।'

राजा ने कुछ कारीगरों को नियुक्त करने का आदेश दिया। जब वे पत्ते बनाने लगे तो इस बीच मंत्री ने पानी की समस्या से बचने के लिए कुछ कुएँ भी खुदवा दिए। अब मंत्री ने उन कारीगरों की मदद से शाखाओं पर पत्ते चिपकाने शुरू किये। एक ही आकार और आकृति की पत्तियों को चिपकाने और तैयार करने में काफी समय लग रहा था। गर्मी से परेशान लोग देरी को लेकर शिकायत कर रहे थे।

एक गाँव के मुखिया ने कहा, "मंत्री महोदय, आपके वे कारीगर बहुत धीमे हैं। वे पूरे दिन में एक पेड़ पर भी पत्ते नहीं डाल सकते। हम तो गर्मी से मर जायेंगे।"

मंत्री ने तर्क दिया, "देखो! हर काम में समय लगता है। अगर तुम इतने अधीर हो तो हमारी मदद क्यों नहीं करते?"

मुखिया ने उत्तर दिया, "हम करेंगे। पूरी आबादी इस कार्य को करने के लिए तैयार है। लेकिन वे एक ही जैसी पत्तियाँ नहीं बना सकते। विभिन्न लोगों के समूहों द्वारा बनाई गई पत्तियों की सैकड़ों तरह की आकृतियाँ होंगी।"

मंत्री ने सहमति जताते हुए कहा, "इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। महत्वपूर्ण बात यह है कि काम जल्द से जल्द किया जाना है।" अब सभी लोग पत्तों की आकृतियों को काटने और उन्हें चिपकाने में व्यस्त हो गये। सबको आनंद आने लगा और पूरा राज्य इसी कार्य में लग गया।

जब इंसानों को ऐसा करते जानवरों ने देखा और वे भी वैसा ही करने लगे। जल्द ही, अधिकांश पेड़ पत्तों से लदे हुए दिखने लगे। चिपकाते समय कई पत्तियाँ गिरकर नीचे ज़मीन पर फैल गईं। अब सभी खुश दिख रहे हैं क्योंकि पेड़ पत्तों से ढँके हुए थे। पेड़ों की छाया के नीचे पत्तियों के ढेर पर बैठना हर किसी के लिए एक आनंद बन गया था। इंसान खुश थे और जानवर भी खुश थे। पक्षी खुशी से गाने लगे। पेड़ों की पत्तियों की ख़ुशी में आसमान भी झूम उठा और तेज बारिश हुई।

कहते हैं, तब से ही पेड़ों पर विभिन्न प्रकार की पत्तियाँ उगने लगीं, जिससे सभी प्राणियों को आरामदायक छाया और ठंडी हवा मिली और धरती पर रहने वाले सभी जीव प्रसन्न हो गए।

लालबुझक्कड़ की सूझ (महेश कुमार मिश्र)

बहुत पुरानी बात है। एक गाँव में एक आदमी रहता था। उसका नाम लालबुझक्कड़ था। वह अपनी सूझबूझ से कविता रच देता था। आसपास के कई गाँवों में वही कुछ पढ़ा-लिखा था। सभी गाँववाले उसके पास अपनी कठिनाई लेकर आते थे। लालबुझक्कड़ उन कठिनाइयों को दूर करता था। सब लोग लालबुझक्कड़ का आदर करते थे।

एक बार रात के समय लालबुझक्कड़ के गाँव में से होकर एक हाथी निकला। गाँव के सब लोग सो रहे थे। किसी को पता नहीं चला कि हाथी कब निकल गया। गाँव के रास्तों में धूल बहुत होती है। उस धूल पर हाथी के पैरों के बड़े-बड़े निशान बन गए।

सबेरा हुआ, सब लोग जागे। कुछ ने वे गोल निशान रास्ते में देखे। बहुत सोचने पर भी वे यह बात न समझ सके कि ये किस चीज के निशान हैं क्योंकि उन्होंने कभी भी अपने जीवन में हाथी देखा नहीं था इसलिए पैरों के निशान देखकर वे कुछ समझ न सके। इसलिए सबने लालबुझक्कड़जी को वे निशान दिखाए। गोल-गोल, बड़े निशान लालबुझक्कड़जी ने देखे। फिर वे सोचकर कविता में बोले -

"लालबुझक्कड़ बूझ के और न बूझो कोय।

पैर में चक्की बाँध के हिरना कूदो होय।।"

इसका अर्थ है कि लालबुझक्कड़ से प्रश्न पूछकर और किसी से न पूछना । अपने पैरों में चक्की बाँधकर कोई हिरन कूदा होगा, जिसके ये निशान हैं।

ऐसी थी लालबुझक्कड़जी की सूझबूझ !

सच्चा सुख (महेश कुमार मिश्र)

किसी शहर में एक सेठजी रहते थे। उनका नाम आशाराम था। उनके पास बहुत-से मकान थे, बहुत-सा धन था। सोने-चाँदी की उनके यहाँ कमी न थी। पर वे थे बड़े कंजूस। जरूरी कामों लिए भी वे पैसे खर्च नहीं करते थे। वे बहुत पैसा जमा करना चाहते थे। उन्हें अपने नाती-पोतों तक की चिंता थी।

एक दिन उस शहर के मंदिर में एक संत आए। संत बहुत सीधे और सरल स्वभाव के थे। वे सबकी इच्छा पूरी कर देते थे। धीरे-धीरे आशाराम को भी संत के आने की खबर मिली। उनके मन में लालच आ गया। उन्हें लगा कि शायद, संत उनकी इच्छा पूरी कर देंगे।

दूसरे ही दिन आशाराम पैदल चलकर संत के पास गए। उन्हें प्रणाम करके वे एक ओर बैठ गए। संत ने बड़े प्रेम से उनसे बातचीत की। वे समझ गए कि आशाराम को किसी चीज की जरूरत है। वे आशाराम को अधिक सुखी बनाना चाहते थे। संत बोले - "आपकी इच्छा अवश्य पूरी हो जाएगी।" सेठजी खुशी से उछल पड़े।

संत ने फिर कहा- "मगर एक शर्त है, वह तुम्हें पूरी करनी पड़ेगी।" शर्त की बात सुनकर आशाराम घबराए। उन्होंने सोचा, संतजी कहीं कुछ रुपया-पैसा न माँग बैठें। पर उन्हें अपनी इच्छा तो पूरी करनी ही थी। हिम्मत करके बोले, "शर्त बताइए महाराज ! मैं उसे जरूर पूरी करूँगा।"

संत बोले, "आपके पास ही एक गरीब परिकर रहता है। परिवार में केवल दो प्राणी रहते हैं। आप उन्हें कल के भोजन के लिए सामान दे आइए।"

आशाराम के लिए यह कोई बड़ी बात नहीं थी। वे सोचने लगे, "अब मेरी इच्छा जरूर पूरी हो जाएगी।" तुरंत ही वे भोजन का सामान लेकर गरीब के पास गए। वहाँ जाकर उन्होंने देखा कि किवाड़ खुले हैं, माँ-बेटी काम में लगी हुई हैं। किसी ने भी आशाराम की ओर ध्यान नहीं दिया।

आशाराम कुछ देर खड़े रहे। फिर बोले, "मैं तुम्हारे लिए खाने का सामान लाया हूँ। इससे तुम्हारी भोजन की कमी पूरी हो जाएगी।" माँ ने कहा, "बेटा, आज का खाना तो मेरे पास है। इसलिए हम इसे नहीं लेंगे।" "माँ, भोजन की आवश्यकता तो आपको कल भी होगी। आप इसे कल के

लिए ही रख लें।" "हम कल की चिंता नहीं करते। हमारी चिंता भगवान करते हैं। उन पर हमारा पूरा भरोसा है।" माँ ने उत्तर दिया। ऐसा कहकर वह फिर अपने काम में लग गई।

माँ की बात सुनकर आशाराम खड़े रह गए। वे विचार करने लगे। धीरे-धीरे उनकी समझ में बात आ गई। उन्होंने
सोचा कि यह परिवार गरीब अवश्य है, लेकिन है बहुत सुखी। इसे कल की कोई चिंता नहीं। एक मैं हूँ, जो नाती-पोतों की चिंता कर रहा हूँ।

आशाराम घर नहीं गए। वे सीधे संतजी के पास पहुँचे। उन्हें प्रणाम करके बैठ गए। संतजी ने पूछा, "उस गरीब परिवार को खाने का सामान दे आए ?" आशाराम ने कहा, "महाराज ! आपने मेरी आँखें खोल दीं। सचमुच संतोष ही सबसे बड़ा धन है। दुनिया में संतोष ही सबसे बड़ा सुख है।"

संतजी ने हँसकर कहा, "जिस इच्छा से तुम यहाँ आए थे, वह पूरी हो गई। जाओ, सारा धन गरीबों को बाँट दो।" आशाराम ने ऐसा ही किया। अब वे बड़े प्रसन्न और सुखी थे।

साभार - श्री महेश कुमार मिश्र एवं मध्यप्रदेश पाठ्य पुस्तक निगम